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शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

"करणी का फल "

"करणी का फल "
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आज सासु माँ की बहुत याद आ रही है , 
कड़ाके की ठंड में रात को दस बजे तक भी जब मैं अपनी व्यस्तता का बहाना बनाकर खाना नही बनाती थी,तो भी कभी कोई शिकायत नही करती मुझसे। 
रमा के आज एक-एक कर वो सब बाते फ़िल्म की तरह दिमाग में चल रही है।
रात को ही क्या दिन में भी यही हाल था। कई बार तो सासु माँ को इस अवस्था में खुद भी बनाकर खाना पड़ जाता था। 
अरे! आप बैठी -बैठी क्या सोच रही है मुझे महिला एवं बाल कल्याण दफ्तर में मीटिंग के लिए जाना है,,जल्दी से किचन में आईये और काम में हाथ बटाईए , बहू की रौबदार आवाज से नैना देवी की तन्द्रा भंग हुई।
शान्ति पुरोहित

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

जन्मदिन की पार्टी


"जन्मदिन की पार्टी"
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रतीक शर्मा के बेटे के जन्मदिन का अवसर था।
जाहिर सी बात है मेहमानो को तो निमन्त्रित करना ही था
प्रतीक की पत्नी जो जिला शिक्षा अधिकारी थी, चाहती थी कि बेटे का जन्मदिन चुनिंदा लोगो के साथ किसी होटल में मनाया जाय।
पर प्रतीक चाहता था घर में अपने पूरे परिवार के साथ मनाया जाय।
अंत में बेटे का जन्मदिन घर में ही मनाना तय हुआ।
प्रतीक के परिवार के लोग दूसरे शहर से आये थे और पत्नी के उसी शहर से आये थे।
प्रतीक के परिवार के लोग उस समय चकित रह गए जब उन्हें पास ही के खाली पड़े प्रतीक के किसी परिचित के घर यह कह कर ठहराया गया कि रात को जब केक पार्टी होगी आपको लेने आ जाऊँगा।
"भाई साहब क्या सोच रहे हो, प्रतीक के छोटे भाई ने कहा तो प्रतीक की तन्द्रा भंग हुई ,उसे याद आया कि पत्नी ने कभी भी मेरे परिवार के लोगो को अपने बराबर नही समझा बल्कि उन्हें छूत की बीमारी ही समझा। अपने परिवार को श्रेष्ठ , सबकुछ जानते हुए भी एक बार फिर अपने परिवार की तोहीन करवाई ।
शान्ति पुरोहित

मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

निर्माण

निर्माण
कल ही हरिया शहर से मजदूरी करके कुछ पैसा लेकर गाँव आयेगा, तो सबसे पहले टूटी झोपडी को बंधवाना है। बहू पेट से है, और जाड़ा सर पर है। पताशी कच्चा आँगन लीपते हुए मन ही मन सोच विचार कर रही थी।
तभी रामू भागता हुआ आया, " माँ! भाई को पुलिस पकड़ कर ले गयी है ।पाकिस्तान से कुछ आतंकवादी भारत की सीमा में अनधिकृत रूप से प्रवेश का गए हैं। उनहोंने हरिया को भी उन्ही में से एक समझ लिया। अब हरिया जो कमाई शहर से करके लाया था वह वकील की फीस में चली गयी । 
शान्ति पुरोहित

"मार्गदर्शन"

"मार्गदर्शन"
"बाल विवाह का दंश झेल कर युवा हुई किरण, जीवन के दोराहे पर खड़ी थी। 
पति ने बचपन में हुए विवाह को मानने से इंकार कर दिया, घर वाले अभी भी आस लगाये बैठे थे कि काश ! ये अपने ससुराल चली जाये।
" तभी उसे अपनी प्राइमरी स्कूल की अध्यापिका की याद आई जा पहुंची उनके घर ।
" मेरा जीवन समाज की थोथी मानसिकता और रीति -रिवाज में उलझ गया है, ऐसे में कोई राह ही नही सूझ रही है।,
अरे ! इसमें घबराने की और परेशान होने वाली क्या बात है , शिक्षा के मंदिर में चली आओ , मेरा मतलब है तुम अपनी शिक्षा फिर से शुरू करो।
अध्यापिका जी जब रिटायर हुई तो स्कूल फंक्सन में विशिष्ठ अतिथि सुश्री किरण सिंह ही थी।
शान्ति पुरोहित

मुट्ठी से रेत

मुट्ठी से रेत
अरे मत मारो इसे! अभी इसकी उम्र ही क्या है,आपको कोई गलत फहमी हुई है इतना बड़ा जघन्य अपराध सौलह साल का लड़का कैसे कर सकता है? किशोर की माँ ने जेल में पुलिस से पिटते हुए अपने बच्चे को बचाते हुए कहा।
थानेदार ने गुस्से से उबलते हुए कहा " ये शराफत का मुखोटा उतार कर अपने दिल में झाँक कर देख! 
जो तूँ कह रही है क्या वो सच है ? 
हर माह तू ही तो अपने बिगड़े बेटे को पुलिस से जेल से बचाने की भीख हमसे मांगने आती है, जो तुम्हे कभी मिलती नही,और ना ही, आज मिलेगी।
तभी किशोर के पापा ने जेल में आकर थानेदार से कहा " साहब कड़ी से कड़ी सजा दिलवाइए इसे, हमारी नाक में दम कर रखा है और आज तो इसने हमे किसी को मुहँ दिखाने के काबिल भी छोड़ा।
किशोर की माँ पति के बिगड़े हुए तेवर देख कर अंदर तक काँप गयी, आज उसे लगा की उसके बेटे की जिंदगी हाथ से मुट्ठी की रेत की तरह फिसल गयी।
शान्ति पुरोहित

" दोगलापन"

अरे माँ उठो! आज आने में थोडा लेट हो गयी, क्या करूँ! 
सासु माँ की तबियत आज सुबह से ठीक नही थी, तो किचन सम्भालना पड़ गया। पता नही बुढ़िया को ठंड कहाँ से लग गयी ! दो स्वेटर तो पहन कर रहती है ,फिर भी सुबह से खांस रही है।
विपिन तो है ही ममा पुत्र, जब विपिन घर से निकलते है तभी तो उसकी माँ से नौकरों जैसे काम करवा सकती हूँ 
रीटा ने माँ को गरमा गर्म टमाटर का सूप पिलाते हुए कहा
माँ सूप पीते हुए सोच रही थी, कि क्या ये मेरी बेटी की व्यहारिकता ठीक है!,
इसी उधेड़ बून में सूप की प्याली हाथ से गिर गयी ।
रीटा ने बड़े प्यार से माँ को सम्भाला ।
शान्ति पुरोहित

सोमवार, 14 दिसंबर 2015

'वो' भयभीत नहीं होने देता '


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बसा हुआ हर उर में है 'वो' ;
भयभीत नहीं होने देता ,
विषम घड़ी में भी शत्रु की
जीत नहीं होने देता !
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रुको नहीं बढ़ते जाओ ;
चीर अंधेरों के चीरो ,
बलिदानों की झड़ी लगा दो ,
किंचित नहीं झुको वीरों ,
वीर-प्रसूता के मस्तक को
लज्जित न होने देता !
विषम घड़ी में भी शत्रु की
जीत नहीं होने देता !
......................................
घोर निराशा जब बंधन में ;
बांध रही हो जीवन को ,
हीन-भावना जकड रही हो
मानव के अंतर्मन को ,
आशाओं के दीप जगा
तम विजित नहीं होने देता !
विषम घड़ी में भी शत्रु की
जीत नहीं होने देता !
......................................
मृत्यु से भी आँख मिला लो ;
भर देता हम में साहस ,
मिटटी को भी स्वर्ण बना दे ;
ऐसा वो निर्मल पारस ,
मर्यादित को धर्म-मार्ग से
विचलित न होने देता !
 विषम घड़ी में भी शत्रु की
जीत नहीं होने देता !


डॉ. शिखा कौशिक

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

''हैं बहुत गहरे मेरे,ज़ख्म न भर पायेंगें !''

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मरहम तसल्ली के लगा लो ,राहत नहीं कर पायेंगें ,
हैं  बहुत  गहरे  मेरे ,   ज़ख्म  न  भर  पायेंगें !
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टूटा है टुकड़े-टुकड़े  दिल ,कैसे ये जुड़ जायेगा ,
जोड़ पाने की जुगत में और चोट खायेगा ,
दर्द के धागों से कसकर लब मेरे सिल जायेंगें !
हैं  बहुत  गहरे  मेरे ,   ज़ख्म  न  भर  पायेंगें !
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है मुकद्दर  की खता जो मुझको इतने ग़म मिले ,
रुक नहीं पाये कभी आंसुओं के सिलसिले ,
है नहीं उम्मीद बाकी अच्छे दिन भी आयेंगें !
हैं  बहुत  गहरे  मेरे ,   ज़ख्म  न  भर  पायेंगें !
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अब तड़पकर रूह मेरी कहती है अक्सर बस यही ,
और क्या-क्या देखने को तू यहाँ ज़िंदा रही ,
मौत के आगोश  में ''नूतन''  सुकूं ले पायेंगें !
हैं  बहुत  गहरे  मेरे ,   ज़ख्म  न  भर  पायेंगें !


शिखा कौशिक ''नूतन'

शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

''दुश्मनों को एक मौका दीजिये !''


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दुश्मनों को अपने प्यारे एक मौका दीजिये !
ख्वाब उनका भी हो पूरा एक मौका दीजिये !
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हाथ में खंज़र लिए जो क़त्ल करने आ गया ,
चूम कर खंज़र उसी का एक मौका दीजिये !
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ज़िंदगी और मौत तो है ख़ुदा के हाथ में ,
दुश्मनों को दिल्लगी का एक मौका दीजिये !
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दुश्मनी की आग लेकर जो झुलसते दिल में हैं ,
उनके दिल को ठंडकों का एक मौका दीजिये !
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है नहीं 'नूतन' मुनासिब फिर भी हम ये कह रहे ,
दुश्मनों को दुश्मनी का एक मौका दीजिये !

शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 20 जून 2015

वीरोगति रूप मृत्यु का कहलाता सुन्दरतम !


घाव  लगें जितनें भी तन पर कहलाते आभूषण ,
वीर का लक्ष्य  करो शीघ्र ही शत्रु -दल  का मर्दन ,
अडिग -अटल हो करते रहते युद्ध -धर्म का पालन ,
समर -भूमि से वीर नहीं करते हैं कभी पलायन !
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युद्ध सदा लड़ते हैं योद्धा बुद्धि -बाहु  बल से ,
कापुरुषों की भाँति न लड़ते हैं माया -छल से ,
शीश कटे तो कटे किन्तु पल भर को न झुकता है ,
आज अभी लेते निर्णय क्या करना उनको कल से !
राम-वाण के आगे कैसे टिक सकता है रावण ?
समर -भूमि से वीर नहीं करते हैं कभी पलायन !
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सिया -हरण का पाप करे जब रावण इस धरती पर ,
सज्जन ,साधु ,संत सभी रह जाते हैं पछताकर ,
उस क्षण योद्धा लेता प्रण अपने हाथ उठाकर ,
फन कुचलूँगा हर पापी का कहता वक्ष फुलाकर ,
सुन ललकार राम की हिलता लंका का सिंहासन !
समर -भूमि से वीर नहीं करते हैं कभी पलायन !
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गर्जन-तर्जन मार-काट मचता है हा-हा कार ,
कटती गर्दन -हस्त कटें बहती रक्त की धार ,
रणभूमि का करते योद्धा ऐसे ही श्रृंगार ,
गिर-गिर उठकर पुनः-पुनः करते हैं वार-प्रहार ,
वीरोगति रूप मृत्यु का कहलाता सुन्दरतम !
समर -भूमि से वीर नहीं करते हैं कभी पलायन !

शिखा कौशिक 'नूतन'

सोमवार, 8 जून 2015

सबसे सुन्दर प्रिया !

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गुलाबी फूल

हरी बेल पर

अत्याधिक आकर्षक !

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 ओस की बूँदें

हरे पत्तों पर

अत्याधिक मोहक !

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 जल की फुहार

चमकती हुई धूप में

अत्याधिक उज्ज्वल !

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 लेकिन सबसे सुन्दर

तुम हो प्रिया

गाम्भीर्य लिए चंचल !

 शिखा कौशिक 'नूतन'

मंगलवार, 2 जून 2015

मैं नहीं लिखता कोई मुझसे लिखाता है !

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मैं नहीं लिखता ; कोई मुझसे लिखाता है !

कौन है जो भाव बन ; उर में समाता है ! .

...................................
कौंध जाती बुद्धि- नभ में विचार -श्रृंखला दामिनी ,

तब रची जाती है कोई रम्य-रचना कामिनी ,

प्रेरणा बन कर कोई ये सब कराता है !

मैं नहीं लिखता ; कोई मुझसे लिखता है !

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जब कलम धागा बनी ; शब्द-मोती को पिरोती ,

कैसे भाव व्यक्त हो ? स्वयं ही शब्द छाँट लेती ,

कौन है जो शब्दाहार यूँ बनाता है ?

मैं नहीं लिखता कोई मुझसे लिखाता है !

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सन्देश-प्रेषित कर रहा वो अदृश्य कौन ?

हम अबोध क्या कहें ! जब वो स्वयं है मौन !

वो कवि से काव्य अनुपम रचाता है !

मैं नहीं लिखता कोई मुझसे लिखाता है !

 शिखा कौशिक 'नूतन'

रविवार, 24 मई 2015

विरोध -प्रदर्शन



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शहर में हुए छोटी बच्ची के साथ बलात्कार के विरोध-प्रदर्शन हेतु विपक्षी पार्टी ने पाँच-पाँच सौ रूपये में झोपड़-पट्टी में रहने वाले परिवारों की महिलाओं को छह घंटे के लिए किराये पर लिया था . विपक्ष के पार्टी कार्यालय से पार्टी द्वारा वितरित वस्त्र धारण कर व् हाथों में बैनर लेकर , दिए गए नारे लगाते हुए महिलाओं का काफिला सरकार की मुखिया के आवास की ओर बढ़ लिया . तभी उसमे सबसे जोर से नारे लगा रही कार्यकर्ती के मोबाइल की घंटी बजी .उसने सोचा जरूर पांच नंबर के बंगले वाली मोटी का फोन होगा .कह दूँगी आज बच्चा बीमार है कल को आउंगी . पर कॉल घर से थी .उसने रिसीव करते हुए पूछा -''क्यों किया बबली फून ?'' बबली हकलाते हुए बोली -'' मम्मी वो भाई ने हैण्ड पम्प पर पानी भरने आई सुमन का दुपट्टा खीचकर खुलेआम उसके साथ छेड़छाड़ कर दी .बहुत पब्लिक इकट्ठी हो गयी है .भाई बहुत पिटेगा आज ! जल्दी आजा मम्मी !'' कार्यकर्ती जोश में बोली -'बबली तू चिंता न कर ...देंखूं कौन हाथ लगावे है मेरे बेटे को ? ससुरी इस सुमन में धरा क्या है ? मैं दस मिनट में पहुँचरी बबली ..तू घबरावे ना !'' ये कहकर कार्यकर्ती काफिले से अलग होकर अपने इलाके की ओर बढ़ चली !

शिखा कौशिक 'नूतन'

बुधवार, 13 मई 2015

खट्टी -मीठी यादें !


खट्टी -मीठी यादें !
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टूटे  फूटे  वादे    ,कभी     ताने  और     फरियादें     ,
इनसे   ही   बन   जाती   हैं   खट्टी मीठी यादें .

फूलों   के   जैसे   हँसना   ,आँखों   से   मोती   झरना   ,
मरते   मरते   जीना   ,कभी    जीते   जीते   मरना   ,
ऐसे   जुड़ते   जाते   किस्से   ये   सीधे   सादे   .
इनसे   ही   बन   जाती   हैं   खट्टी मीठी यादें .
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गले लगाकर मिलना ,लड़ना और झगड़ना ,
ममता की बरसातें और कभी क्रोध में तपना ,
फिर भी जुड़ते जाते टूटे रिश्तों के धागे .
इनसे ही बन जाती हैं खट्टी मीठी यादें .
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कभी जेठ की गर्मी ,सावन की कभी फुहारें ,
कभी अमावस की रजनी ,कभी पूनम के उजियारे ,
कुदरत रोज बजाती नए सुरों में बाजें .
इनसे ही बन  जाती हैं खट्टी मीठी यादें .
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SHIKHA KAUSHIK 'NUTAN'



रविवार, 26 अप्रैल 2015

''कुदरती इन जलजलों से कांपती इंसानियत ''


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हर तरफ मायूसियाँ ,चेहरों पर उदासियाँ ,
थी जहाँ पर महफ़िलें ;है वहां तन्हाईयाँ !
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कुदरती इन जलजलों से कांपती इंसानियत ,
उड़ गयी सबकी हंसी ;बस गम की हैं गहराइयाँ
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क्यूँ हुआ ऐसा ;इसे क्या रोक हम न सकते थे ?
बस इसी उलझन में बीत जाती ज़िन्दगानियाँ !
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है ये कैसी बेबसी अपने बिछड़ गए सभी
बुरा हो वक़्त ,साथ छोड़ जाती हैं परछाइयाँ !
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ज़लज़ले जो बन कहर छीन लेती ज़िन्दगी
ज़लज़ले को मौत कहने में नहीं बुराइयाँ !
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हे प्रभु कैसे कठोर बन गए तुम इस समय ?
क्या तुम्हे चिंता नहीं मिल जाएँगी रुसवाइयां !
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शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

''दिल मेरा तैयार है ''


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ग़म का समंदर पी जाने को दिल मेरा तैयार है !
मर -मर कर यूँ जी जाने को दिल मेरा तैयार !
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दर्द नहीं अब दिल में होता किस्मत की मक्कारी पर ,
ठोकर खाकर उठ जाने को दिल मेरा तैयार है !
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जितना शातिर बन सकता है बन जाने दो दुश्मन को ,
रोज़ नए धोखे खाने को दिल मेरा तैयार है !
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लुटते अरमानों की लाशें हमनें देखी चुप रहकर ,
सदमें सारे सह जाने को दिल मेरा तैयार है !
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आँसू -आहें नहीं निकलती 'नूतन' ग़म से टकराने पर ,
अब फौलादी बन जाने को दिल मेरा तैयार है !


शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 18 अप्रैल 2015

''जागरूक महिलाएं !''


भावना को सब्ज़ी मंडी से लौटते  हुए अचानक अपनी सहेली अनु मिल गयी .इधर-उधर की बातों के बाद दोनों की बातों के केंद्र में दोनों के बच्चे आ गए .भावना मुंह बनाते हुए बोली - क्या बताऊँ ! मेरा बेटा आठ साल का है और फेसबुक पर दिन-रात पता नहीं अपनी गर्ल-फ्रेंड  से क्या चैट करता रहता है .मैं रोकती हूँ तो कहता है सुसाइड कर लूँगा !'' अनु बड़ा सा मुंह खोलकर ''हा !'' करती हुई बोली -'' क्या बताऊँ मेरी बेटी ने भी नाक में दम कर रखा है . मोबाइल पर  व्हाटस एप पर दिन भर आँख गड़ाए रहती है . अभी सातवें साल में है . पढ़ने को कहो तो बहाने बनाती है . तंग करके रख दिया है !'' भावना उसके सुर में सुर मिलाते हुए बोली - हां ये तो है .वैसे भी कितना टाइम हम बच्चों पर लगा सकते हैं .घर के काम के बाद कुछ शॉपिंग , किटी पार्टी और पसंद के सीरियल ..सब कुछ छोड़ दें क्या !'' अनु भावना का समर्थन करते हुए बोली -'' ...और क्या .हम कोई सिक्टीस -सवेन्टीस की माँ है क्या ? जिनकी अपनी लाइफ ही नहीं होती थी...सुबह से शाम तक बस बच्चे..बच्चे..बच्चे  ...आफ्टर ऑल ..हम आज की जागरूक महिलाएं हैं . ''

शिखा कौशिक 'नूतन'

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

हम इंसान हो गए -लघु कथा

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हम इंसान हो गए -लघु कथा

खुशबू कालेज जा रही थी . बीच रास्ते में उसकी सेंडिल की हील निकल गयी . पीछे से आती एक बाइक रुकी .खुशबू ने मुड़कर देखा तो ये साहिल था .साहिल बाइक से उतरा और उसकी सेंडिल हाथ में लेता हुआ बोला -चलो इसे ठीक करा देता हूँ पास में ही एक मोची बैठता है .खुशबू थोड़ा लज्जित होते हुए बोली -अरे आप क्यों मेरे सेंडिल हाथ में लेते हैं किसी ने देख लिया तो क्या कहेगा कि नीच जाति की लड़की की सेंडिल एक ब्राह्मण लड़का हाथ से उठा रहा है .साहिल ठहाका लगाता हुआ बोला -'' चुप से चलती हो या तुम्हें भी उठाना पड़ेगा .'' इस घटना के दो साल बाद साहिल और खुशबू ने प्रेम-विवाह किया तब खुशबू साहिल को वरमाला पहनाते हुए बोली थी -'' आज से तुम मेरी नीच जाति के हो गए या मैं ब्राह्मण हो गयी ?'' साहिल ने उसकी वरमाला पहनते हुए कहा था -'' आज से हम इंसान हो गए .

डॉ.शिखा कौशिक 'नूतन'

रविवार, 29 मार्च 2015

सबसे सुन्दर लड़का -लघु कथा

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वो खूबसूरत लड़की जब सड़क पर चलती थी तब अपने में ही खोई रहती . उसको खबर न होती कि कोई लड़का उसका पीछा कर रहा है . एक दिन एक संकरी गली में उस पीछा करने वाले लड़के ने आगे आकर उसका रास्ता रोक लिया .वो घबराई .उसकी नीली झील सी आँखों में आंसू भर आये .उसने हाथ जोड़कर  कहा - ''मुझे जाने  दो '' .यदि किसी ने मुझे तुमसे बात करते देख लिया तो मेरी बदनामी हो जाएगी .मैं लड़की हूँ ना !'' लड़का थोड़े रोष में बोला -'' तुम क्या समझती हो मैं तुम्हे बदनाम करने के लिए तुम्हारा पीछा करता हूँ .तुम तो इतनी बेखबर होकर चलती हो सड़क पर कि न जाने कब कोई गुंडा-मवाली  तुम्हे कहीं ऐसी ही सूनसान गली में दबोच ले और तुमको हवस का शिकार बना ले .मैं कई दिन से तुम्हे यही समझाने के लिए तुम्हारा पीछा कर रहा हूँ कि तुम एक लड़की हो इसलिए नज़रे उठाकर , सावधान रहकर ,आत्म-विश्वास के साथ सड़क पर चलो .समझी !'' खूबसूरत लड़की ने आँखें उठाकर देखा दुनिया का सबसे सुन्दर लड़का उसके सामने खड़ा था .  

डॉ.शिखा कौशिक 'नूतन'

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

नन्हें से राम लल्ला खेलें दशरथ के अंगना !

! रामनवमी पर्व की हार्दिक शुभकामनायें !
किलकारी मारें बजाकर खन खन कंगना ,
नन्हें से राम लल्ला खेलें  दशरथ के अंगना !


मैय्या कौशल्या उर आनंद लहरे उमड़े ,
पैय्या चले तो पकड़ने को वे दौड़े ,
लेती बलैय्या आँचल में हैं छिपती ललना !
नन्हें से राम लल्ला खेलें  दशरथ के अंगना !

चारों भैय्या मिलकर माखन चुराते हैं ,
बड़े हैं भाई राम सबको खिलाते हैं ,
माटी के बर्तन फोड़ें आये पकड़ में ना !
 नन्हें से राम लल्ला खेलें  दशरथ के अंगना !

राम के मुख की शोभा बरनि न जाये है ,
सुन्दरता देख उन्हें खुद पर लजाये है ,
शोभा की खान राम किसी से क्या तुलना !
 नन्हें से राम लल्ला खेलें  दशरथ के अंगना !

            शिखा कौशिक 'नूतन '

सोमवार, 23 मार्च 2015

अन्नदाता की मौत !

 Video for farmers suciding after rain in up

Farmers commit suicide after rains devastate crops in UP .

इस बार
आसमान से
जल नहीं बरसा
बरसी है आग !
जिसने जला  डाले
किसानों के
सारे ख्वाब !
कोई सदमे से मर गया ,
किसी ने खाया ज़हर ,
कोई फांसी से लटक गया
और कोई गया जल ,
बरसात थी या थी कहर !
ऊपर वाले कैसा
तेरा
इंसाफ ?
खून-पसीने से खड़ी
फसल का
ये कैसा
सत्यानाश ?
हर अन्नदाता की
मौत पर ,
ह्रदय में उठता
है ये प्रश्न ?
किस करुणानिधान ने
किया ये कर्म
इतना निर्मम बन ?

शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 21 मार्च 2015

प्रिय की दृष्टि में प्रेयसी !


पीत वसन में लगती हो तुम

महारानी मधुमास की !

ओढ़ दुपट्टा रंग गुलाबी

लगती कली गुलाब की !

वसन आसमानी कर धारण

खिल जाता है गौर वदन !

लाल रंग के वस्त्रों में तुम

दहकी लता पलाश की !

हरा रंग तो तुम पर जैसे

नयी बहारें लाता है !

हरियाली पीली पड़ जाती

रूप तुम्हारा देखकर !

श्वेत वसन में तुम्हें देखकर

मुझको ऐसा लगता है ,

आई चांदनी आज धरा पर

छवि तुम्हारा धर कर है !



शिखा कौशिक 'नूतन' :

शनिवार, 14 मार्च 2015

औरत बेचीं जाती है

Indian_bride : Portrait of young beautiful  woman in traditional indian costume
नोबल विजेता कैलाश सत्यार्थी कहते हैं कि बेटियां जानवरों की तरह बिकती हैं। उन्हें 5 हजार में खरीदकर एक लाख में बेचा जाता है। देशभर में भीख मांगने वाले बच्चों के पीछे भी बड़े गिरोह का हाथ है।


तोल तराजू  इस  दुनिया  में औरत बेचीं जाती है ,
आग लगे सारी  दुनिया में औरत बेचीजाती है !
......................................................................

गोरी- काली,लंगड़ी -लूली ,लम्बी- छोटी कैसी भी ,
तय कीमत पर बाज़ारों में औरत  बेची जाती है !
..........................................................................

हाय गरीबी तेरे कारण बापों ने बेची बिटिया  ,
उस ही घर में जलता चूल्हा जिसमे औरत बेची जाती है !
............................................................................

नेता अभिनेता व्यापारी सब को होता सप्लाई ,
माल बनाकर कोठी बंगलों में औरत बेची जाती है !
.......................................................

डूब मरे 'नूतन' चुल्लू भर पानी में वे मर्द सभी ,
जिनके रहते इस दुनिया में औरत बेची जाती है !


शिखा कौशिक  'नूतन' 

शनिवार, 7 मार्च 2015

गर्व करो खुद पर कि स्त्री हो तुम !

चुप क्यों रहती हो तुम
घाव क्यों सहती हो तो
क्या दर्द नहीं होता तुम्हे
क्या कोई तकलीफ नहीं होती
आखिर किस मिट्टी की बनी हो तुम
या सिर्फ मिट्टी की ही बनी हो तुम
या इस देह के भीतर कोई आत्मा भी है
क्या वो तुम्हे धिक्कारती नहीं
क्या सम्वेदनाएँ तुम्हारी
कभी तुम्हे खुद के लिये पुकारती नहीं
जानती हो कि जुल्म करने वाले से बड़ा गुनाहगार
जुल्म सहने वाला होता है
फिर क्यों जुल्म किसी के सहती हो तुम
कुछ तो बोलो
लब तो खोलो
बोलो कि तुम मात्र एक देह नहीं हो
दिल है तुम्हारे सीने में जो धड़कता है
एक आत्मा बसती तुममे भी
बोलो कि दर्द तुम्हे भी होता है
जब बिन बात सताई जाती हो
बेवजह कोख में मिटाई जाती हो
जब दहेज की आग में जलाई जाती हो
हवस भरी गिद्ध नजरे
जब तुम्हारे जिस्म को भेदती है
वासना के पंजो तले
जब देह से लेकर आत्मा तक रौंदी जाती है
और उँगलियाँ जमाने की गुनाहगारो की बजाय
तुम्हारे ही चरित्र पर उठाई जाती है
तब किन किन तकलीफों से गुजरती हो तुम
ये सब क्यों नहीं कहती हो तुम
अरे क्यों चुप रहती हो तुम
अरे हाँ बोलोगी भी कैसे
लब खोलोगी कैसे
बचपन से तो तुमने ये ही सीखा है
शर्म स्त्री का गहना है
कोई कुछ भी कहे कुछ भी करे
तुम्हे अपनी मर्यादा में रहना है
संस्कारो की बेडियाँ डाले
घुट घुट के मर जाना
पर आवाज मत उठाना
वरना लोग क्या कहेंगे
क्या सोचेंगे क्या समझेंगे
अरे कोई कुछ नही सोचता तुम्हारे बारे में 
न ही कोई तुम्हे कुछ समझता है
क्योकि खुद को कुछ नही समझती हो तुम
कभी देवी बनाकर मंदिरों में बिठाई गयी
कभी कोठो पर नचाई गयी
कभी डायन कहकर
सरेआम निर्वस्त्र घुमाई गयी
जब चाहा इन ज़मीं के देवताओ ने
व्यक्तित्व से तुम्हारे खिलवाड़ किया
स्वार्थ के लिये जैसे चाहा रूप तुम्हारा गढ़ दिया
और उसे ही अपना मुकद्दर मानबैठी हो तुम
माँ हो बेटी हो
बहन हो बीवी हो
हर रिश्ते तुम्हे याद रहते है
पर तुम्हारा खुद से भी है इक रिश्ता
ये क्यों भूल जाती हो तुम
इन सबसे परे खुद का भी
इक अस्तित्व है तुम्हारा
कि इन सबसे जुदा
इक व्यक्तित्व है तुम्हारा
 आखिर किस बात की कमी है तुममे 

क्यों खुद को औरो से हीन समझती हो तुम 
महसूस तो करो जरा कि देखो 
दुनिया के इस चमन अपने हुनर की खुश्बू लिये 
किस कदर खिलती हो तुम
अरे पहले ढूंढो तो खुद को फिर देखो
 धरती से लेकर अंतरिक्ष तक 
कामयाबी की दास्ताँ लिखती हुई मिलती हो तुम
रचा है तुम्हे भी खुदा ने अपने हाथो से
कि उस ईश्वर की सबसे खूबसूरत कृति हो तुम
गर्व करो खुद पर कि स्त्री हो तुम!

शिल्पा भारतीय"अभिव्यक्ति"

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

''मुबारकबाद देते हैं !''


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हमारी जीत को जो हार बना मात देते हैं !
वही हंसकर गले मिलकर मुबारकबाद देते हैं !
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बड़े हमदर्द बनकर दे रहे गम में जो तसल्ली ,
वही तो साज़िशें रच क़त्ल को अंजाम देते हैं !
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मेरी बदनामियों पर हो खफा दुनिया से भिड़ जाते ,
मुझे बदनाम कर ये इस हुनर से काम लेते हैं !
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नहीं हममें अक़्ल जो जान लें वे दोस्त या दुश्मन ,
मगर हम बेअक़्ल  शातिर सभी पहचान लेते हैं !
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बड़े मासूम हैं ; नादान हैं ; क्या कहें 'नूतन '
जो हमको क़त्ल कर कातिल का हमें नाम देते हैं !

शिखा कौशिक 'नूतन'

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

मेरी बहन-तेरी बहन प्रेमिका !!!


मेरी बहन बहन ...तेरी बहन प्रेमिका !!!
[google se sabhar ]

लड़का लड़की ने मिलकर सोचा 
''प्रेम ही सब कुछ  है  ''
हम दोनों  एक  दूजे  के  
बिना   मर   जायेंगे  !
माता  -पिता बहन-भाई 
ये सब क्या खाक साथ निभायेंगें ?
वैसे भी हम अपनी भलाई जानते हैं 
इसीलिए मर्यादा ;नैतिकता;
पारिवारिक नियंत्रण को हम नहीं मानते हैं .
दोनों योजना बनाकर फरार हो गए ;
घरवालों ने मिन्नतें की 
तो लौट आने को तैयार हो गए ,
जिस  दिन दोनों का विवाह हुआ 
एक और हादसा हो गया ;
लड़की का भाई लड़के की बहन 
को लेकर रफूचक्कर हो गया .
जो लड़का खुद किसी और की 
बहन को लेकर भागा था 
आज  उसके सिर शैतान सवार हो गया ;
बोला बदचलन बहन को 
सबक सिखाऊंगा ;
मर्यादा लांघी है परिवार की 
इसका मज़ा चखाऊंगा ,
ढूँढकर  दोनों को ज्यों ही 
रिवाल्वर साले पर तानी 
साले ने भी जेब से पिस्टल निकाली 
बोला -ये बदला है मेरे परिवार की
इज्ज़त  से खेलने का ;
मैंने  भी तुम्हारी इज्ज़त 
मिटटी   में मिला डाली !!!!!

                                          शिखा कौशिक 'नूतन'
                                            

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

शुक्र मना बिटिया


शुक्र मना बिटिया रानी 
Sweet : Little Girl in Gray Sweater and Flower

शुक्र मना बिटिया रानी 
लेने  दिया  हमने  जन्म तुझे ;
वरना निपटाते  कोख में ही 
क्यों बात नहीं तू  ये समझे ?
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शुक्र मना बिटिया रानी 
तेरा ब्याह किया ; दहेज़ दिया ;
तेरी खातिर तेरे बाप ने है 
अपमान का कितना गरल पिया ! 
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शुक्र मना बिटिया रानी 
पतिदेव ने केवल पीट दिया ;
कितने पतियों ने पत्नी को 
निज अहम् की आग में झोंक दिया .
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शुक्र मना बिटिया रानी    

तू मरी सुहागन दुनिया में  ;
जीवन भर किया ज़लील  तुझे  
पर श्राद्ध किया बड़ी श्रद्धा से !!!

                                       SHIKHA KAUSHIK 


रविवार, 15 फ़रवरी 2015

बीवी .... शौहर


बीवी और शौहर

Woman victim of domestic violence and abuse. Husband beats his wife


रात भर जागी  बीवी दर्द से जो तडपा शौहर ;
कभी बीवी के लिए क्यों नहीं जगता शौहर ?
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करे जो काम बीवी फ़र्ज़ हैं उसको कहते ;
अपने हर  काम को अहसान क्यों कहता शौहर ?
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रहो हद में ये हुक्म देता बीवी को ;
मगर खुद पर कोई बंदिश नहीं रखता शौहर .
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नहीं है हक़ बीवी को उठा ले आँखें ;
जरा सी बात पर क्यों हाथ उठाता शौहर ?
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शौहर के लिए दुनिया छोड़ देती बीवी ;
कहे  दुनिया  तो उसी को छोड़ता शौहर .


शिखा कौशिक 'NUTAN  '

रविवार, 18 जनवरी 2015

''सुना कुत्तों की दावत है !''


Stormy Clouds Weather Stock Photo - 19770770
कहर बरसा  मेरे घर तो वो बोले सब सलामत है ,
गई छींटें जो उनकें घर तो बोले अब क़यामत है !
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मेरे बच्चों ने पी पानी गुज़ारी रात सारी है ,
बराबर के बड़े घर में सुना कुत्तों की दावत है !
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बिना गाली के जिनकी गुफ्तगूं होती नहीं पूरी ,
हमें इलज़ाम देकर कह रहे हम बे-लियाकत हैं !
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क़त्ल करते हैं और लाशों पे जो करते सियासत हैं ,
नहीं मालूम उनको एक अल्लाह की अदालत है !
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हमारे हाथ में है जो कलम वो सच ही लिखेगी ,
कलम के कातिलों से इस तरह करनी बगावत है !


शिखा कौशिक 'नूतन'

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

नारी देह मात्र बच्चा पैदा करने के लिए नहीं .



 जागरण ब्यूरो, कोलकाता। विकास के एजेंडे पर चल रही केंद्र सरकार की राह में भाजपा नेताओं के बेतुके बयान रोड़ा बन रहे हैं। हिंदुओं से चार बच्चे पैदा करने की अपील करने वाले भाजपा सांसद को पार्टी ने नोटिस भेजा ही था कि मंगलवार को पश्चिम बंगाल में भी एक भाजपा नेता ने ऐसा ही विवादित बयान दे डाला। बीरभूम के जिला स्तर के नेता समीर गोस्वामी ने कहा कि हिंदू महिलाओं को चार नहीं पांच बच्चे पैदा करने चाहिए।
इससे पहले उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले से भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने कहा था कि हर हिंदू को चार बच्चे पैदा करने चाहिए। उनके इस बयान पर उठे विवाद के बाद सोमवार रात खबर आई कि भाजपा ने उन्हें कारण बताओ नोटिस भेजा है।
हिन्दू महिलाओं को कितने बच्चे पैदा करने चाहियें इसे लेकर भाजपा जैसी हिंदूवादी पार्टी के नेताओं के रोज़ नए नए सुझाव आ रहे हैं और ये वे नेता हैं जो महिलाओं को केवल इसी काम के योग्य समझ उनका आह्वान कर रहे हैं क्योंकि ऐसे ही धर्माचार्य नेताओं ने महिलाओं के पूजा पाठ पर लगभग प्रतिबन्ध सा ही आरोपित कर रखा है .इन्हीं के कारण  आज महिलाएं धर्म-अध्यात्म के कार्यों में वर्जित ही मान ली जाती यदि बहुत से बुद्धिजीवी पढ़ी लिखी महिलाओं ने इस क्षेत्र में आगे कदम न बढ़ाया होता . इनकी विचारधारा का महिलाओं के लिए क्या परिणाम रहा है इसे समझने के लिए हमें यह सब भी समझना होगा .
  राजनीति का सुनहरा आकाश हो या बिजनेस का चमकीला गगन ,अंतरिक्ष का वैज्ञानिक सफर हो या खेत -खलिहान का हरा-भरा आँगन ,हर जगह आज की नारी अपनी चमक बिखेर रही है ,अपनी सफलता का परचम लहरा रही है .आज घर की दहलीज को पार कर बाहर निकल अपनी काबिलियत का लोहा मनवाने वाली महिलाओं की संख्या में दिन-दूनी रात चौगुनी वृद्धि हो रही है .पुरुषों के वर्चस्व को तोड़ती हुई महिलाएं आज हर क्षेत्र में घुसपैठ कर चुकी हैं और यह घुसपैठ मात्र पाला छूने भर की घुसपैठ नहीं है वरन कब्ज़ा ज़माने की मजबूत दावेदारी है और इसीलिए पुरुषों की तिलमिलाहट स्वाभाविक है .सदियों से जिस स्थान पर पुरुष जमे हुए थे और नारी को अपने पैरों तले रखने की कालजयी महत्वाकांक्षा पाले हुए थे आज वहां की धरती खिसक चुकी है .
 भारत एक धर्म-प्रधान देश है और यहाँ हिन्दू-धर्मावलम्बी बहुतायत में हैं .धर्म यहाँ लोगों की जीवन शैली पर सर्वप्रमुख रूप में राज करता है और धर्म के ठेकेदारों ने यहाँ पुरुष वर्चस्व को कायम रखते हुए धर्म के संरक्षक ,पालनकर्ता आदि  प्रमुख पदों पर पुरुषों को ही रखा और पुरुषों की सोच को ही महत्व दिया .यहाँ नारी को अपवित्र की संज्ञा दी गयी जिससे वह धार्मिक कार्यों से ,अनुष्ठानों से लगभग वर्जित ही कर दी गयी .बृहस्पतिवार व्रतकथा के अंतर्गत नारी को ब्रह्मा जी द्वारा शापित भी बताया गया है , उसमे वर्णन किया गया है -
   ''......इंद्र द्वारा विश्वरूपा का सिर काट दिए जाने पर जब वे ब्रह्म-हत्या के पापी हुए और देवताओं के एक वर्ष पश्चाताप करने पर भी इंद्र का ब्रह्महत्या का पाप न छूटा तो देवताओं के प्रार्थना करने पर ब्रह्माजी बृहस्पति जी के सहित वहां आये ,उस ब्रह्म-हत्या के चार भाग किये जिसका तीसरा भाग स्त्रियों को दिया ,इसी कारण स्त्रियां हर महीने रजस्वला होकर पहले दिन चण्डालनी,दुसरे दिन ब्रह्मघातिनी ,तीसरे दिन धोबिन के समान रहकर चौथे दिन शुद्ध होती हैं ....'' 

 और इसी अशुद्धता को अवलंब बना नारी को धार्मिक क्रियाकलापों से बहिष्कृत की श्रेणी में ला खड़ा किया गया .उसे ''ॐ '' शब्द के उच्चारण से प्रतिबंधित किया गया .सोलह संस्कारों में से केवल विवाह संस्कार ही नारी के लिए रखा गया और वह भी इसलिए क्योंकि यहाँ उसका सम्बन्ध एक पुरुष से जुड़ता है और पुरुष का नारी से मिलन ही उसके इस संस्कार की वजह बना .यह भी संभव था कि यदि पुरुष का पुरुष से ही विवाह हो सकता होता तो नारी इस संस्कार से भी वंचित कर दी जाती .स्त्रियों को उपनयन संस्कार से भी वंचित रखा जाने लगा जिससे उनका अग्निहोत्र व् वेद और स्वाध्याय का अधिकार भी छीन लिया गया .उनके लिए गायत्री मन्त्र -
  ''ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात ''
  का प्रयोग वर्जित कर दिया गया .गायत्री मन्त्र एक अपूर्व शक्तिशाली मन्त्र है , जिसे रक्षा कवच मन्त्र भी कहा गया है ,यह एक वैदिक मन्त्र है ,यह मन्त्र वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतरता है ,विज्ञान भी इस मन्त्र की महत्ता के आगे नतमस्तक रहता है , इस मन्त्र को आज के समाज से पहले स्त्री जाति के लिए बोलना ,सुनना व् पढ़ना दंडनीय अपराध था और अगर कोई स्त्री इसे सुन लेती थी तो उसके कानों में सीसा घोल दिया जाता था ,पढ़ लेती थी तो जीभ काट दी जाती थी ,लिखने पर हाथ काट दिए जाते और पढ़ने पर आँखें निकाल ली जाती  और भले ही आज शिक्षित ,अभिजात्य वर्ग की स्त्रियों को आज ऐसी बर्बरता से मुक्ति मिल चुकी हो किन्तु अशिक्षित ,असभ्य आदिम जातियों की नारियां आज भी पुरुषों की इस बर्बरता की शिकार हैं .
      नारी का रजस्वला होना उसकी अपवित्रता माना गया और कहा गया कि वह इस कारण न तो व्यास गद्दी पर बैठ सकती है [ रामायण पाठ के लिए जिस आसन पर बैठते हैं उसे व्यास गद्दी कहा जाता है ] और जब व्यास गद्दी पर नहीं बैठ सकती तो रामायण पाठ के सर्वथा अयोग्य है और यह चलन तो आज भी कथित आधुनिक ,अभिजात्य व् उच्च शिक्षित घरों में भी प्रचलन में है जहाँ रामायण पाठ आदि के लिए पुरुष ही अधिकारी माने जाते हैं और वे ही रामायण पाठ करते हैं .नारी के लिए उसकी अपवित्रता का बहाना बना उसे यज्ञ ,वेद अध्ययन से वंचित रखा जाता है और कहा जाता है कि वह इतने कठोर नियमों का पालन नहीं कर सकती ,उसके लिए तो घर परिवार की सेवा में ही यज्ञादि का फल निहित है और इस तरह की भावनात्मक बातों में उलझाकर नारी को यज्ञ ,हवन ,वेद अध्ययन ,अंतिम संस्कार ,श्राद्ध कर्म आदि कार्यों से वंचित रखने का प्रयत्न किया गया और किया जा रहा है जबकि इस अपवित्रता की नींव अर्थात नारी का रजस्वला होना और नारी का इन कार्यों का अधिकारी होने की जो सच्चाई व् वास्तविकता है उसे न कभी सामने आने दिया गया और न ही आने देने का कभी प्रयत्न ही किया गया ,जो कि ये है -

मासिक चक्र -डॉ. नीलम सिंह ,गाइनेकोलॉजिस्ट ,वात्सल्या .लखनऊ कहती हैं -

  ''महिलाओं के जीवन की एक आम अहम घटना है मासिक धर्म या पीरियड्स , पर हमारी सांस्कृतिक स्थितियां ऐसी हैं कि इतनी अहम बात को आमतौर पर लड़कियों को बताया नहीं जाता और जब पहली बार

 
उन्हें पीरियड्स का सामना करना पड़ता है ,तो वे अंदर आये इस परिवर्तन को लेकर काफी दिनों तक डरी-डरी रहती हैं .शहरों में पीरियड्स को लेकर लड़कियों और महिलाओं में जो जागरूकता है ,उतनी काफी नहीं है क्योंकि आज भी ग्रामीण इलाकों में इसे छूत माना जाता है .शहरों में भी ऐसा नहीं है कि महिलाएं सार्वजानिक स्थल पर इसके बारे में बात करती हों .'' 
मासिक धर्म को नारी की पवित्रता -अपवित्रता से जोड़ दिए जाने के कारण इस विषय पर बात करने में हिचक महसूस की जाती है जबकि ये महिलाओं की सेहत व् स्वास्थ्य से जुड़ा एक सामान्य चक्र है जिसका असर महिलाओं के हार्मोन्स पर पड़ता है ,उसके स्वभाव पर पड़ता है न की उसके धार्मिक क्रिया कलाप पर .
     मासिक चक्र के बारे में अक्सर महिलाओं की यह धरना होती है की यह एक गन्दा रक्त है और जितना यह शरीर से निकलेगा उतना अच्छा है लेकिन यह बेहद गलत धारणा है .दरअसल मासिक की वजह है गर्भाशय के भीतर एण्डोमीट्रियम लाइन यानि त्वचा की भीतरी दीवार का क्षत होना .यह दीवार जितनी महीन होगी उतना ही रक्तस्राव होगा .इसके कारण शरीर में लौहतत्व की कमी हो जाती है और महिला एनीमिया की शिकार हो सकती है .
क्या है मासिक चक्र -दरअसल मासिक चक्र महिलाओं में एक ऐसा शारीरिक परिवर्तन है जो पूरी तरह से जनन-तंत्र प्रणाली के तहत आता है और प्रजनन के लिए बेहद जरूरी है .हर माह आने वाला मासिक यौवन के आरम्भ और रजोनिवृति के बीच का समय है .मासिक चक्र के दौरान पूर्णतः विकसित महिला के शरीर से डिंबक्षरण के दौरान अंडा निकलता है ,साथ ही गर्भाशय की लाइनिंग ,एण्डोमीट्रियम उसी समय विकसित होती है .डिंबक्षरण के बाद यह लाइनिंग प्रजनित अंडे को तैयार करती है और गर्भधारण होता है .यदि गर्भधारण नहीं हो पाता ,तो एक नया मासिक चक्र होता है .यह एण्डोमीट्रियम और रक्त उत्पादकों का हिस्सा होता है जो योनि के रास्ते बाहर निकलता है . 
Circular flow chart with shiny center with a female figure showing the average number of days days in a menstrual cycle and the period on menstruation and ovulation - stock vector 

आमतौर पर मासिक चक्र औसतन २८ दिन का होता है -
इसके तीन चरण होते हैं -
पहले चरण में माहवारी [एक से पांच दिन तक ]
हार्मोन्स चक्र [६ से १३ दिन तक ]
प्रजनन के लिए उपयुक्त [१४ से २८ ]
     इस प्रकार यह माहवारी पूर्णतः महिलाओं की गर्भधारण की क्षमता से जुड़ा मासिक चक्र है जिसे भारतीय समाज में फैली अशिक्षा ,अज्ञानता व् पुरुष वर्ग की नारी जाति पर आधिपत्य की भावना के कारण पूर्णरूपेण उसके पवित्र-अपवित्र होने से जोड़ दिया गया और परिणामतः उसे धार्मिक क्रियाकलाप से वर्जित की श्रेणी में खड़ा कर दिया गया .नारी जाति द्वारा स्वयं पुरुषों की सोच को ऊपर रखना ,घर गृहस्थी के कार्यों के लिए उनके अधीन होना और अशिक्षित होना भी उसे अपवित्र बनाता चला गया जबकि प्राचीन काल की जो राजसी व् ब्राह्मण कन्यायें थी वे उच्च शिक्षित होने के कारण वे सभी धार्मिक कार्य करती थी जो पुरुष वर्ग किया करता था .कैकयी ,कौशल्या ,सीता ,सावित्री आदि राजवधू व् राजकन्याएँ जहाँ गायत्री मन्त्र का खुले रूप में उच्चारण करती थी वहीं गार्गी ,अपाला ,विदुषी आदि ब्राह्मण कन्यायें भी गायत्री मन्त्र का उच्चारण करती थी .
     हमारी भारतीय सामाजिक संरचना आरम्भ से ही ऐसी रही कि पुरुष घर के बाहर की जिम्मेदारियां सँभालते रहे और महिलाएं घर-परिवार और उससे जुडी जिम्मेदारियां निभाती रही .घर के धार्मिक रीति-रिवाजों में सक्रियता ने महिलाओं को सामाजिक परिवेश में भी धार्मिक रूप से सक्रिय किया .यहाँ भी पुरुषों ने नारी को केवल श्रोता की भूमिका तक सीमित करने का प्रयास करते हुए उसे अशुद्ध शरीर की संज्ञा दी किन्तु नारी ने अपनी आध्यात्मिक सक्रियता और धार्मिक आयोजनों से प्राप्त उच्च ज्ञान को हासिल कर पुरुषों को उनके ही जाल में फंसा दिया और परिणाम यह हुआ कि आज महिलाएं प्रवचन भी दे रही हैं .गृह प्रवेश की पूजा से लेकर शादी और श्राद्धकर्म भी करवा रही हैं यानि अब इस क्षेत्र में भी सामाजिक बेड़ियां टूट रही हैं .पिछले २० सालों में काफी संख्या में महिलाएं पुजारी बन रही हैं .धार्मिक कर्मकांड को उसी कुशलता से करवा रही हैं जिस कुशलता से पिछले कई सालों से पुरुष पुजारी करवाते रहे हैं .लखनऊ की मीनाक्षी दीक्षित ,सावित्री शुक्ला व् सरिता सिंह आदि कुछ ऐसी ही उदाहरण हैं .मीनाक्षी की उम्र तो मात्र २४ साल है और वह कई जगहों पर पूजा पाठ और मुंडन संस्कार ,जन्मदिन संस्कार आदि करवा चुकी है .पुणे स्थित महिला पुजारी मञ्जूषा के अनुसार ,'' धार्मिक रीति रिवाजों में महिलाओं की भूमिका हमेशा से रही है और इसे कोई नकार भी नहीं सकता .''
    भारतीय समाज में आध्यात्मवाद एवं सांसारिकता में समन्वय स्थापित करने का प्रारम्भ से ही प्रयत्न किया गया है .यहाँ त्याग एवं भोग दोनों को ही महत्व दिया गया है .भारतीय संस्कृति में इस बात को विशेष महत्व दिया गया है कि मनुष्य धर्म के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करे .वह संसार में रहता हुआ त्याग व् भोग की ओर प्रेरित हो और अंत में मोक्ष की प्राप्ति करे .इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर एक क्रमबद्ध जीवन व्यवस्था बानी और परिणाम स्वरुप व्यक्ति का जीवन चार भागों में बाँटा गया जिसे आश्रम व्यवस्था कहा गया और इसी आश्रम व्यवस्था का दूसरा आश्रम है ''गृहस्थाश्रम '' जिसमे एक हिन्दू विवाह संस्कार के पश्चात ही प्रवेश करता है और हिन्दुओं के लिए विवाह एक आवश्यक संस्कार एवं कर्तव्य माना गया है .प्रत्येक गृहस्थ से यह अपेक्षा की जाती है कि वह प्रतिदिन ब्रह्मयज्ञ ,देवयज्ञ एवं नृयज्ञ आदि पांच महायज्ञ करे .यज्ञ में पति एवं पत्नी दोनों का होना आवश्यक है .तैतरीय ब्राह्मण नमक धर्मग्रन्थ में उल्लेख है कि बिना पत्नी के पुरुष को यज्ञ करने का कोई अधिकार नहीं है .अविवाहित पुरुष अधूरा है , पत्नी उसका अर्ध भाग है .मर्यादा पुरुषोत्तम राम जब अश्वमेघ यज्ञ करने लगे तो सीताजी की अनुपस्थिति के कारण वह यज्ञ पूरा करने के लिए उन्हें सीताजी की सोने की प्रतिमा बनानी पड़ी थी .
      यह तो रही नारी के पत्नी रूप में सहयोग की बात पर जब बात मुख्य रीति रिवाज को करने की आती है तो पुरुष आगे आ जाते हैं और इस बात की व्याख्या इस रूप में भी की जाती है कि महिलाएं अशुद्ध होती हैं और धार्मिक अनुष्ठानों को करवाने की क्षमता उनमे नहीं है .वे यह भी कहते हैं कि हिन्दू सनातन धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी सोलह संस्कार यज्ञ से ही प्रारम्भ होते हैं एवं यज्ञ में ही समाप्त हो जाते हैं और यज्ञ कौन करा सकता है इस सम्बन्ध में कई स्थानों पर वर्णित है कि उपनयन संस्कार के पश्चात ही व्यक्ति वेद व् स्वाध्याय का अधिकारी बनता है और तत्पश्चात यज्ञ का अधिकारी और स्त्रियां यज्ञ करने की अधिकारी नहीं मानी जाती क्योंकि न तो उन्हें वेदों के अध्ययन का अधिकार प्राप्त है और न ही वे यज्ञापवीत धारण करती हैं और इसी बात को ध्यान में रख पुणे स्थित महिला पुजारी मञ्जूषा कहती हैं कि -'' यही वजह है कि जब मुझ जैसी महिलाएं इस क्षेत्र में आने लगी तो इसका प्रखर विरोध भी हुआ .''
हिन्दू आर्य समाजियों में सर्वविदित है कि महिलाओं का भी उपनयन संस्कार होता है पर इस तथ्य से भी पुरुषों के नारी विरोध पर लेशमात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता ,वे महिलाओं को अपवित्र व् भावुक कह यज्ञ व् श्राद्ध संस्कार जैसे धार्मिक कार्य कराने के अधिकार को सिरे से ख़ारिज कर देते हैं .उनके अनुसार वे इन कठिन रीतियों को सही तरीके से नहीं निभा सकती .
   पर आज यज्ञ , पूजा-पाठ हो या फिर प्रवचन पुरुषों का वर्चस्व टूट रहा है और नारी को अपवित्र व् कमजोर दिखाने का उनका कुटिल जाल भी क्योंकि आज महिलाएं ये सब काम कर रही हैं ,करा रही हैं .माँ आनंदमूर्ति ,माँ अमृतानंदमयी ,साध्वी ऋतम्भरा ,प्रेमा पांडुरंग ,निर्मल देवी आदि नाम बस उदाहरण मात्र हैं कि कैसे ये साध्वी धर्म और आस्था के क्षेत्र में भी अपनी स्थिति मजबूत कर चुकी हैं .माता अमृतानंदमयी उर्फ़ अम्मा पूरी दुनिया में जादू की झप्पी यानी असीम प्रेम बाँटने वाली अम्मा के नाम से प्रसिद्द हैं .संसार भर से आये असंख्य श्रद्धालु इनकी शरण में आकर अपनी समस्याओं और कष्टों से मुक्ति पाते हैं .साध्वी निर्मला देवी कर्मकांड के विपरीत जीवन को सरल बनाने के लिए सहजयोग का प्रवचन देती हैं .मन्त्र के माध्यम से जीवन को कैसे सुखमय और स्वस्थ बनाया जाये यह उनके प्रवचन का मुख्य आधार है .सभी धर्मों में विश्वास करने वाली आनंदमूर्ति गुरु माँ विभिन्न चैनलों पर प्रवचन देने के साथ साथ देश विदेश में होने वाले धार्मिक आयोजनों में भी हिस्सा लेती हैं .
इसके साथ ही शास्त्रीय मत के हिसाब से महिलाओं का श्राद्धकर्म करना भी वर्जित नहीं है .विशेष परिस्थितियों में वह श्राद्धकर्म कर सकती हैं .पुत्र को वंश का प्रतीक कहा गया है .शास्त्रों के अनुसार पुम् नामक नरक से मुक्ति दिलाने वाले को पुत्र कहा गया है लेकिन बेटी को भी पुत्री कहा गया है इसका स्पष्ट अर्थ है कि बेटी को श्राद्धकर्म से अलग नहीं किया गया है .वह श्राद्धकर्म कर सकती है .गरुड़ पुराण में भी महिलाओं के इस अधिकार को शास्त्रसम्मत माना गया है और इसी का परिणाम है कि आज सोच बदल रही है .प्राचीन काल के समान ही नारी को उसके शास्त्र सम्मत ये अधिकार मिल रहे हैं .आये दिन समाचार पत्रों में बेटी द्वारा अपने माता-पिता के अंतिम संस्कार व् श्राद्ध कर्म करने के समाचार सामने आ रहे हैं .प्रसिद्द नृत्यांगना शोभना नारायण के पिता को जब अग्नि देने का प्रश्न उठा तो माँ ने कहा ,'' शोभना देगी .'' विरोध के स्वर उठे किन्तु इंदिरा गांधी के वहां पहुँचने पर और उनके यह कहने पर कि अग्नि शोभना ही देगी शोभना ने ही पिता की चिता को अग्नि दी और दो दिन बाद उनके फूल चुनने शोभना की छोटी बहन रंजना गयी .
  आज इन महिला पंडितों की इच्छाशक्ति और नारी सशक्तिकरण का ही नतीजा है कि भले ही शंकराचार्य इन्हें मान्यता नहीं दे रहे पर समाज इन्हें स्वीकार रहा है .इनकी शुद्ध चित्तवृत्ति और लगन को पुरुषों की अशुद्ध अपवित्र सोच से ऊपर स्थान मिल रहा है .वर्षों से जिस बहकावे में नारी को घेर और उसे निरक्षर रख घर की चारदीवारी में उसकी सुरक्षा देखभाल को केंद्र बना पुरुषों ने जो उसे कूपमंडूक बनाने की चेष्टा की आज वह निष्फल होती जा रही है .विज्ञान उन्नति कर रहा है .शिक्षा पैर पसार रही है . हर तरफ या कहें चंहु ओर ये उजाला फ़ैल रहा है और सच सामने आ रहा है .
      गर्भधारण महिलाओं को माँ बनने के सौभाग्य स्वरुप प्राप्त होता है और यह नारी को ब्रह्मा जी द्वारा प्राप्त वरदान भी है और मासिक धर्म उसी का एक पूर्व चरण ,जिसे पुरुषों द्वारा महिलाओं के दिलों-दिमाग में उनकी अशुद्धता का एक लक्षण बता कर भर दिया गया.वह पुरुष जिसका शुक्राणु [स्पर्म ] महिला के अंडे [एग ] से मिलता है और जो पुरुषों के वंशवृद्धि का जरिया बनता है उसे महिला के शरीर में धारण करने की क्षमता इस सृष्टि से मिली .नौ महीने कोख में उसे संभलकर रख एक नए जीवन को जन्म दे वह पुरुष द्वारा कमजोर अशुद्ध ठहराई गयी और पुरुष मात्र अपने शुक्राणु का स्थानांतरण कर शुद्धता का फरिश्ता बन गया ,जिसे आज के विज्ञान की तरक्की ने और सृष्टि के आरम्भ से मौजूद हमारे आध्यात्म दोनों ने स्पष्ट रूप से खोलकर रख दिया और बता दिया कि ''अशुद्ध नारी शरीर नहीं बल्कि पुरुष सोच है .''और नारी मन यह जान बस इतना ही कह पाया -
   ''हमीं को क़त्ल करते हैं हमीं से पूछते हैं वो ,
    शहीदे नाज़ बतलाओ मेरी तलवार कैसी है .''
और आज ये महिलाओं के शरीर को मात्र अपनी जनसँख्या बढ़ाने का माध्यम समझ उन्हें इस काम में ही झोंक देना चाहते हैं  वैसे तो नारी शरीर मात्र बच्चा पैदा करने के लिए नहीं किन्तु जैसी कि नारी हमेशा से पुरुष की इच्छा को तरजीह देती आई है ऐसे में अब ये सब तो तभी संभव है जब ये महिलाओं की स्थिति एक मानव के रूप में समझें न कि मात्र एक गाय के रूप में जिसे वे जैसे चाहें रस्सी गले में बांधकर चलाते चले और जहाँ चाहें बांध दें .पहले इन फायर ब्रांड नेताओं को स्त्री के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी तभी ये उनसे कोई आह्वान करने की स्थिति में होंगे .

शालिनी कौशिक 
    [कौशल ]