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सोमवार, 22 मई 2017

घाटी अलगाव भूल जा


देर न हो जाये घाटी आज जाग जा ,
मेरी वफ़ा का दे सिला अलगाव भूल जा !
हिंदुस्तान जैसा आशिक न मिलेगा ,
गुमराह न हो सैय्याद की चाल जान जा !
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जो हाथ थाम मेरा साथ चलेगी ,
मंजिल तरक्की की तुझे रोज़ मिलेगी ,
खामोश न रह मेरे संग चीख कर दिखा !
मेरी वफ़ा का दे सिला अलगाव भूल जा !
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नोंचने की है पडोसी की तो आदत ,
अस्मत बचाई तेरी देकर के शहादत ,
नादान न बन आ मेरी हिफाज़त में तू आ जा !
मेरी वफ़ा का दे सिला अलगाव भूल जा !
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करना है फैसला तुझे रख नेक इरादा  ,
मेरी अज़ीज़ तू रही है जान से जयादा ,
है इश्क़ दूध मेरा केसर सी तू घुल जा !
मेरी वफ़ा का दे सिला अलगाव भूल जा !

शिखा कौशिक 'नूतन ''

शनिवार, 20 मई 2017

माँ की नज़रों से ....

माँ की फूंक
चोट पे मरहम
माँ के बोल
मुश्किल समय में दुआ
माँ की गोद
बीमारी में दवा
माँ का हाथ
पीठ पे हौसला
बन जाता है
ये जादू नहीँ तो क्या है
परवाह और फ़िक्र का
माँ की नज़रों से
बच पाना मुश्किल ही नहीँ
नामुमकिन भी है 😊