फ़ॉलोअर

रविवार, 28 जून 2020

नब्बे की अम्मा



नब्बे  सीढ़ी  उतरी अम्मा
मचलन कैसे बची रह गई।।

नींबू,आम ,अचार मुरब्बा
लाकर रख देती हूँ सब कुछ
लेकिन अम्मा कहतीं उनको
रोटी का छिलका खाना था
दौड़-भाग कर लाती छिलका
लाकर जब उनको देती हूँ
नमक चाट उठ जातीं,कहतीं
हमको तो जामुन खाना था।।

जर्जर महल झुकीं महराबें
ठनगन कैसे बची रह गई।।

गद्दा ,तकिया चादर लेकर
बिस्तर कर देती हूँ झुक कर
पीठ फेर कर कहतीं अम्मा
हमको खटिया पर सोना था
गाँव-शहर मझयाये चलकर
खटिया डाली उनके आगे
बेंत उठा पाटी पर पटका
बोलीं तख़्ते पर सोना था

बाली, बल की खोई कब से
लटकन कैसे बची रह गई।।

फगुनाई  में  गातीं कजरी
हँसते  हँसते  रो पड़ती  हैं
पूछो यदि क्या बात हो गई
अम्मा थोड़ा और बिखरती
पाँव दबाती सिर खुजलाती
शायद अम्मा कह दें मन की
बूढ़ी सतजुल लेकिन बहकर
धीरे-धीरे    खूब    बिसुरती

जमी हुईं परतों के भीतर
विचलन कैसे बची रह गई?

-कल्पना मनोरमा
28.6.20

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

माँ की बिंदी !!

ये स्वर ये व्यजंन हिंदी के,
सारे रंग हैं माँ की बिंदी के !!


गुरुवार, 15 अगस्त 2019

बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ

स्वतंत्रता दिवस व रक्षाबंधन पर्व की बहुत-बहुत बधाई व अशेष शुभकामनाएँ.

शनिवार, 10 अगस्त 2019

बहुत जांबाज हैं कश्मीरी लड़कियां

फेसबुक से लक्ष्मण सिंह देव जी ने कश्मीरी बहन - बेटियों का सही परिचय दिया है. आप भी पढ़िये -