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मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

''स्व-वित्त पोषित संस्थान में ''



 शीर्षक - ''स्व-वित्त पोषित संस्थान में ''


स्व-वित्त पोषित संस्थान में
जो विराजते हैं ऊपर के पदों पर,
उनको होता है हक
निचले पदों पर
काम करने वालों को
ज़लील करने का,
क्योंकि
वे बाध्य नहीं है
अपने किये को
जस्टिफाई करने के लिए .

स्व-वित्त पोषित संस्थान में
आपको नियुक्त किया जाता है,
इस शर्त के साथ कि
खाली समय में आप
सहयोग करेंगे संस्थान के
अन्य कार्यों में,
सहयोग की कोई सीमा नहीं और
प्रशासन संतुष्ट हो
ये जरूरी नहीं,
क्योंकि नियुक्त व्यक्ति
की स्थिति उस गरीब
लड़की से बेहतर नहीं होती
जो ब्याह दी जाये
जरा ऊँचे घर में,
उसके हर काम से
असंतुष्ट रहते हैं ससुरालिये,
सुनाई जाती है खरी खोटी ;
दिन रात, प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रूप से ,
सुनना उसका नसीब है,
क्योंकि वो बहू भले ही अमीर हो
पर बेटी तो गरीब है.

स्व-वित्त पोषित संस्थान में
उच्च पदस्थ विभूतियाँ ,
हर मुद्दे पर होती हैं सही,
नीचे वाले नहीं कर सकते
तर्क-वितर्क ,
यदि कोई करता है
बखेड़ा खड़ा
तो दिया जाता है उसे
धमकी भरा उदाहरण
'एटीटयूड चेंज करो अपना '
हमने 'फलाना' को गत वर्ष कह दिया था
बिस्तर बांध लो अपना,
वैसे भी कोई काम नहीं रूकता
किसी के चले जाने से,
चल रहा था हमारा काम
पहले भी आपके आने से.

स्व-वित्त पोषित संस्थान में
तैयार रहिये कटु-वचन सुनने के लिए ,
और बदतमीज़ आंसुओं से कहो
आँखों से बाहर मत आने के लिए ,
क्योंकि ज़हरीली मुस्कान के साथ
आपसे कहा जायेगा
' अब आप रोयेंगें '
हो सकता है  'वो ' महानता
दिखाते हुए
दोनों हाथ जोड़कर
माफ़ी मांग ले ;
पर आप किसी गुमान में न रहें ,
वो तुरंत कह सकते हैं
' मैं माफ़ी इसलिए नहीं मांगता
क्योंकि मुझे कोई गिल्टी है ;
मुझे तो बस
मामला
निपटाने की जल्दी है .'

स्व-वित्त पोषित संस्थान में
नियंत्रित किया जायेगा
आपका सहकर्मियों से
मिलना-जुलना ,
रखी जाएगी पैनी नज़र
और तलब किये जा सकते हैं आप ;
पूछा जायेगा फरमान न मानने का कारण ,
इशारों में बता दिया जायेगा
कि नहीं माने तो आपको भी
' हल्क़े ' में लिया जायेगा .

स्व-वित्त पोषित संस्थान में
आप ' टूल' हैं अधिकारी के ;
वो जैसे चाहे आपका उपयोग कर सकता है ,
' टूल' बिगड़ने पर मरम्मत के तौर पर
आपसे पूछा जा सकता है
' क्या तकलीफ है आपको ?'
आप बताकर ; बिंदु से
कुछ दूर चलेंगें ,
वो समझायेंगे
तकलीफ तो हर काम में होती है ,
और थोड़ा घुमायेंगें
अर्द्ध-वृत्त बनायेंगें ,
आप उन्हें सह्रदय जान
थोड़ी सहानुभूति पाने के लिए
प्रयास करेंगें ,
अर्द्ध-वृत्त से आगे बढेंगें ,
बस उनका पारा चढ़ जायेगा
आँखें दिखाकर कहेंगें
' यदि नहीं कर सकते तो घर बैठो ''
और वृत्त पूरा हो जायेगा .

स्व-वित्त पोषित संस्थान में
आपसे बड़ा स्वाभिमान
ऊपर वालों का है ,
उसके बाद उनकी
बहन-भाभी
भाई-देवर का है ,
आपकी नहीं औकात
आप उन्हें इग्नोर करें ,
उनकी मीठी-मीठी बातों पर
न गौर करें ,
यदि भूल से भी आप
ऐसी भूल करते हैं ,
वार गर्दन पर अपनी
अपने आप करते हैं .

स्व-वित्त पोषित संस्थान में
गैर-कानूनी है छुट्टी की मांग ,
किसी के समर्थन में खड़ा होना
फंसा देना फटे में टांग ,
अन्याय के विरूद्ध बोलना
असहनशीलता है ,
मौन रहकर देखना
शालीनता है .

स्व-वित्त पोषित संस्थान में
इंसानी तहज़ीबों से दूर रहें ,
क्योंकि आप एक वस्तु हैं ;
जब तक आप में हैं उपयोगिता का गुण,
वो आपको रगड़ेंगे ,निचोंड़ेंगे
और फिर रिप्लेस कर देंगें
क्योंकि बाजार में नित नए
आइटम आ रहे हैं जो
आपसे अधिक उपयोगी हैं ;
टिकाऊँ हैं ,
इसलिए
सावधानी से जॉब करते रहिये ,
वे ढोलक पकड़ाएं पकड़ते रहिये ,
वे सुनाये सुनते रहिये ,
चापलूस सहकर्मियों की पॉलिटिक्स
से बचकर रहिये ,
स्वाभिमान को जेब में रखिये ,
जय भारत माँ की कहिये !
जय भारत माँ की कहिये !

शिखा  कौशिक 'नूतन'

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

बासंती पर्व !!!!

बसंत पंचमी को
माँ सरस्वती का वन्दन
अभिनंदन करते बच्चे आज भी
विद्या के मंदिरों में
पीली सरसों फूली
कोयल कूके अमवा की डाली
पूछती हाल बसंत का
तभी कुनमुनाता नवकोंपल कहता
कहाँ है बसंत की मनोहारी छटा ?
वो उत्सव वो मेले ???
सब देखो हो गए हैं कितने अकेले
मैं भी विरल सा हो गया हूँ
उसकी बातें सुनकर
डाली भी करुण स्वर में बोली
मुझको भी ये सूनापन
बिलकुल नहीँ भाता !!
....
विचलित हो बसंत कहता
मैं तो हर बरस आता हूँ
तुम सबको लुभाने
पर मेरे ठहरने को अब
कोई ठौर नहीं
उत्सव के एक दिन की तरह
मैं भी पंचमी तिथि को
हर बरस आऊंगा
तुम सबके संग
माता सरस्वती के चरणों में
शीष नवाकर
बासंती पर्व कहलाऊंगा !!!!

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

'हर ज़ख्म छिपाना पड़ता है '

अपनों की गद्दारी का ;
हर ज़ख़्म छिपाना पड़ता है !
गैरों के  अपनेपन  से  ;
ये दिल बहलाना पड़ता है !
.......................................
है मालूम हमें मक्कारी  ;
पीठ के पीछे करता है ,
पर महफ़िल में हंसकर उससे ;
हाथ मिलाना पड़ता है !
.......................................
धोखा खाकर भी न सम्भले ;
मौत के मुंह तक आ पहुंचे ,
हमदर्दों की हमदर्दी का ;
मोल चुकाना पड़ता है !
....................................
मेरे कातिल खड़े भीड़ में ;
मातम खूब मानते हैं ,
हाय ज़नाज़े को कन्धा भी ;
उन्हें लगाना पड़ता है !
.....................................
'नूतन' दिल के टुकड़े-टुकड़े ;
हुए हैं दुनियादारी में ,
जल्लादों के आगे सिर ये ;
रोज़ झुकाना पड़ता है !

शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 23 जुलाई 2016

दीप जलाना सीखा है!

जब जब कंटक चुभे हैं पग में,
मैंने चलना सीखा है,
  अंधियारों से लड़कर मैंने,
दीप जलाना सीखा है!
..........................
अपनों की गद्दारी देखी,
गैरों की हमदर्दी भी,
पत्थर की नरमाई देखी,
फूलों की बेदर्दी भी,
सूखे रेगिस्तानों से
प्यास बुझाना सीखा है!
 अंधियारों से लड़कर मैंने,
दीप जलाना सीखा है!
.........................
समय के संग बदला है मैंने,
अपने कई विचारों को,
फिर से परखा है मैंने
पतझड़ और बहारों को,
अश्रु खूब बहाकर मैंने
अब मुस्काना सीखा है!
 अंधियारों से लड़कर मैंने,
दीप जलाना सीखा है!
...................
पाकर खोना खोकर पाना
जीवन की ये रीति है,
नहीं कष्ट दें किसी ह्रदय को
सर्वोत्तम ये नीति है,
अच्छाई के आगे मैंने
शीश झुकाना सीखा है!
 अंधियारों से लड़कर मैंने,
दीप जलाना सीखा है!

शिखा कौशिक नूतन


गुरुवार, 23 जून 2016

ये मोहब्बत

अरे छोडो ये बनावटी मोहब्बत ये दिखावे के रिश्ते इन झूठे दिखावे से मोहब्बत नहीं की जाती बहुत सारा समय उम्र बीत जाती है मोहब्बत को सजाने में ये बबूल का पेड़ है यहां हर कोई फल नहीं लगा सकता क्योंकि मोहब्बत गुलाब के फूल की तरह होती है किसी के हाथ कांटे गड़ जाते हैं तो किसी के हाथो में खुशबू रह जाती है
काँटे गड़ के भी जख्म ज़िंदगी भरके लिए दे जाते हैं पर खुशबू तो थोड़ी देर ही रह पाती है
छोडो यार ये इश्क़ है ये तुम्हारे बस की बात नहीं यहां दिखावो का खेल नहीं चलता सिर्फ दिल की बात होती है

रविवार, 27 मार्च 2016

मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !

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देख दुःखों में डूबा मुझको ;
जिनके उर आनंद मनें ,
किन्तु मेरे रह समीप ;
मेरे जो हमदर्द बनें ,
ढोंग मित्रता का किंचिंत ऐसा न मुझको भाता !
मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !
 सुन्दर -मँहगे उपहारों से ;
भर दें जो झोली मेरी ,,
पर संकट के क्षण में जो ;
आने में करते देरी ,
तुम्हीं बताओ कैसे रखूँ उनसे मैं नेह का नाता !
मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !
नहीं तड़पता गर दिल उनका ;
जब आँख मेरी नम होती है ,
देख तरक्की मेरी उनको ;
यदि जलन सी होती है ,
कंटक युक्त हार फूल का मुझको लाकर पहनाता !
मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !


शिखा कौशिक 'नूतन '

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

रंग (विषयाधारित

रंग (विषयाधारित)                                                                                                                                            'अब तुम भी अपना रंग दिखाओगी मुझे?, नही मेम साहब रंग नही, सच में मैं, अब काम छोड़ रही हूँ, मेरा मर्द अब सरकारी अस्पताल में ठेके में चपरासी की नौकरी लगा है। अब मैं भी आपकी तरह मेम बनकर घर पर बैठेगी !,बहुत अरसे से हसरत थी। मेम साहब…" मेम साहब mrs. नेहा निशब्द;|
शान्ति पुरोहित