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शनिवार, 10 दिसंबर 2016

'हर ज़ख्म छिपाना पड़ता है '

अपनों की गद्दारी का ;
हर ज़ख़्म छिपाना पड़ता है !
गैरों के  अपनेपन  से  ;
ये दिल बहलाना पड़ता है !
.......................................
है मालूम हमें मक्कारी  ;
पीठ के पीछे करता है ,
पर महफ़िल में हंसकर उससे ;
हाथ मिलाना पड़ता है !
.......................................
धोखा खाकर भी न सम्भले ;
मौत के मुंह तक आ पहुंचे ,
हमदर्दों की हमदर्दी का ;
मोल चुकाना पड़ता है !
....................................
मेरे कातिल खड़े भीड़ में ;
मातम खूब मानते हैं ,
हाय ज़नाज़े को कन्धा भी ;
उन्हें लगाना पड़ता है !
.....................................
'नूतन' दिल के टुकड़े-टुकड़े ;
हुए हैं दुनियादारी में ,
जल्लादों के आगे सिर ये ;
रोज़ झुकाना पड़ता है !

शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 23 जुलाई 2016

दीप जलाना सीखा है!

जब जब कंटक चुभे हैं पग में,
मैंने चलना सीखा है,
  अंधियारों से लड़कर मैंने,
दीप जलाना सीखा है!
..........................
अपनों की गद्दारी देखी,
गैरों की हमदर्दी भी,
पत्थर की नरमाई देखी,
फूलों की बेदर्दी भी,
सूखे रेगिस्तानों से
प्यास बुझाना सीखा है!
 अंधियारों से लड़कर मैंने,
दीप जलाना सीखा है!
.........................
समय के संग बदला है मैंने,
अपने कई विचारों को,
फिर से परखा है मैंने
पतझड़ और बहारों को,
अश्रु खूब बहाकर मैंने
अब मुस्काना सीखा है!
 अंधियारों से लड़कर मैंने,
दीप जलाना सीखा है!
...................
पाकर खोना खोकर पाना
जीवन की ये रीति है,
नहीं कष्ट दें किसी ह्रदय को
सर्वोत्तम ये नीति है,
अच्छाई के आगे मैंने
शीश झुकाना सीखा है!
 अंधियारों से लड़कर मैंने,
दीप जलाना सीखा है!

शिखा कौशिक नूतन


गुरुवार, 23 जून 2016

ये मोहब्बत

अरे छोडो ये बनावटी मोहब्बत ये दिखावे के रिश्ते इन झूठे दिखावे से मोहब्बत नहीं की जाती बहुत सारा समय उम्र बीत जाती है मोहब्बत को सजाने में ये बबूल का पेड़ है यहां हर कोई फल नहीं लगा सकता क्योंकि मोहब्बत गुलाब के फूल की तरह होती है किसी के हाथ कांटे गड़ जाते हैं तो किसी के हाथो में खुशबू रह जाती है
काँटे गड़ के भी जख्म ज़िंदगी भरके लिए दे जाते हैं पर खुशबू तो थोड़ी देर ही रह पाती है
छोडो यार ये इश्क़ है ये तुम्हारे बस की बात नहीं यहां दिखावो का खेल नहीं चलता सिर्फ दिल की बात होती है

रविवार, 27 मार्च 2016

मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !

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देख दुःखों में डूबा मुझको ;
जिनके उर आनंद मनें ,
किन्तु मेरे रह समीप ;
मेरे जो हमदर्द बनें ,
ढोंग मित्रता का किंचिंत ऐसा न मुझको भाता !
मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !
 सुन्दर -मँहगे उपहारों से ;
भर दें जो झोली मेरी ,,
पर संकट के क्षण में जो ;
आने में करते देरी ,
तुम्हीं बताओ कैसे रखूँ उनसे मैं नेह का नाता !
मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !
नहीं तड़पता गर दिल उनका ;
जब आँख मेरी नम होती है ,
देख तरक्की मेरी उनको ;
यदि जलन सी होती है ,
कंटक युक्त हार फूल का मुझको लाकर पहनाता !
मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !


शिखा कौशिक 'नूतन '

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

रंग (विषयाधारित

रंग (विषयाधारित)                                                                                                                                            'अब तुम भी अपना रंग दिखाओगी मुझे?, नही मेम साहब रंग नही, सच में मैं, अब काम छोड़ रही हूँ, मेरा मर्द अब सरकारी अस्पताल में ठेके में चपरासी की नौकरी लगा है। अब मैं भी आपकी तरह मेम बनकर घर पर बैठेगी !,बहुत अरसे से हसरत थी। मेम साहब…" मेम साहब mrs. नेहा निशब्द;|
शान्ति पुरोहित

बुधवार, 27 जनवरी 2016

नियति

नियति
शादी होने में अभी वक़्त था कि सड़क दुर्घटना में रमा का चेहरा विकृत हो गया, सिर्फ एक बार रवि का फोन आया था।
तीन साल होने को आये एक बार भी आकर देखा नही,
शायद अंतर की सुंदरता उसके लिए कोई मायने नही रखती।
अचानक रवि ने रमा को सामने देखा तो अचकचा कर बोला रमा तुम ! हाँ मैं, ही हूँ, मनोज ने मुझे सहारा दिया , आज तो दो कम्पनियों की मालिक हूँ।
तुम्हे तो पता ही था तुम्हारी सुंदरता का ही मैं पुजारी था। रमा! कहाँ खो गयी फिर अतीत में विचरण करने लगी हो क्या?, मनोज ने झिंझोड़ते हुए रमा से कहा।
शान्ति पुरोहित

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

माँ भारती

माँ भारती
"देश की रक्षा के लिए किये जा रहे युद्ध में आज वीर सैनिक रघुवीर प्रताप सिंह की बहुत जरूरत महसूस की जा रही है, अभी भी रवानगी में कुछ दिन बाकी है!
काश वो पहुँच ही जाये।, सेना के बड़े अधिकारी आपस में विचार विमर्श कर रहे थे।,
"माँ , मेरे अलावा तुम्हे देखने वाला कोई नही है ! कैसे छोड़ जाऊँ अकेला इस हालत में ,ये मुझसे नही होगा।
गम्भीर बीमारी से जूझते हुए अस्पताल के बेड पर पड़ी हुई माँ को रघुवीर प्रताप ने कहा।
अरे ! बेटा इस माँ को देखने वाला तो अस्पताल का डॉ है ,पर भारत माँ की रक्षा के लिए तो तुम वीर जवान ही हो जो अपनी जान की परवाह न करते हुए माँ की रक्षा के लिए तैनात रहते हो।, जाओ बेटा भारत माँ तुम्हारी राह देख रही है। ,
शान्ति पुरोहित