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रविवार, 28 जून 2020

नब्बे की अम्मा



नब्बे  सीढ़ी  उतरी अम्मा
मचलन कैसे बची रह गई।।

नींबू,आम ,अचार मुरब्बा
लाकर रख देती हूँ सब कुछ
लेकिन अम्मा कहतीं उनको
रोटी का छिलका खाना था
दौड़-भाग कर लाती छिलका
लाकर जब उनको देती हूँ
नमक चाट उठ जातीं,कहतीं
हमको तो जामुन खाना था।।

जर्जर महल झुकीं महराबें
ठनगन कैसे बची रह गई।।

गद्दा ,तकिया चादर लेकर
बिस्तर कर देती हूँ झुक कर
पीठ फेर कर कहतीं अम्मा
हमको खटिया पर सोना था
गाँव-शहर मझयाये चलकर
खटिया डाली उनके आगे
बेंत उठा पाटी पर पटका
बोलीं तख़्ते पर सोना था

बाली, बल की खोई कब से
लटकन कैसे बची रह गई।।

फगुनाई  में  गातीं कजरी
हँसते  हँसते  रो पड़ती  हैं
पूछो यदि क्या बात हो गई
अम्मा थोड़ा और बिखरती
पाँव दबाती सिर खुजलाती
शायद अम्मा कह दें मन की
बूढ़ी सतजुल लेकिन बहकर
धीरे-धीरे    खूब    बिसुरती

जमी हुईं परतों के भीतर
विचलन कैसे बची रह गई?

-कल्पना मनोरमा
28.6.20

4 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर।

Anita ने कहा…

अम्मा से मिलकर बहुत ख़ुशी हुई, बहुत सुंदर रचना !

रंजू भाटिया ने कहा…

सुंदर रचना

Madhulika Patel ने कहा…

गद्दा ,तकिया चादर लेकर
बिस्तर कर देती हूँ झुक कर
पीठ फेर कर कहतीं अम्मा
हमको खटिया पर सोना था
गाँव-शहर मझयाये चलकर
खटिया डाली उनके आगे
बेंत उठा पाटी पर पटका
बोलीं तख़्ते पर सोना था गद्दा ,तकिया चादर लेकर
बिस्तर कर देती हूँ झुक कर
पीठ फेर कर कहतीं अम्मा
हमको खटिया पर सोना था
गाँव-शहर मझयाये चलकर
खटिया डाली उनके आगे
बेंत उठा पाटी पर पटका
बोलीं तख़्ते पर सोना था,,,,,,,,,।।,बहुत सुंदर रचना,उम्र दराज़ अम्मा,बाबा ऐसे ही हो जातें है,।