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गुरुवार, 20 जून 2013

हकों की बात मत करना

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हकों की बात मत करना

मोहब्बत की करो बातें हकों की बात मत करना ,
कटें खिदमत में दिन-रातें हकों की बात मत करना !

मुनासिब है रहो मसरूफ़ सजने और संवरने  में ,
अक्ल से देना ना मातें हकों की बात मत करना !

नहीं जायज़ ज़माने में खुली घूमें -फिरें औरत ,
तुम्हें हम आज समझाते हकों की बात मत करना !

बगावत करने की मत सोचना हरगिज़ मेरी बेगम ,
ये हैं ख्वाबी करामातें हकों की बात मत करना !

तुम्हें 'नूतन' मैं  गाढ़ दूंगा ज़िन्दा ज़मीन में ,
रही जो आँख दिखाते हकों की बात मत करना !

शिखा कौशिक 'नूतन'

6 टिप्‍पणियां:

Shalini Kaushik ने कहा…

सच्चाई को शब्दों में बखूबी उतारा है आपने आभार . ये है मर्द की हकीकत आप भी जानें संपत्ति का अधिकार -४.नारी ब्लोगर्स के लिए एक नयी शुरुआत आप भी जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

Rajput ने कहा…

बहुत कुछ सोचने पे विवश करती सार्थक रचना

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

मार्मिक सब्जेक्ट पर लिखी रचना | बढ़िया

darshanjangra.blogspot.com ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना

Brijesh Singh ने कहा…

आपकी यह रचना निर्झर टाइम्स (http://nirjhar-times.blogspot.in) पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

Darshan Jangara ने कहा…

सुन्दर रचना