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गुरुवार, 27 मार्च 2014

नज़रे उठा के देखो करता है 'वो' इशारे

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तेरा ही आसरा है , तेरी पनाह में हम ,
मालिक सदा ही रखना बन्दों पे तू करम ,
नेकी के रास्तों पर बढ़ते रहे कदम ,
नफरत मिटा के दिल से भर देना तू रहम !
तेरा ही आसरा है , तेरी पनाह में हम !
..........................................
सबसे करो मोहब्बत मालिक ने हैं सिखाया ,
एक जैसा हम सभी को मालिक ने है बनाया ,
ना कोई ऊँचा-नीचा ना कोई हिन्दू-मुस्लिम ,
एक ही लहू खुदा ने जिस्मों में है बहाया ,
भूलें न उस खुदा को आओ लें ये कसम !
तेरा ही आसरा है , तेरी पनाह में हम
.......................................................
मज़हब का नाम लेकर ना हम किसी को मारें ,
लब पर दुआ अमन की हर पल रहे हमारे ,
दिल न कभी दुखाएं मजबूर आदमी का ,
नज़रे उठा के देखो करता है 'वो' इशारे ,
ज़ख्मों पे हम किसी के आओ लगाएं मरहम  !
तेरा ही आसरा है , तेरी पनाह में हम !
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करनी हमें हिफाज़त महबूब इस वतन की ,
होली जला दें आओ फिरकापरस्ती की ,
हो ईद या दीवाली मिलकर सभी मनाएं ,
रब की यही है मर्ज़ी फूलों से मुस्कुराएं ,
इंसानियत निभाएं जब तक हो दम में दम !
तेरा ही आसरा है , तेरी पनाह में हम !


शिखा कौशिक 'नूतन'

8 टिप्‍पणियां:

Tamasha-E-Zindagi ने कहा…

आपकी यह पोस्ट आज के (२७ मार्च, २०१४) ब्लॉग बुलेटिन - ईश्वर भी वेकेशन चाहता होगा ? पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

देवदत्त प्रसून ने कहा…

रचना बहुत अच्छी है !

Shalini kaushik ने कहा…

sundar bhavabhivyakti .badhai

Anita ने कहा…

बहुत सुंदर संदेश देती भावपूर्ण रचना..

संजय भास्‍कर ने कहा…

संदेश देती भावपूर्ण रचना..

SANJAY TRIPATHI ने कहा…

संदेशपूर्ण और सार्थक!

Unknown ने कहा…

vry-2 nice post......

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सार्थक और प्रेरक रचना...बहुत सुन्दर..