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रविवार, 9 मार्च 2014

''दागी कहलाने लगे आज कल रसूख़ वाले ''

Tired Man Stock Photo
जब से जागा हूँ आज तक सोया ही नहीं  !
कैसे कोई ख्वाब देखूं आज तक सोया ही नहीं !
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ग़मों ने साथ निभाया नहीं छोड़ा तन्हा  ,
है  ऐसा कौन इंसां आज तक रोया ही नहीं !
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उसे मालूम क्या दर्द किसे कहते हैं ,
जिसने अज़ीज़ कोई आज तक खोया ही नहीं !
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दागी कहलाने लगे आज कल रसूख़ वाले ,
दाग इस चक्कर में आज तक धोया ही नहीं !
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बनाकर मुंह न यूँ बैठो बबूल देख 'नूतन' ,
लगेगा आम कैसे  आज तक  बोया ही नहीं !

शिखा कौशिक 'नूतन'

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सत्य को दर्पण दिखाती हुई सुन्दर प्रस्तुति।

जितेन्द़ भगत ने कहा…

सही बात!

sarika bera ने कहा…

wowwww............dil ko chu gayi aapki yah rachna,......