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सोमवार, 24 दिसंबर 2012

दम तोडती संवेदनाएँ


सुना है 
संवेदनाओं का युग                                     
समाप्ति की कगार पर खड़ा 
खड़ा कर रहा है इंतजार 
अपने ख़त्म होने का 
विह्वल हो देख रहा 
लोगों में 
दम तोडती संवेदनाएँ 

बीच सड़क,  निर्वस्त्र पड़ी  

घायल  लड़की के 
जिस्म से टपक रहे खून को 
नज़रंदाज़ कर 
आगे बढ़ गई थी तब 
आज क्यों उबाल पर हैं 
इस कायर समाज की 
नपुंसक  संवेदनाएँ

अबोध बालिका के साथ

बलात्कार की  खबर को ,
सरसरी निगाह से पढ़कर 
अखबार में छपी 
अधनंगी तस्वीरों पर 
आँखों से लार टपकाती 
कुत्सित भावनाएँ 

खाने की मेज़ पर , 
जायकों के बीच
टी.बी. पर आते समाचारों में 
बम धमाके में घायल हुए 
लोगों की चीखों को 
निर्मम हो सुन रहीं 
बहरी संवेदनाएँ 

सड़क पर  पड़े 
घायल अधमरे इंसान के 
चारों  ओर इकट्ठे हुजूम में 
किसी एक हाथ के बढ़ने के इंतज़ार में 
आँख मूँद रही ज़िन्दगी के साथ 
अंतिम साँसें गिन रहीं 
मरणासन्न संवेदनाएँ

भूख से  व्याकुल  कुलबुलाते पेटों पर ,
बम धमाके से उड़ते चीथड़ों पर ,
आग में जले सुलगते जिस्मों पर,
निज क्षुद्र स्वार्थ की रोटियां  सेकते नेताओं की 
माँस पर झपटते गिद्धों  सी 
वीभत्सतर होती जाती 
घृणित संवेदनाएँ
                                          शालिनी रस्तोगी 
                                                


11 टिप्‍पणियां:

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

madhu singh ने कहा…

samvednao se bhari behad gambhir prastuti

Rajesh Kumari ने कहा…

शालिनी जी सही कहा संवेदनाएं दम तोड़ रही हैं पर क्यूँ ???इसकी जड़ों को खोजना है और निवारण ढूँढना है बहुत अच्छा लिखा बधाई आपको

Anita ने कहा…

सही है कि आज संवेदनाएं दम तोड़ रही हैं..पर आज भी निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले हजारों हैं..हमें ज्योति से ज्योति जलानी होगी..

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
सूचनार्थ |

पूरण खंडेलवाल ने कहा…

संवेदनाओं को झकझोरती हुयी रचना !!

Devdutta Prasoon ने कहा…

'हिंसा','इंसानियत के विकास में वाधा है | यौन-हिंसा शरीर के साथ, मनोर आत्मा का भी हनन करती है !

shalini ने कहा…

रचना को पसंद करने व मनोबल बढ़ाने के लिए आप सब का बहुत बहुत आभार!

Aditi Poonam ने कहा…

एक संवेदनशील रचना ,जो सोचने पर मजबूर कर दे

शारदा अरोरा ने कहा…

बहुत संवेदन शील लिखा है ...संवेदनाएं मर नहीं सकतीं ....ये और बात है मशीनी जिंदगी ने संवेदनाओं को गलत दिशा दे दी है ...

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

इसलाम कहता है कि जो लड़का गर्भाधान में प्राकृतिक रूप से सक्षम है, वह बालिग़ है।
दिल्ली के जघन्य रेप कांड के सबसे बड़े शैतान को कल अदालत ने नाबालिग़ क़रार दे दिया है। मनुष्य की बुद्धि अपूर्ण है और ईश्वर की पूर्ण। ईश्वर ने मनुष्य बनाया है तो उसके लिए विधि-विधान भी बनाय है। मनुष्य ने उसके विधि-विधान को नकार दिया और अपने लिए अपनी बुद्धि से कुछ जुगाड़ किया। इसीलिए उसने प्राकृतिक रूप से गर्भाधान में सक्षम बालिग़ व्यक्ति को भी बालक ही बताया। यह ग़लत है। इस बात को ग़लत केवल इसलाम कहता है और कुछ लोगों को इसलाम के नाम से ही चिढ़ है। इसलाम कहता है कि जो लड़का गर्भाधान में प्राकृतिक रूप से सक्षम है, वह बालिग़ है।
आज दुनिया भी यही मानना चाहती है। इसलाम जन मन की स्वाभाविक इच्छा है। इसे दबाया जाएगा तो दुनिया में कभी न्याय नहीं हो पाएगा।
इसलाम का नाम लेकर किसी बादशाह ने आपको इतिहास में कभी कुचल डाला है तो उस बादशाह का विरोध कीजिए। न कि नफ़रत और प्रतिशोध में अंधे होकर आजीवन उसके धर्म का भी विरोध करते रहें ,चाहे वह आपकी समस्याओं का वास्तविक हल ही क्यों न हो !
कृप्या विचार कीजिए, इसी में आपके लोक परलोक की भलाई है।
यह कमेंट निम्न पोस्ट पर दिया गया है, जिसका लिंक व शीर्षक यह है- http://commentsgarden.blogspot.in/2013/01/blog-post_28.html