राष्ट्रपति भवन में अपने पति ले.विक्रमजीत सिंह के मरणोपरांत शौर्य -चक्र लेने पहुंची उनकी पत्नी की आँखें नम हो गयी |
अमर सुहागन !
हे! शहीद की प्राणप्रिया
तू ऐसे शोक क्यूँ करती है?
तेरे प्रिय के बलिदानों से
हर दुल्हन मांग को भरती है.
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श्रृंगार नहीं तू कर सकती;
नहीं मेहदी हाथ में रच सकती;
चूड़ी -बिछुआ सब छूट गए;
कजरा-गजरा भी रूठ गए;
ऐसे भावों को मन में भर
क्यों हरदम आँहे भरती है !
तेरे प्रिय के बलिदानों से
हर दीपक में ज्योति जलती है.
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सब सुहाग की रक्षा हित
जब करवा-चोथ -व्रत करती हैं
ये देख के तेरी आँखों से
आंसू की धारा बहती है;
यूँ आँखों से आंसू न बहा;
हर दिल कीधड़कन कहती है..
जिसका प्रिय हुआ शहीद यहाँ
वो ''अमर सुहागन'' रहती है.
शिखा कौशिक 'नूतन'
3 टिप्पणियां:
सुन्दर भावपूर्ण कविता .....
रचना में 'नारी-ओज को उभार कर अच्छा उदाहरण रखा है !
औरत को पेश आने वाले सारे मसलों में पुरूष को अपने योगदान को तय करना चाहिए और उसे अदा भी करना चाहिए क्योंकि औरत की हालत बेहतर होगी तो उसके बच्चों की हालत भी बेहतर होगी और बच्चों में लड़के भी आते हैं जो कि बड़े होकर मर्द बनते हैं।
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