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शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

श्री राम को वनवास व् रावण की जय जयकार है !


साकेत खंडर हो रहा लंका का नव श्रृंगार है ,
श्री राम को वनवास व् रावण की जय जयकार है !
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लक्ष्मण -भरत सम भ्रात न सीता के सम हैं भार्या ,
मर्यादी अब पुरुष नहीं न शीलमयी नारियां ,
आनंद जीवन में नहीं हर ओर हाहाकार है !
श्री राम को वनवास व् रावण की जय जयकार है !
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क्रोध ,लोभ ,माया-मोह संयम पे हावी हो गए ,
भरी तिजोरी पाप की पुण्य भिखारी भये ,
झूठ के समक्ष सत्य की सर्वत्र हार है !
श्री राम को वनवास व् रावण की जय जयकार है !
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हैं कहाँ गुरु वशिष्ठ जो भरते संस्कार ,
हो रहे विद्यालयों में भी आज दुराचार ,
सदाचरण क्षत -विक्षत मन में चीत्कार है !
श्री राम को वनवास व् रावण की जय जयकार है !
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दंड देगा कौन राजा बन गए खुद चोर हैं ,
लूटकर सबको मचाता खुद लुटेरा शोर है ,
है कोई भोला कहाँ हर कोई अब मक्कार है !
श्री राम को वनवास व् रावण की जय जयकार है !
शिखा कौशिक 'नूतन'

6 टिप्‍पणियां:

02shalinikaushik ने कहा…

very right and nice .

Kuldeep Thakur ने कहा…

आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 28/10/2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
सूचनार्थ।

रविकर ने कहा…

nice

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

क्रोध ,लोभ ,माया-मोह संयम पे हावी हो गए
भरी तिजोरी पाप की पुण्य भिखारी भये ,
झूठ के समक्ष सत्य की सर्वत्र हार है !
श्री राम को वनवास व् रावण की जय जयकार है !

तमो प्रधान कलियुग का मतलब समझा गई ये रचना। बधाई सशक्त लेखन को।

तुलसी के पत्ते सूखे हैं और कैक्टस आज हरे हैं ,

आज राम को भूख लगी है रावण के भण्डार भरे हैं।

कोयला खाता आज आदमी चरागाह सब मरे पड़े हैं ,

सेकुलर चीं चीं चों चों करते भारत धर्मी अलग पड़े हैं।

shikhakaushik06 ने कहा…

aap sabhi ka hardik aabhar

कालीपद प्रसाद ने कहा…

बहुर सुन्दर प्रस्तुति
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