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शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2013

आज विवशता की लंका को आग लगाना है !!


संकट और विपत्ति से नहीं आँख चुराना है ,
जीवन की हर बाधा से सीधे टकराना है !
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निज भुज बल पर हो विश्वास ,सबल मनोबल हो अपना ,
हम यथार्थ में परिणत कर दें ,देखा है जो भी सपना ,
आज विवशता की लंका को आग लगाना है !!
जीवन की हर बाधा से सीधे टकराना है !!
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उमड़-घुमड़ कर आँखों से न हो अब अश्रु-वर्षा ,
कातरता का कटे शीश , ले हस्त शौर्य-फरसा ,
निज दुर्बलता के वध हेतु चंडी बन जाना है !
जीवन की हर बाधा से सीधे टकराना है !!
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हँसे आसुरी शक्ति हम पर , सदा दुर्वचन बोलें ,
नहीं पलायन संघर्षों से , विश्वास न किंचित डोले ,
दुःख-अर्णव पर आशा सेतु हमें बनाना है !
जीवन की हर बाधा से सीधे टकराना है !!
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शिखा कौशिक 'नूतन'

2 टिप्‍पणियां:

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

बेहद उम्दा प्रस्तुति |

मेरी नई रचना:- "झारखण्ड की सैर"

Rajesh Kumari ने कहा…

बहुत उम्दा ओजपूर्ण प्रस्तुति ,बधाई आपको