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शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

''काश न जाते बच्चे स्कूल !''

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 काश उस मनहूस दिन 
सूरज निकलने से 
कर देता मना !
.......................
काश अब्बा न जगाते
स्कूल जाने के लिए 
रोज़ की तरह  !
..........................
काश स्कूल के लिए 
तैयार होते समय 
 टूट जाता जूते का फीता 
और बन जाता 
न जाने का एक बहाना !
...................................
काश अम्मी ही कह देती 
क्या रोज़ रोज़ जरूरी है   
स्कूल जाना !
..................................
काश स्कूल में घुसने से पहले 
आतंकियों के 
कट जाते हाथ !
...............................
काश उस दिन 
ख़ुदा देता 
मासूमों  का साथ  !
............................
काश न जाते
बच्चे स्कूल 
और  
 गोलियों के जगह  
बंदूकों  से निकलते फूल !
...............................
कुछ न हो सका 
न हो पाया 
कोई दुआ न हुई क़ुबूल 
..............................
दरिंदगी की भेंट 
चढ़ गए 
नन्हे मुन्ने रसूल  !

शिखा कौशिक 'नूतन' 

5 टिप्‍पणियां:

Shalini Kaushik ने कहा…

bahut hi hriday vidarak ghatna .bahut hi hriday ko chhune vale shabdon me varnan .

Shalini Kaushik ने कहा…

bahut hi hriday vidarak ghatna .bahut hi hriday ko chhune vale shabdon me varnan .

jyoti dehliwal ने कहा…

काश, इन घटनाओं को रोकना हमारे बस मे होता...!बहुत सुंदर रचना.

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (21-12-2014) को "बिलखता बचपन...उलझते सपने" (चर्चा-1834) पर भी होगी।
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति