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बुधवार, 5 नवंबर 2014

''नारी को मत यूँ करो नग्न !''



मत बहको इतना  कवि-कलम,
मर्यादित हो करना वर्णन ,
श्रृंगार -भाव की आड़ में तुम ,
नारी को मत यूँ करो नग्न !
.............................................
कामदेव के दास नहीं ,
तुम मात शारदा-तनय हो ,
न हो प्रधानता रज-तम की ,
अब सत्व-गुणों की प्रलय हो !
अनुशासित होकर करो सृजन !
नारी को मत यूँ करो नग्न !
.................................
नारी-तन के भीतर जो उर ,
उसमें भावों का अर्णव है  ,
कुच-केश-कटि-नयनों से बढ़ ,
उन भावों में आकर्षण है ,
नारी का मन है सुन्दरतम !
नारी को मत यूँ करो नग्न !
................................
श्रंगारिक रचना एक मात्र ,
कवियों का कर्म न रह जाये ,
नख-शिख वर्णन में डूब कहीं ,
न नारी -गरिमा मिट जाये ,
मत करना ऐसा कभी यत्न !
नारी को मत यूँ करो नग्न !

शिखा कौशिक 'नूतन'

4 टिप्‍पणियां:

देवदत्त प्रसून ने कहा…

गंगा-स्नान/नानक-जयन्ती(कार्त्तिक-पूर्णिमा) की सभी मित्रों को वधाई एवं तन-मन-रूह की शुद्धि हेतु मंगल कामना !
यह बहुत ही आवश्यक संदेश है !

shikha kaushik ने कहा…

badhai

Shanti Garg ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति.... आभार।

Shanti Garg ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति.... आभार।