समर्थक

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

मानव की जय -जयकार !

rising sun
होगी  सुबह ,
दिनकर उदित होगा पुनः ,
निज रथ  पे हो सवार !
...................
हर लेगा तम ,
होगा सुगम ,
जीवन का सब व्यापार !
..............................
छोडो न  आशा  ,
हो व्यथित ,
किंचित करो विचार !
..........................
मानव  हो तुम ,
निज बुद्धि -बल की,
तेज करो धार  !
........................
गिर कर उठो ,
उठकर  बढ़ो  ,
हो तीव्र नित रफ़्तार !
.......................................................
होकर हताश ,
यूँ निराश ,
मान लो मत हार !
................................
तेरी धरा ,
तेरा गगन ,
सृष्टि का कर श्रृंगार !
................
दानवी बाधा   कुचल ,
ब्रह्माण्ड में हो अब सकल ,
मानव की जय -जयकार  !


शिखा कौशिक 'नूतन '






3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (23-11-2014) को "काठी का दर्द" (चर्चा मंच 1806) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Reetesh Gupta ने कहा…

बहुत खूब. बधाई.

विशाल चर्चित ने कहा…

अत्यंत ऊर्जादायी रचना !!!