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शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

मंथन

           सीता के मन मे आज अपने तीस साल के वैवाहिक जीवन के बारे मे मंथन चल रहा है|                                                                                                                                                          ''एक बड़े ऑफिसर की पत्नी हो तुम, अभी तक सलीके से रहना नहीं आया तुम्हे! गाँव को छोड़े बरसो हो गये है|,सीता को उसके पति रामलाल जी ने डाँटते हुए कहा| रामलाल जी को गाँव से शहर आये हुए तीस साल हो गये थे;पर सीता के रहन-सहन के अंदाज मे कोई बद्लाव नहीं आया,और वो चाहती भी नहीं थी| उसका मानना था ,इंसान चाहे दुनिया के किसी भी हिस्से मे जाकर रहे अपने शहर की भाषा,रहन-सहन कभी नहीं भूलना चाहिए| यही कारण था,सीता को अब तक शहर की हवा छु तक नहीं गयी थी|
                                   रामलाल जी और सीता मे अक्सर इस बात को लेकर झगड़ा होता रहता था| पति का स्वभाव बहुत गुसैल था,इसलिए घर मे इतने नौकर होते हए भी सीता उनका हर काम अपने हाथ से करती थी| सुबह से शाम तक सीता घर के काम मे नौकरों की मदद करती रहती थी| उसका सोचना था,घर की ग्रहणी जितना घर को सहेजती है,उतना नौकर नहीं कर सकता|
                                     रामलाल जी सरकारी खजाने मे ए.टी.ओ. की पोस्ट पर थे| पत्नी से कभी प्यार से बात नहीं करते थे;पर ऑफिस मे उनके सद्व्यवहार के और इमानदारी के चर्चे थे| जब तक पति ऑफिस नहीं चले जाते,सीता चैन की सांस नहीं ले पाती थी;पता नहीं कब किस बात पर उनका गुस्सा भडक जाये घर मे अशांति हो जाये| उम्र के इस पड़ाव तक उसने कभी चैन की सांस नहीं ली| फिर भी पति खुश नहीं|
                                     तभी नौकर ने आकर बताया ''मेम साहब,साहब आ गये|, सीता जल्दी से पोर्च की और गयी; देखा पति तमतमाए हुए दरवाजे की और ही आ रहे थे| वो डर के मारे वापस मुड गयी| रसोई घर मे चाय का पानी गैस पर चढाया,नाश्ते की तैयारी मे लग गयी|
                   चाय-नाश्ता लेकर वो बैठक मे गयी| वो तो हैरान रह गयी! पति बहुत गुस्से मे थे| साथ मे एक ऑफिस का कर्मचारी भी बैठा था| जैसे ही सीता बैठक मे पहुंची,उन दोनों मे हो रही बात -चित बंद हो गयी| सीता को कुछ समझ नहीं आ रहा था;हाँ,इतना जरुर वो जानती थी आजकल ये बहुत तनाव मे रहते है पता नहीं क्या हुआ है!
                          नाश्ता टेबुल पर रख कर वो अपने कमरे मे आ गयी| सोचने लगी कुछ तो हुआ है|ये तो मुझे कभी बतायेंगे नहीं| किसी अनिष्ट की आशंका से घबरा कर उसने मन ही मन कुछ तय किया| और वो गाँव की औरत सीता पहली बार अपने पति की आज्ञा के बिना घर से बाहर निकली|
                         रामलाल जी के दोस्त शर्मा जी उन्ही की ऑफिस मे कैशियर थे ;उनके घर जाकर अपने पति के बारे पता लगाया | वो ये सब जान कर हैरान रह गयी! ''भाभी जी हमने आपको बताया नहीं, आपको फ़िक्र हो जाती,रामलाल जी को किसी ने रिश्वत के झूठे केस मे फंसाया है| सब जानते है,वो कितना ईमानदार है,कभी किसी से एक पैसा नहीं लिया तो अब क्या लेगा,अब तो एक साल बाद रिटायर होने वाले है|,शर्मा जी ने कहा |
                                सीता घर आ गयी| शाम को उसने पति से कहा ''आपने अभी तक मुझे अपनी धर्मपत्नी बनने का सौभाग्य नहीं दिया,तभी आप अकेले इतने दिनों से परेशान हो रहे हो,मुझे कुछ नहीं बताया |,
                                 रामलाल जी ने पहली बार पत्नी के प्यार को महसूस करते हुए कहा ''कैसे बताता तुम्हे! कभी प्यार से तेरा नाम तक नहीं लिया| मै भीतर से कमजोर हूँ तेरे प्रति अपना वयवहार सब समझता था;पर बाहर से कठोर हूँ तो कभी तुम्हे अपने प्यार को महसूस ही नहीं होने दिया| पर तुमने फिर भी अपना पत्नी धर्म निभाया,मुझे माफ़ कर देना|पर तुम्हे पता कैसे लगा?
                                  '' मैने आपके दोस्त शर्मा जी से पता लगाया था, आप बिलकुल भी फ़िक्र ना करे,आप पर सबको पूरा भरोसा है| जल्दी ही आप दोष मुक्त हो जाओगे| ,पत्नी से ये सब सुनकर रामलाल जी ने राहत की साँस ली| पत्नी का अपने जीवन मे कितना महत्व है वो आज जान पाए थे|
       शांति पुरोहित
                         
                               

3 टिप्‍पणियां:

Neelima sharma ने कहा…

अच्छी कहानी हैं .......परन्तु जो पुरुष विवाह के ३० वर्षो तक पत्नी के प्यार को नही समझ पाया वोह एक दिन में कैसे बदल गया ? सिर्फ दो लफ्ज़ सुनकर !!!! आश्चर्य ...यहाँ कहानी यथार्थ से परे लगती हैं

Shanti Purohit ने कहा…

Itnne bade sankat se gujra hai patni ke muhh se apne liye itna pyar vo khud ke gussel svabhav hone ke bavjud to privrtan toh aana hi tha

Upasna Siag ने कहा…

sahi kaha jeevn sathi hi aakhir me sachha sathi hota hai ...kai baar kadar bahut baad me hoti hai ....sundar kahani hai aapki , badhai shanti ji