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शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

बेग़म तो घर के भीतर आराम कर रही है !

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ज़हरीली सोच कितना परेशान कर रही है !
बेग़म तो घर के भीतर आराम कर रही है !
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जो सबसे पहले जागती सोती है सबके बाद ,
दिन-रात ख़िदमतों में तमाम कर रही है !
बेग़म तो घर के भीतर आराम कर रही है !
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बच्चें हो या हो शौहर सबको ज़रूरी काम ,
वो गैर-ज़रूरी बन बेगार कर रही है !
बेग़म तो घर के भीतर आराम कर रही है !
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बर्तनों को मांजना कालिख उतारना ,
मल मल के राख खुद को बीमार कर रही है !
बेग़म तो घर के भीतर आराम कर रही है !
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क्या क्या किया शौहर ने सब कुछ गिना रहा ,
'नूतन' खड़ी चुप बेग़म इक़रार कर रही है !
बेग़म तो घर के भीतर आराम कर रही है !
शिखा कौशिक 'नूतन'

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (21-12-13) को "हर टुकड़े में चांद" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1468 में "मयंक का कोना" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कालीपद प्रसाद ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति !
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