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मंगलवार, 3 सितंबर 2013

शामली के हिन्दू-मुस्लिम मिलकर अमन बनायें रखें !


क्या जरूरत है हमें तोप की - तलवार की 
जंग लडनी है हमें तो नफरतों पर प्यार की .

इसमें हर इन्सान के दिल से मिटाने है गिले ;
बंद हो अब साजिशें अपनों के क़त्ल-ओ-आम की .
क्या जरूरत ....

है बहुत मुमकिन की हम हार जाएँ जंग में ;
ये घडी है सब्र की और इम्तिहान की .
क्या जरूरत ....

कल हमें काटा था उसने ;आज हम काटें उसे 
छोड़ दो ये जिद जरा कीमत तो समझो जान की .
क्या जरूरत .....
                                     शिखा कौशिक 'नूतन ' 


8 टिप्‍पणियां:

Darshan jangra ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - बुधवार -4/09/2013 को
मर्त्य देश के निवासी - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः12 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





Kuldeep Thakur ने कहा…

सुंदर रचना...
आप की ये रचना आने वाले शुकरवार यानी 6 सितंबर 2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है... आप इस हलचल में शामिल अन्य रचनाओं पर भी अपनी दृष्टि डालें...इस संदर्भ में आप के सुझावों का स्वागत है...



कविता मंच[आप सब का मंच]


हमारा अतीत [जो खो गया है उसे वापिस लाने में आप भी कुछ अवश्य लिखें]

मन का मंथन [मेरे विचारों का दर्पण]

Rajesh Yadav ने कहा…


बहुत अच्छी रचना !

हिंदी
फोरम एग्रीगेटर पर करिए अपने ब्लॉग का प्रचार !

Anita ने कहा…

बोध देती कविता..

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सच कहा है ... जान की कीमत समझनी होगी हर किसी को ... प्रेम से समझना होगा ...

Rajesh Kumari ने कहा…

वाह बहुत ही सुन्दर सन्देश देती हुई प्रस्तुति तहे दिल से बधाई प्रिय शिखा जी |

Digamber Jha Begusarai ने कहा…

Desh ko aap jaise logo ki jarurat hai . aap apni kalam ko dhar dete rho.

shikha kaushik ने कहा…

THANKS EVERYONE .