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रविवार, 15 जून 2014

जब तक मौत नहीं आती

साथ 
हर दुःख को हम सह जाते हैं;
आंसू अपने पी जाते हैं ;
जब तक मौत नहीं आती
जीवन का साथ निभाते हैं .
......................................

हर दिन आती हैं  बाधाएँ;
पैने कंटक सी ये चुभ जाएँ;
दुष्ट निराशा तेज ताप बन 
आशा-पुष्पों को मुरझाएं;
फिर भी मन में धीरज धरकर
पग-पग बढ़ते जाते हैं .
जब तक .......
...................................

पल-पल जिनके हित चिंतन में 
उषा-संध्या-निशा बीतती ;
वे अपने धोखा दे जाते 
घाव बड़े गहरे दे जाते ,
भ्रम में पड़कर ;स्वयं को छलकर 
नया तराना गाते हैं .
जब तक मौत .....
..................................

अपमान गरल पी जाते हैं;
कुछ कहने से कतराते हैं ;
झूठ के आगे नतमस्तक हो 
सच को आँख दिखाते हैं ;
आदर्शों का गला घोटकर 
हम कितना इतराते हैं !
जब तक ......
                       शिखा कौशिक 'नूतन '



5 टिप्‍पणियां:

Shalini Kaushik ने कहा…

ekdam sateek

Shalini Kaushik ने कहा…

ekdam sateek

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (16-06-2014) को "जिसके बाबूजी वृद्धाश्रम में.. है सबसे बेईमान वही." (चर्चा मंच-1645) पर भी है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Vaanbhatt ने कहा…

अद्भुत रचना...

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सटीक और प्रभावी रचना..