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मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

कितना खोया कितना पाया आओ करें हिसाब !


जीवन का बहीखाता खोला काम करें ये खास ,
कितना खोया कितना पाया आओ करें हिसाब !
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कितने आंसू आँख से टपके गिनना जरा संभलकर ,
कितनी आहेँ कितनी चीखें निकली तड़प-तड़प कर ,
कितनी बार भरी घुट-घुट कर लम्बी-गहरी सांस !
कितना खोया कितना पाया आओ करें हिसाब !
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कितना भीगे ममता मेह में कितना नेह लुटाया ,
कितना प्रेम किया अपनों से वापस कितना पाया ,
कितनी बार भरोसा टूटा कब-कब टूटी आस !
कितना खोया कितना पाया आओ करें हिसाब !
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कितनी बार खिले अधरों पर मुस्कानों के फूल ,
कितने स्वप्न सजे नयनों में सतरंगी सावन झूल ,
हुए प्रफुल्लित कितनी बारी कब-कब भये उदास !
कितना खोया कितना पाया आओ करें हिसाब !
शिखा कौशिक 'नूतन'

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (19-02-2014) को भैया भ्रष्टाचार भी, भद्रकार भरपूर; चर्चा मंच 1528 में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

nice.

Anita ने कहा…

सुंदर रचना !

Dr. Vandana Singh ने कहा…

बहुत खूब !