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मंगलवार, 27 अगस्त 2013

बेटी को माना बोझ तो फिर जन्म क्यूं दिया ,





 

न कुछ कहने की इज़ाज़त ,
न कुछ बनने की इज़ाज़त ,
न साँस लेने की इज़ाज़त ,
न आगे बढ़ने की इज़ाज़त .
      न आपसे दो बात मन की बढ़के कह सकूं ,
      न माफिक अपने फैसला खुद कोई ले सकूं ,
      जो आपको लगे सही बस वो ही मैं करूँ ,
      न उसको किसी हाल में मैं नहीं कह सकूं .

अपनी ही बात को रखा सबसे सदा ऊपर ,
हालत का मेरी दोष मढ़ा मेरे ही सिर पर ,
माना न कहा मेरा ,औरों से दबाया ,
फिर उनकी बात रखकर मारी मुझे ठोकर .
        बनते हैं वक्त के हमकदम ज़माने के लिए ,
        दूसरों की असलियत पे होंठ सी लिए ,
        देना था जहाँ साथ मेरा भविष्य के लिए ,
        पैरों में मेरे बेड़ियाँ डाल खड़े हो लिए .

बेटी को माना बोझ तो फिर जन्म क्यूं दिया ,
बेटी का भविष्य यहाँ चौपट क्यूं कर दिया ,
न देना था उसको अगर सुनहरा भविष्य ,
पैदा हुए ही गला क्यूं दबा नहीं दिया .
        बेटी तो पौध है खुले आँगन में ही चले ,
        सांसे उसे बढ़ने को उस हवा में ही मिलें ,
        रखोगे बंद कमरे में दुनिया से छिपाकर ,
        घुट जाएगी वैसे ही जैसे पौध न खिले .

    शालिनी कौशिक
     [WOMAN ABOUT MAN]



6 टिप्‍पणियां:

Sriram Roy ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति

Pratibha Verma ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

Ranjana Verma ने कहा…

बहुत खुबसूरत रचना ....

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

अब समाज की उस पर्त तक ही आपकी बात सटीक लगती है जो रूढ़ी ग्रस्त पुरुष सत्तात्मक समाज का पिष्ट पेषण कर रही है। अलग अलग सामाजिक पर्तों में औरत अलग अलग पायदानों पर खड़ी है। साधारणीकरण आप नहीं कर सकते हैं। अलबत्ता वृहत्तर समाज समय के साथ कदम ताल नहीं कर पा रहा है कन्फ्यूज्ड है भ्रमित है। आप सबसे पहले अपने घर का माहौल बदलो।

सबसे पहले सास ही आगे बढ़के बहु की कलाई पकडके वह जो कंगन अपने बाप के घर से पहन कर आई है उसका वजन तौलती है अगर आगे बढ़के वही कहे-खबरदार ये आज से मेरी बेटी है फिर उस घर के पुरुष की क्या मज़ाल जो भीगी बिल्ली न बने।

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति जन्माष्टमी के मौके पर आनंद वर्षंन हैगो भैया।


आज तो सारा आलम सारी कायनात ही कृष्ण मय हो रई भैया । उसकी लीला ही अपरम्पार हैं स्वाद लेबे को भागवत कथा सुनबे। झूठ् ना कहूँ तोसे। मजो आ गया ओ ,नन्द आनंद कारज होवे और मजा न आवे। नन्द का मतलब होवे आनंद।

मैया मोहे दाऊ भोत खिजायो ,

मोते कहत मोल को लीन्हों तू जसुमत कब जायो,


गोर नन्द जसोदा गोरी तू कत श्याम शरीर

जन्माष्टमी की बधाई क्या बधाया सब ब्लागियन कु।

ॐ शान्ति

भैया जसोदा का मतलब ही होवे है जो यश दिलवावे। सगरे बिग्रे काज संभारे।

श्रीकृष्णचन्द्र देवकीनन्दन माँ जशुमति के बाल गोपाल ।
रुक्मणीनाथ राधिकावल्लभ मीरा के प्रभु नटवरलाल ।।

मुरलीधर बसुदेवतनय बलरामानुज कालिय दहन ।
पाण्डवहित सुदामामीत भक्तन के दुःख दोष दलन ।।

मंगलमूरति श्यामलसूरति कंसन्तक गोवर्धनधारी ।
त्रैलोकउजागर कृपासागर गोपिनके बनवारि मुरारी ।।

कुब्जापावन दारिददावन भक्तवत्सल सुदर्शनधारी ।
दीनदयाल शरनागतपाल संतोष शरन अघ अवगुनहारी ।।

श्री कृष्ण स्तुती
कस्तुरी तिलकम ललाटपटले,
वक्षस्थले कौस्तुभम ।
नासाग्रे वरमौक्तिकम करतले,
वेणु करे कंकणम ।
सर्वांगे हरिचन्दनम सुललितम,
कंठे च मुक्तावलि ।
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते,
गोपाल चूडामणी ॥

बधाई जन्मोत्सव कृष्ण कृष्ण बोले तो जो अन्धकार को दूर करे।
माँ बदल देती है खुशियों में उन्हें
हादसे जो राह में मिलते रहे

संसद वारे कोब्रान ने कौन गिनेगा भैया

अब तो बिल भी पास है गयो। कोबरा ही अगला प्रधान मंत्री होवेगो सही कह रियो भैया।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सच कहा है ... आज के समय में भी बेटी को उसका अधिकार देने में कितनी मिन्नत करता है समाज ...
कृष्ण जन्माष्टमी की बधाई ...