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सोमवार, 7 जनवरी 2013

सिर्फ हौसले की जँग काफी नहीं , ज़िन्दगी के लिये

 निर्भया ..दामिनी की नजर से ...

बाबुल तेरी गलियाँ बुलातीं हैं मुझे
रास आईं नहीं इस शहर की सड़कें
मेरी बेबसी , मेरा रुदन देखा , फिर भी बचा न पाईं मुझे
सिर्फ हौसले की जँग काफी नहीं , ज़िन्दगी के लिये
काल साथ लिये जाता है मुझे
बाबुल तेरी गलियाँ बुलातीं हैं मुझे

नियति ने छल किया मुझसे
छुट गये सारे साथ
अभी कल की ही तो बात है
अपने ख़्वाबों के रँग चटकीले थे
ये दरिन्दगी कोई बुरा सपना होती , तो कोई बात भी थी
तेरी मैना के पर कतरे हैं
अब ये दम काफी नहीं , उड़ने के लिये

काल साथ लिये जाता है मुझे
बाबुल तेरी गलियाँ बुलातीं हैं मुझे

मेरा बचपन , मेरी यादें कर लेना दफ़न सीने में
कौन जीता है इस हश्र के लिये जमाने में
टीसते रहते मेरे जख्म नासूरों की तरह
तेरी मुंडेर भी है बेगानी आज से , गम भुलाने के लिये

काल साथ लिये जाता है मुझे
बाबुल तेरी गलियाँ बुलातीं हैं मुझे


7 टिप्‍पणियां:

शालिनी कौशिक ने कहा…

भावना प्रधान अभिव्यक्ति भारत सरकार को देश व्यवस्थित करना होगा .

Anita (अनिता) ने कहा…

:(((

Aditi Poonam ने कहा…

सार्थक,भावपूर्ण अभिव्यक्ति

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' ने कहा…

नव वर्ष मंगलमय हो,सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

आज हमारी सोसाइटी घिनौने जुर्मों से भर गयी है जिनमें से कुछ के नाम हमने लिए हैं.
ऐसा क्यों हुआ .
यह हमें सोचना होगा .
जुर्म के ख़िलाफ़ कम नहीं लिखा जा रहा है और रोज़ाना क़ानून भी बन रहे हैं . इसके बावजूद आज न तो औरत और बच्चे महफूज़ हैं और न ही स्वयं मर्द ही.
हमें सोचना होगा कि एक मुजरिम जुर्म क्यों करता है और उसकी मानसिकता को कैसे बदला जा सकता है .
अपने शुभ अशुभ कर्मों को हमें भोगना ही है.
यह विश्वास हमारे सबके मन में आ जाए तो हमारे विचार और कर्म निश्चित रूप से बदल जायेंगे.
आज हमें इस विश्वास की ऊर्जा से काम लेना होगा और यह विश्वास हम सबका साझा विश्वास है.
यही हमारा मक़सद है .

कविता रावत ने कहा…

सच हौसले के साथ उठ खड़ा होना आसान हैं लड़ना -जूझना बहुत कठिन ..

Rajesh Kumari ने कहा…

बहुत मार्मिक लिखा दिल को छू गए शब्द