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रविवार, 9 सितंबर 2012

अनीता निहलानी जी का हार्दिक आभार


अनीता  निहलानी  जी का हार्दिक आभार 

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अनीता  निहलानी  जी  ने  अपने  ब्लॉग  ''मन  पाए  विश्राम जहाँ '' पर यह पोस्ट प्रस्तुत की है .मैं ह्रदय से उनका आभार व्यक्त करती हूँ !

                                             shikha kaushik     


कवयित्री शिखा कौशिक का काव्य संसार- खामोश, ख़ामोशी और हम में


खामोश ख़ामोशी और हम की अगली कवयित्री हैं, उत्तर प्रदेश की शिखा कौशिकजिनके ब्लॉग पर सुंदर कवितायें तथा स्वरचित गीत सुनने को मिलते हैं. शिखा जी शोधार्थी हैं और हिंदी के महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में स्त्री विमर्श पर शोध कर रही हैं. इनके माता-पिता वकील हैं.
इस संकलन में कवयित्री की छह कवितायें हैं, परम के प्रति आस्था को व्यक्त करती मैं कतरा हूँ, तथा आत्मशक्ति पर विश्वास, प्रकृति के सुंदर रूपों का वर्णन करती राजतिलक, काल की पहचान करने का प्रयास है समय में, जिंदगी क्या है तथा सड़क में उसी को गवाह बनाकर जीवन को समझने की कोशिश, इनकी कविताओं को नए-नए रंगों से भर देती है.

कवि का अर्थ ही है जो जमाने भर का दर्द अपने भीतर महसूस करे और उसे शब्दों के माध्यम से व्यक्त करे, मैं कतरा हूँ कविता में इसी प्रार्थना को भाव भरे शब्दों में प्रस्तुत किया है

किसी की आंख का आँसू
मेरी आँखों में आ छलके
किसी की साँस थमते देख
मेरा दिल चले थम के
..
प्रभु ऐसे ही भावों से मेरे
इस दिल को तुम भर दो
मैं कतरा हूँ मुझे इंसानियत
का दरिया तुम कर दो

किसी का खून बहता देख
मेरा खून जम जाये
किसी की चीख पर मेरे
कदम उस और बढ़ जाये
..
मैं कतरा हूँ मुझे इंसानियत
का दरिया तुम कर दो

आशा और विश्वास ही जीवन को हादसों से गुजरने का बल देते हैं, आत्मशक्ति पर विश्वासहो तो बाधाएं कुछ नहीं कर सकतीं-

राह कितनी भी कुटिल हो 
हमें चलना है
हार भी हो जाये तो भी
मुस्कुराना है
...
हादसों के बीच से
इस तरह निकल जाना है
..
रात कितनी भी बड़ी हो
सवेरा तो होना है

सुबह से लेकर रात तक प्रकृति न जाने कितने रूप और आकार लेती है...निशा-सुन्दरी काराजतिलक पाठक को एक अनोखे भावलोक में ले जाता है.

उषाकाल
उदित होता दिनकर
नीलाम्बर लालिमा लिए
पक्षियों का कलरव
मंदिरों की घंटियों
की मधुर ध्वनि
..
मध्याहन का समय
जीवन में गति
..
सायन्तिका का आगमन
लौटते घर को
कदमों की आवाज
शांत जल
टिमटिमाते तारों का समूह
सुगन्धित समीर
निशा-सुन्दरी का
राजतिलक

काल को हम जानते हुए भी नहीं जानते...समय में कवयित्री द्वारा पल-पल बहती समय की धारा के साथ बहने का प्रयास किया गया है...

कुछ छूटता-सा
दूर जाता हुआ
बार-बार याद आकर
रुलाता सा
क्या है
मैं नहीं जानती
कुछ सरकता-सा
कुछ बिखरता-सा
कुछ फिसलता-सा
कुछ पलटता-सा
..
धीरे धीरे आगे बढता हुआ
हमारे हाथों से निकलता हुआ
कभी अच्छा कभी बुरा
हाँ! ये समय ही है!

जीवन की राह हो या शहर की सड़क, दोनों पर चलना होता है मानव को और साक्षी होता है पथ..

मैं सड़क हूँ, मैं गवाह हूँ
आपके गम और खुशी की
है नहीं कोई सगा पर
मैं सगी हूँ हर किसी की
..
मुझपे बिखरे रंग ये होली के देखो
मुझपे बिखरा खून ये दंगों का देखो
..
मैं गवाह आंसू की हूँ और कहकहों की
..
मंदिरों तक जा रहे मुझपे ही चलकर
मैं गरीबों को सुलाती थपकी देकर
..
मैं सड़क हूँ, मैं गवाह हूँ
आपके गम और खुशी की

कवयित्री की अंतिम कविता है जिंदगी क्या है, जो शब्दों की सुंदर पुनरुक्ति तथा प्रवाहमयी भाषा के कारण हृदय को छूती है-

जिंदगी क्या है?
खुशी के दो-चार पल
खुशी क्या है
हृदय में उठती तरंगों की हलचल
हृदय क्या है
..
संसार क्या है
दुखों का भंडार
दुःख क्या है
सुख की अनुपस्थिति
...
मनचाहा क्या है
खुशहाल जिंदगी
जिंदगी क्या है
खुशी के दो चार पल

शिखा कौशिक जी की कवितायें सहज और सरल भाषा तथा जीवन के विविध रंगों को अपनी विषय वस्तु बनाने के कारण अपनी अलग पहचान रखती हैं. इनके लिए मैं कवयित्री को बधाई देती हूँ, तथा आशा करती हूँ कि सुधी पाठक जन भी इन्हें पढकर आह्लादित होंगे, व अपनी प्रतिक्रियाओं द्वारा इसकी सूचना भी देंगे.

1 टिप्पणी:

Rajesh Kumari ने कहा…

अनीता जी के द्वारा आपकी कविताओं की इतनी सुन्दर समीक्षा पढ़कर बहुत अच्छा लगा आपकी कवितायें बुक में भी पढ़ी हैं बहुत अच्छी हैं आपको व् अनीता जी को हार्दिक बधाई