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सोमवार, 2 जुलाई 2018

क्या साथ चलने का बहाना एक नहीं



 


साथ न चलने के सौ बहाने करने वाले 
क्या साथ चलने का बहाना एक नहीं  ?
जब रिश्ते में दरारें पड़ने लगतीं हैं तो ऐसा ही होता है। प्यार का पौधा भी पानी माँगता है। वही रिश्ता जो सबसे हसीन था वही कब चुभने लगता है कि नश्तर बन जाता है , पता ही नहीं चलता। वही साथी जिसके बिना रहा नहीं जाता था आज साथ रहा नहीं जाता ; सौ कमियाँ दिखती हैं। कितने ही कारण परिस्थिति-जन्य होते हैं जिनमें हम अपनी अज्ञानता से बढ़ोत्तरी कर लेते हैं। बात उतनी बड़ी नहीं होती, जितनी बहस से बड़ी हो जाती है , और फिर शब्द पकड़ लिए जाते हैं। किसी ने कुछ कहा और हम उसका एक्स-रे निकाल लेते हैं। हर बात में उसका कोई उद्देश्य ढूँढ लेते हैं , और फिर शुरू हो जाते हैं उसे गलत सिद्ध करने में। 

घर जब टूटने की कगार पर पहुँच जाते हैं , हम कितनी ही ज़िन्दगियों के साथ नाइन्साफी कर बैठते हैं। सिर्फ साथी नहीं , हमसे जुड़े सारे रिश्ते उसे भोगते हैं। अपनी आज़ादी ,अपनी ज़िन्दगी के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने से कुछ नहीं होता।  अगर आप अपना सँसार ही न सँभाल पाये तो आपके पास कुछ भी नहीं बचता। आप अपने ही दुश्मन बने हुए हैं ,ये वक़्त निकल जाने के बाद समझ आएगा। आप किसी भूचाल से गुजर रहे हैं , ये कहाँ जाकर थमेगा ,कह नहीं सकते। शादी के बाद बच्चे भी हैं और आप अलग होना चाहते हैं तो जरा सोचें कि उस बच्चे की क्या गलती थी जो आपके यहाँ पैदा हो गया। बचपन की हर बात गम की या ख़ुशी की , ताउम्र अपनी छाप छोड़ती है ; वही व्यक्तित्व बन कर उभरती है। एक फूल को आपने रेगिस्तान में किसके सहारे छोड़ दिया। जिसे एक समृद्ध बचपन देना था ,  उसके सारे हक़ ,अधिकार छीन लिये। बच्चा हमेशा अपने पेरेन्ट्स के साथ सुरक्षित महसूस करता है। कुण्ठित व्यक्तित्व अपने परिवार को क्या देगा , समाज को क्या देगा। वैसे भी अतीत सारी उम्र हावी रहेगा ,आप चाह कर भी ये सब भुला न पायेंगे। हम अपनी ज़िन्दगी के खुदा हो सकते हैं , बशर्ते परिस्थितियों का शिकार न बनें ,अपनी बागडोर अपने हाथ रखें।  

हम सब सॉरी बोलने से बचते हैं। छोटी-छोटी बातों में तो एटिकेट्स निभाते हैं , और रिश्ते बचाने में ' सॉरी ' बोलने से बचने के लिये सौ बहाने खोज लेते हैं।और हाँ , अब पहली-पहली सी कोई बात नहीं होगी। उम्मीदें और ईगो की वजह से ही क्लैश ( टकराव ) होते हैं। ईगो को ' न ' सुनना बिलकुल पसंद नहीं होता।जिसे हम स्वाभिमान समझते हैं , वो ईगो होती है।  ये सिर्फ तब जायेगी जब हम बड़ी ईगो से जुड़ेगें  ,साथी भी अपना आप ही है , अपने जीवन का हिस्सा। ऐसा समझेंगे तभी प्यार कर सकेंगे , माफ़ कर सकेंगे। क्या उस मीठे वक़्त की मीठी यादों का एक भी बहाना ऐसा नहीं है जो आपको साथ चला सके ? दूर जाने के सौ बहाने करने वाले , क्या साथ चलने का एक भी बहाना नहीं बचा है  ? 

एक खता पर ज़िन्दगी वारी 
होते न लम्हें इतने भारी 
हार जाओगे नसीब से लड़ते हुए 
ज़िन्दगी तुम्हें बख़्शेगी नहीं 
माज़ी तुम्हें कभी चैन से सोने नहीं देगा 
और तुम कितने सहिष्णु हो 
ये तय होगा ,जब सहेज रखोगे रिश्तों को 

किसी की भी राह में गुलाब नहीं बिछे होते , आपको अपनी राह खुद बनानी होती है। कई बार दोनों पक्ष एक पहल का इन्तिज़ार करते रहते हैं। एक पहल और बाँध टूट सकता है। कोई छोटा नहीं होता , इसे तो समझदारी कहेंगे। जो भरा होता है वही छलकता है। ज़िन्दगी को गले लगाना सीखें।  प्रगति कभी जिन्दगी से बड़ी नहीं हो सकती। संभालें अपने सफर को , अपने हालात को , जो आपको मिला है सहेजें उसको।

इश्क की आग से सबेरा कर लेना
ये सूरज सी आब रखता है
इसकी तपिश से है दुनिया का चलन
इस पर भरोसा कर लेना
ख्वाब सी है जमीन ,ख्वाब सा है आसमान
रेशमी से ख्वाब बुन लेना
चलना वैसे भी है,चाहत का मोड़ देकर
इक हसीन मंज़र देना

2 टिप्‍पणियां:

RADHA TIWARI ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (04-07-2018) को "कामी और कुसन्त" (चर्चा अंक-3021) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
राधा तिवारी

shikha kaushik ने कहा…

bilkul sahi kaha sharda ji aapne | ek sorry rishte ko bacha sakta fir hum kyun bachte hain isse |