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सोमवार, 14 अप्रैल 2014

दर्द से दिल मेरा फटने लगा



मेरे ख्वाबों का कद बढ़ने लगा मुझको सजा दो ,
मुझे घर जेल सा लगने लगा मुझको सजा दो !
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मिली तालीम मैंने भी पकड़ ली हाथ में कलम ,
मेरा हर दर्द बयां होने लगा मुझको सजा दो !
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लांघकर चौखटे रखा जो कदम मैंने हिम्मत से ,
खौफ दुनिया का है घटने लगा मुझको सजा दो !
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उठा पर्दा जो आँखों से दिखा अपना वज़ूद तब ,
सोया अरमान हर जगने लगा मुझको सजा दो !
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मुझे अब चीखना पुरजोर  'नूतन' इस ज़माने में ,
दर्द से दिल मेरा फटने लगा मुझको सजा दो !

शिखा कौशिक 'नूतन'

3 टिप्‍पणियां:

Shalini Kaushik ने कहा…

उठा पर्दा जो आँखों से दिखा अपना वज़ूद तब ,
सोया अरमान हर जगने लगा मुझको सजा दो !
bahut sahi v sateek abhivyakti .badhai

shilpa bhartiya ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति..

Rajesh Kumari ने कहा…

बहुत खूब मन की व्यथा ,आक्रोष को बेहतरीन शब्दों में बाँधा है बधाई आपको