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बुधवार, 29 मई 2013

Whither women in the Indian army?-FROM MSN

Even as local tribals demanded an enquiry into her death, allegations have surfaced 
that she had been at the receiving end of money in exchange for recruitment opportunities within the railways


The sad case of Shanti Tigga: Whither women in the Indian army? (© PTI)
It was two years ago that Shanti Tigga scaled yet another male bastion, when she became India’s first woman jawan. Till then, women had only joined the armed forces as officers in the non-combat units. But this 35-year-old, single-mother mother of two, outperformed her male colleagues to earn the right to become the only woman combatant in India’s 1.3 million strong defence force, and she was felicitated by none other than the country’s first woman president.
But two years later, the mood is more somber. On a night, after she had been on duty for close to 36 hours at the Chalsa station, Tigga was kidnapped by a group of unidentified persons. She was later found tied to a post at the Deopani village railway track. Though Tigga said she had not been harmed physically, she was admitted to a local hospital. Three days later, she hung herself in the hospital bathroom.
Even as local tribals demanded an enquiry into her death, allegations have surfaced that she had been at the receiving end of money in exchange for recruitment opportunities within the railways.
As both a woman and a tribal pioneer, Shanti’s tremendous battle against the odds should have been a source of inspiration. Yet her tragic end makes us contemplate the support that woman pioneers need once they have breached a male bastion. How do we ensure that these women remain on the path to high achievement and become role models for other women? It’s not enough for us to simply celebrate our women achievers. How do we help them reach even greater heights?
Tigga’s death has also once again put the spotlight on women in the army in India. Why are they so few and far between? And does the army have women-friendly policies? While Tigga was the first woman to qualify as a combatant, we are yet to have women as commanding officers. This is at a time when Pakistan welcomed its first female three-star general, Shahida Badshah two years ago.
But in India, it’s a long and lonely journey for women in the army. And they make their ascent carrying a heavy burden. As they bear the aspirations of their communities, when they fail the scrutiny gets more intense than it is for their male colleagues. So when Tigga succeeded, all Indian women succeeded with her. And when Tigga failed, all Indian women failed with her.
In other fields too, the climb to the top has always been steeper for women achievers, and their fall. This has to change, if women are to lose their inhibitions and storm the last standing male bastions.

Christina Daniels is a Writer, Poet, Marcom Editor, Photographer and Traveler. She is the author of “I’ll Do It My Way: The Incredible Journey of Aamir Khan” and “Ginger Soda Lemon Pop”. She has also co-authored ‘Mind Blogs 1.0.

मंगलवार, 28 मई 2013

वो फ़रिश्ता

                 सूश्री शांति पुरोहित की कहानी ( वो फ़रिश्ता ) 
                                                                                                                        

  रमाके चार बहने और थी ;पिता की कम आमदनी के कारण एक भी पढ़ नहीं पाई थी | रमा नहीं चाहती थी, की उसकी बेटी पैसो के अभाव मे पढने से वंचित ना रह जाये,अपने वश मे जो कुछ होता वो करती जैसे-टीचर से विनती करना, कि वो दिव्या को अपनी बेटी समझ कर बिना पैसो के कोचिंग क्लास मे पढने दे ,समय-समय पर टीचर से मिलकर बेटी की पढाई के बारे मे पूछते रहना ;बस खुद, पढ़ नहीं सकी जिसका उसे बेहद अफसोस है | आज रमा कितनी परेशान है | उसके दुःख का का कोई पारावार नहीं है |  उसकी बेटी के कालेज की फीस भरने के लिए सिर्फ पंद्रह हजार रुपयों की और जरुरत थी| बाकी के रुपयों का इंतजाम रमा  ने इधर-उधर से लेकर कर लिया;कुछ रूपया ब्याज पर लिया,कुछ दोस्तों से उधार लिया,किसी ने तो रूपया देते वक्त लिखवा भी लिया था कि जैसे ही बेटी कमाने लगे पहले हमे वापस देना | कभी तो समाज के लोगो के आगे भी हाथ फैलाया ;क्या-क्या सहना पड़ा, ये उसका ही दिल जानता है |तब बेटी की पढाई बरोबर चलती रही |
                                         रमा के पति किराने की दुकान पर खाता-बही का काम करते थे | बहुत ज्यादा पैसा तो उनको नहीं मिलता था |पर उनकी बेटी दिव्या पढने मे बहुत तेज थी | दिव्या ने जब से पढ़ना शुरू किया हर क्लास मे अव्वल रही | उसकी लगन देख कर माँ ने बेटी के उज्जवल भविष्य का सपना देखना शुरू कर दिया |क्या गरीब लेकिन प्रतिभासंपन बेटी की माँ को बेटी आगे बढे, ये सपना देखना मना है क्या ? अपनी बेटी के भविष्य के बारे मे सोचना क्या गलत बात है ?
                                           बी.ए.तक तो रमा  और मनोहर भाई, दिव्या के पापा, ने अपनी बेटी को जैसे-तैसे कर के पढ़ा दिया | पर अब दिव्या एम.बी.ए.करना चाहती है | दिव्या ने इसके लिए प्रवेश परीक्षा उतीर्ण करली और ''बिरला उच्च शिक्षण संस्थान'' मे उसका चयन भी हो गया ; पर अब फीस की इतनी बड़ी रकम का इंतजाम कैसे किया जाये, ये बड़ी  चिंता रमा को थी | कुल खर्चा ढाई लाख रुपया था,सब भर दिया बस आखिरी साल का पंद्रह हजार रुपया बाकी था | किसे कहे ! क्या करे ? कुछ समझ नहीं आ रहा था | रमा को लगा अब कुछ नहीं हो सकता |
                                       अब तो कोई भी रिश्तेदार, या जान-पहचान वाला नहीं बचा था जिससे मदद ली जा सकती है | फीस भरने के अब सिर्फ पांच ही दिन बचे है | रमा क्या करे, उसके तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा है | उसकी हालत बिना पानी की मछली की तरह हो गयी थी | रमा आज हिम्मत करके अपनी स्कूल की एक सहेली मोना को फोन किया | पर पंद्रह हजार कोई छोटी रकम तो नहीं थी | मोना की भी आर्थिक स्थति ज्यादा अच्छी नहीं थी वो भी मदद नहीं कर सकी |
                                         रमा की चिंता बढती जा रही थी, दिन भी एक ही बचा था | रमा बैठ गयी और पुरानी बातो को याद करने लगी, कि पढने मे कितनी तेज थी दिव्या ,उसकी लगन को देख कर कालेज प्रशाशन ने दिव्या  की बी,ए. की तीनो साल की फीस भी माफ़ कर दी थी | इस बार भी कालेज प्रसाशन ने कोशिश की पर अब उच्च   शिक्षा थी, तो फीस माफ़ करवाना बहुत मुश्किल था | फीस के कारण बेटी आगे पढ़ नहीं पायेगी ,ये सोच कर रमा अब रोने लगी थी |
                                              रमा के बहुत से रिश्तेदार ऐसे थे जिनके पास बहुत पैसा था, वे बहुत कंजूस प्रवति के लोग थे ;वो कहते है कि पैसा नहीं है तो पढने की क्या जरुरत है | | पर रमा उनको मदद के लिए कभी नहीं कहती | वो लोग मंदिरों मे अपने नाम की तख्ती लगाने के लिए,पाठ-पूजा और हवन के लिए और बाकी जगहों पर पैसा दान-पुण्य के काम मे लगाना ज्यादा पसंद करते थे, क्योंकि वहां नाम होता है | पर परिवार की एक प्रतिभाशाली लड़की को पढने मे उसकी कोई मदद नहीं कर सकते थे |  दिव्या का फोन आया 'माँ फीस का इंतजाम हुआ क्या ? क्या कहती रमा बेटी को कि 'नहीं हुआ आज तुम्हारा कॉलेज मे आखिरी दिन है| फिर भी रमा ने कहा 'तुम फिक्र न करो कुछ न कुछ इंतजाम हो जायेगा |
                                              मानसिक थकान थी,आँखे रो-रोकर सूज गयी, रमा सर पकड कर बैठ गयी,तभी डोर-बेल बजी,अब इस वक्त कौन हो सकता है ! दरवाजा खोला तो सामने एक व्यक्ति खड़ा मुस्करा रहा था | रमा ने उसे पहचाना नहीं प्रश्नभरी नजरो से देखने लगी | 'अंदर आने का नहीं कहोगी क्या रमा ? रमा को आश्चर्य हो रहा था कि जिसे मै जानती तक नहीं वो मेरा नाम भी जानता है | रमा ने उन्हें अंदर आने को कहा और दरवाजा खुला ही छोड़ा;ये देख कर वो व्यक्ति मुस्कुराया ; उसके मुस्कुराने का मतलब रमा नहीं समझी | पानी पिलाने के बाद रमा ने कहा 'अब बताइए कौन है आप ! मुझे कैसे जानते है ? जवाब मे उसने एक कवर दिया 'कहा इसमें पंद्रह हजार रूपया है बेटी की फीस भर देना |,रमा को समझ नहीं आ रहा कि ये कौन इंसान है जो इस वक्त भगवान बन कर आया है | 'पहले अपनी पहचान बताइए , मेरी मदद क्यों करना चाहते है ?
                           'शायद तम्हे याद नहीं,हम मिडिल तक साथ पढ़े है ;उस वक्त मेरी माँ मुझे पैसा नहीं देती थी  तुम्हे याद नहीं !सब बच्चे कैंटीन मे खाते,और मै पैसो की वजह से नहीं खाता ,मुझे बहुत बुरा लगता और मै रो पड़ता था |दोस्त चिड़ाते क्या ! खाने के पैसे भी नहीं है ?| तुमने स्कूल की कैंटीन वाले चाचा से मुझे मिलवाकर कहा था कि ये जो भी खाना चाहे दे देना पैसा मे दे दूंगी | ज्यादा अच्छी बात तो ये रही कि तुमने मेरे दोस्तों को या और किसी को कभी ये बात नहीं नहीं बताई जिसके कारण मुझे कभी शर्मिंदा नहीं होना पड़ा | तुम भूल गयी मै अक्सर अपने बच्चो, को ये बात बताता हूँ | कल मोना मिली उसने तुम्हारी बेटी की फीस भरने की परेशानी की बात बताई |मोना, मै और तुम तीनो साथ पढ़े है |  ये मत समझना की मै उस बचपन मे की गयी मदद का बदला चुकाने आया हूँ ; उसका मोल तो मै अपना सब कुछ देकर भी चूका ही नहीं सकता | आगे भी एसी कोई परेशानी हो तो मुझे याद करना,ख़ुशी होगी कि मैंने तुम्हारे लिए कुछ किया | रमा कुछ बोलती उससे पहले वो कवर को टेबल पर रख कर चला गया |
                         रमा की आँखों से आंसू बहने लगे | उसे याद ही नहीं कि उसने स्कूल मे कभी इनकी मदद की थी | जो पौधा उसने अपने बचपन मे लगाया था आज वो पेड़ बन कर फल दे गया है | अब रमा ने बेटी को सूचना की कि 'तुम कल से कॉलेज जा सकोगी | कोई फरिश्ता आया और मेरी मदद कर गया है | रमा ने बेटी को बताया कि इस तरह से लोगो कि मदद करनी चाहिए कि करो और भूल जाओ | रमा ना तो उसे बैठने को कह सकी ना चाय,कॉफ़ी के लिए पूछा ,बस वो तो हैरान थी कि बचपन मे कि गयी किसी कि मदद मेरी बेटी के कितनी काम आई  है |

                                                                                                                             शांति पुरोहित


नाम ;शांति पुरोहित 

जन्म तिथि ; ५/ १/ ६१ 

शिक्षा; एम् .ए हिन्दी 

रूचि -लिखना -पढना

जन्म स्थान; बीकानेर राज.

वर्तमान पता; शांति पुरोहित विजय परकाश पुरोहित 

कर्मचारी कालोनी नोखा मंडीबीकानेर राज .



रविवार, 26 मई 2013

नक्सली हमला-लोकतंत्र के सीने पर आतंक ने चाकू घोंपा है !!

VC Shukla airlifted and shifted to Gurgaon Medanta Hospital
आज हमारे भारत ने ये काला दिन भी देखा है !
लोकतंत्र के सीने पर आतंक ने चाकू घोंपा है !!

लोकतंत्र के प्रहरीजन मौत के घाट उतारे गए ,
जन-जन में है आक्रोश व्याप्त आंसू अब अंगार भये ,
अमन चैन की राह को आ आतंक ने बरबस रोका है !

गोली बरसा निहत्थों  पर देह उनकी छलनी कर दी ,
हर देशभक्त के सीने में आक्रोश ज्वाला है भर दी ,
एक एक शहीद की कसम हमें न देना अगला मौका है !

शिखा कौशिक 'नूतन'

शुक्रवार, 24 मई 2013

दूध का जला छाछ को भी फूंक कर पीता है -कहानी [सुश्री शांति पुरोहित ]

  दूध का जला छाछ को भी फूंक कर पीता  है  -कहानी [सुश्री  शांति पुरोहित  ]
Indian_bride : Rear view of bride and groom during a traditional Indian wedding ceremony
                                                                                                                                                                मीरा चाची के बेटे विनय की शादी का अवसर था | मीरा चाची को मैंने पिछले कई दिनों से आराम करते हुए नहीं देखा,बिना थके और अति उत्साह के साथ काम करने मे लगी है | ना खाने-पीने की चिंता और ना पल भर आराम करती है | बस एक ही चिंता है कि बेटे की शादी मे कोई कसर ना रहे,बहु रीमा के स्वागत मे कोई कमी ना रहे बस | शादी मे कुछ दिन ही रह गये है तो सारे रिश्तेदार और मेंहमान भी आ गये है | कहते है ना सुख -दुख मे रिश्तेदार ना आये तो क्या मजा |  घर वालो के आने से ही ख़ुशी मे चार चाँद लग जाते है | मीरा के घर मे रिश्तेदारो  की खूब चहल -पहल थी |
                                      ''जगदीश, तुम यहाँ खड़े क्या कर रहे हो,जाओ तुम हलवाई के पास ही रहो उनको किसी भी चीज के लिये परेशान ना होना पड़े | दिवाकर तुम टेन्ट वाले से सारा सामान  टाइम पर भेजने के लिये अभी ही फोन करके बोल दो,और हाँ डेकोरेशन वाले भी आ गये है' चिराग, तुम पूरा घर दुलहन की तरह सजा देना कोई कसर ना रखना |'' मीरा चाची ने डेकोरेशन वाले चिराग भाई को कहा ''गोपाल तुम सब मेहमानों के खाने,और ठरहने की व्यवस्था देखो | जाओ सब अपने अपने काम मे लग जाओ | मीरा चाची ने सब को काम समझाया| और अब वो पंडित से मांगलिक कार्य शुरू करने का शुभ मोहरत पूछने मे व्यस्त हो गयी है|''

                                       तभी चाचा ने मीरा चाची को बुलाया और कहा कि''बहु के लिये जेवर आ गये हैऔर हाँ, सोनी जी से मैंने कुछ और जेवर मंगवाए है पसंद कर लो बहु को  पहली बार खाना बनाने की रश्म अदायगी के बाद सगुन जो देना| '' जब तक मीरा आंटी ये सब काम ख़तम करती उससे पहले ही औरतो ने मंगल गीत गाकर बेटे की हल्दी की रश्म शुरू कर दी | मीरा चाची ने अपने लाडले बेटे के हल्दी लगा कर उसका माथा चूम लिया और दुसरे कामो मे व्यस्त हो गयी |
                                       दुसरे दिन मेहदी और महिला संगीत का बहुत ही भव्य कार्यक्रम हुआ सब ने बहुत ही सराहा | आज विनय की बारात धूम -धाम से बहु को लेने गयी है | अब मीरा चाची ने आज थोडा आराम किया है |
                                आखिरकार मीरा चाची की बहु घर आ गयी | बहु का खूब स्वागत किया | बेटे और बहुको देख कर मीरा चाची ख़ुशी का अनुभव कर रही थी | जैसे उनके घर मे दुनिया भर की खुशिया आ गयी हो बहु के आने से,  और मन मे ये भी सोच रखा था कि बहु को सब कुछ सौंप कर घर के काम से अब छुट्टी  ले लुंगी और  आराम का जीवन बसर करुँगी  | मीरा चाची ने दोनों को घुमने के लिये सिंगापूर भेजा| उनके लिये बेटे -बहु की खुशियों से बढ़ कर कुछ नहीं था |बेटे -बहु दस दिन बाद घूम कर वापस आ गये |दोनों बहुत खुश है |बहु ने सास का शुक्रिया माना कि उनको इतना अच्छा घुमने का मौका दिया |अब धिरे -धिरे बहु घर के काम मे लग गयी एक बहु के लिये जब वो नई -नई ससुराल आती है तो उहे पता चलता है कि उसके मायके की रीत और उसकी ससुराल की रीत मे फर्क होता है | तो रीना का भी सब तरीका जैसे रहने का ,खाना बनाने का तरीका अलग था |तो मीरा चाची ने रीमा से कहा ''चलो मे तुम्हे यहाँ के कुछ तौर- तरीके सीखा देती हूँ |फिर धीरे -धीरे तुम सब सीख जाओगी , पर रीमा ने सीधा जवाब दे दिया कि ''नहीं सीखना मुझे नया तरीका अगर मेरे तरीके से आप को रहना है तो ठीक ,नहीं तो आप ही खाना बनाते रहिये |''ये सुन कर चाची को बहुत ही हैरानी हुई |अब तो दिन ब दिन उसका व्यवहार बिगड़ता ही जा रहा था |अब चाचा -चाची को दुःख तो इस बात का ज्यादा हो रहा था कि ये सब देखने के बावजूद भी विनय अपनी पत्नी को कभी कुछ नहीं बोलता था | अभी शादी को दो माह ही हुए थे | एक दिन मीरा आंटी ने बहु से कहा''रीमा ''मुझे एक कप चाय दे दो आज सर मे बहुत दर्द है|''कितनी बार चाय बनाउ क्या मे चाय और खाना बनाने के लिये ही आई हूँ यहाँ,मेरे पास भी करने को और भी काम है और हाँ चाय तो आप भी बना सकती है,इतना बड़ा जवाब देकर रीमा अपने कमरे मे तम -तमाती चली गयी |
                              मीरा आंटी बहु से ये सब सुन कर हैरान हो गयी उसने बहु से ऐसा तो कुछ कहा नहीं कि उसे इतना गुस्सा करना पड़ा | बहु से इतना तो हर सास -ससुर उम्मीद रखते है कि बहु खाना नाश्ता और चाय तो बना कर दे| मीरा चाची को बहु के इस बर्ताव से बहुत ठेस पहुंची है पर उन्होंने तय किया कि विनय के पापा को ये सब वो नहीं बताएगी |
                               लेकिन बात यही पर ही ख़तम नहीं होती है अब तो रीमा का जैसे ये रोज का ही काम हो गया था | अब तो ससुर जी के सामने भी वो ये सब करने लगी थी | उस दिन विनय के पापा को जल्दी ऑफिस जाना था | मीरा भी रसोई मे गयी है रीमा की मदद करने, लेकिन रसोई तो बंद पड़ी थी | और उसी वक्त रीमा तैयार होकर पहले से ही तय किट्टी पार्टी मे अपने दोस्तों के साथ चली गयी | मीरा चाची हैरान रह गयी अब इतनी जल्दी वो अकेली कैसे खाना बनाएगी | बहु को विनय के पापा ने भी देखा जाते हुए उन्हें बहुत गुस्सा आया पर मीरा चाची ने बोलने से मना किया उनका ये मानना है कि घर की औरतो के बीच मे आदमी को नहीं बोलना चाहिए घर का माहौल और बिगड़ जाता है | बहुत बार बोलना चाहा उन्होंने पर हर बार चाची उन्हें चुप करा देती थी| वो अपनी पत्नी को बहु से कुछ भी सुनते हुए देखते तो दुखी हो जाते थे |
                                  ऐसा कब तक बर्दास्त किया जा सकता है आखिरकार एक साल के बाद उन्होंने एक फैसला किया | उस रात जब सब खाना खा रहे थे, तो चाचा ने विनय को एक चाबी दी और कहा कि ''विनय ये तुम्हारे लिये नए घर की चाबी है| तुम कल से ही वहां चले जाओ | तुम्हारी पत्नी का बर्ताव अब बर्दाश्त नहीं होता | जब घर तुम्हारी मम्मी को ही संभालना है तो दिल मे सुकून तो होना चाहिए ना | अब मीरा चाची और अखिलेश चाचा छोटे बेटे रंजन के साथ आराम से रहने लगे | रंजन का इंजीनियरिंग का अन्तिम वर्ष चल रहा था |
                                 मीरा चाची उन कडवी यादो को भूल जाना चाहती थी पर वो अनचाही यादे उनका दामन ही नहीं छोड़ रही थी | अक्सर मीरा चाची और अखिलेश चाचा बाते करते है कि अब छोटे बेटे की शादी करनी है |पर अभी तक बड़ी बहु के व्यव्हार से डरे हुए है | पर इस कारण रंजन को कुंवारा तो नहीं रख सकते | पर लड़की अगर रीमा जैसी ही निकली तो फिर से वो सब देखना पड़ेगा | पर ये जिम्मेदारी भी पूरी तो करनी है तो अब लड़की की तलाश शुरू हुई |
                                   पर रंजन ने तय कर लिया था कि उसे शादी नहीं करनी है |भाभी के लिये उसके दिल मे एक माँ जैसे छवि थी|  भाभी के लिये एक सम्मान की भावना थी, पर भाभी ने अपने बेरुखेपन से सब धूमिल कर दिया | अब वो शादी करके अपने और अपने माता पिता को और दुखी नहीं करना चाहता था | मीरा चाची ने उसे समझाया की सब लडकिया एक जैसी थोड़ी होती है |पर उसको कैसे यकीन दिलाया जाये |
                                        मीरा चाची ने अपनी इस उलझन के साथ रंजन के लिये लड़की देखने का सिलसिला शरू किया | कुछ रिश्ते इनको नहीं जंचते होते थे और कुछ अपनी लड़की का रिश्ता इनके यहाँ नहीं करना चाहते थे | अब इनके सामने डर के साथ निराशा भी थी | समय बीतता रहा आखिरकार अखिलेश चाचा की बहन ने एक रिश्ता बताया | आज सब रेणु को देखने उसके घर जा रहे है | रेणु तो एक नजर मे ही सब को पसंद आ गयी थी | वो थी भी बहुत सुंदर,चंचल और उसकी माँ ने बताया पढ़ी लिखी होने के साथ -साथ वो घर के सब काम मे दक्ष है | संस्कारो वाली लड़की थी |
                                       अब मीरा चाची के घर फिर से शहनाई बजेगी फिर से घर मे बहु आएगी सब खुश थे,पर फिर भी जेहन मे कहीं दूर हल्का सा डर भी था कि ..........
    रेणु ने अपने शादी को लेकर बहुत से अरमान अपने दिल मे सजा के रखे है | रेणु को खुले विचारो वाली सास पसंद थी | पति बहुत प्यार करने वाला हो और ससुर जी पिता के समान उसे अपनी बेटी समझे इस तरह उसने और भी कई अरमान दिल मे सजा कर रखे है |
                                      पर यहाँ तो सब उल्टा ही मिला सास ने कभी किसी काम की तारीफ नहीं की और ना ही झगड़ा किया रंजन ने भी ज्यादा प्यार नहीं दिखाया | अब रेणु क्या करे उसने ये तो सोचा भी नहीं था कि ऐसा सब होगा |कई बार रेणु ने जानना चाहा कि ऐसा क्यों कर रहे है क्या बात है पर कोशिश करने पर भी कुछ नहीं हुआ | धिरे -धिरे रेणु की तबियत बिगड़ने लगी तो मीरा चाची को भी फिक्र हुई | समय ऐसे ही बीतता रहा |दो साल होने को आये रेणु को अपनी ससुराल मे| एक दिन अचानक अखिलेश चाचा को दिल का दौरा पड़ा | उनको अस्पताल मे भर्ती किया गया | इस संकट की घड़ी मे बड़ी बहु रीमा ने कुछ देर के लिये आकर महज औपचारिकता ही पूरी करी | पर रेणु ने अपना पूरा क्रतव्य निभाया सुबह से लेकर शाम तक वो सेवा मे लगी रहती | ससुरजी को दवा देना सास के लिये खाना लाना और फिर घर मे रंजन के लिये नाश्ता बनाना आदि सब कुछ वो कर रही थी |पन्द्रह दिन बाद ससुरजी को अस्पताल से छुटी दे दी गयी |
                                इन पंद्रह दिनों मे रेणु का अपने ससुराल वालो के प्रति प्यार देखकर मीरा चाची को बहुत अच्छा लगा | और उन्होंने सोचा कि इतनी अच्छी बहु के साथ हम इतने दिनों क्यों प्यार नहीं जता पाए ये तो आई तब से ही इसने हम सब की कितनी सेवा की है हमने इसे समझने मे कितनी देर लगा दी पर हम भी क्या कर सकते है बड़ी बहु रीमा के कारण ये सब रेणु के साथ करना पड़ा कहते है ना कि दूध का जला छछ को भी फूंक कर पीता है तभी रेणु सास के कमरे मे चाय देने आयी रेणु को देख कर मीरा चाची अपने को रोक नहीं सकी और झट से रेणु को गले से लगाया और अपने रूखे वयवहार के लिये माफ़ी मांगी | रेणु तो कब से तरस रही थी सास के प्यार पाने के लिये रेणु संस्कारो वाली थी कहा ''माँ आज मेरा इस घर मे आना सार्थक हुआ है आपने मुझे दिल से अपनाया |''है और सास बहु दोनों की आँखों ख़ुशी के आंसू थे |
   
                           शांति पुरोहित
लेखिका का परिचय -
नाम ;शांति पुरोहित 

जन्म तिथि ; ५/ १/ ६१ 

शिक्षा; एम् .ए हिन्दी 

रूचि -लिखना -पढना

जन्म स्थान; बीकानेर राज.

वर्तमान पता; शांति पुरोहित विजय परकाश पुरोहित 

कर्मचारी कालोनी नोखा मंडीबीकानेर राज .

बुधवार, 22 मई 2013

अश्लीलता से घृणा करो सन्नी लियोन से नहीं !





''आधार वाक्य -पाप से घृणा करो पापी से नहीं !''


*सट्टेबाजी से घृणा करो आई .पी .एल . से नहीं !


*एक़े. 47 से घृणा करो संजय दत्त से नहीं !

*पाकिस्तानी सेना से घृणा करो पाकिस्तानी सरकार से नहीं !


*फिसलती जुबान से घृणा करो शिंदे साहब से नहीं !


*पी .एम् .ओ . से घृणा करो डॉ .मनमोहन सिंह से नहीं !


*साम्प्रदायिक दंगों से घृणा करो श्री नरेन्द्र मोदी से नहीं !


*राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं से घृणा करो श्री लाल कृष्ण आडवानी से नहीं !


*दबंगई से घृणा करो राजा भैय्या से नहीं !


* काले  धन  से घृणा  करो  स्विस बैंक से नहीं !

*अश्लीलता से घृणा करो सन्नी लियोन से नहीं !

       और अंत में -

घोटालो से घृणा करो नेताओं  से नहीं !
बात है सच्चे सोने सी चौबीस कैरेट सही !
आने वाले हैं चुनाव दिल में न रखना खोट !
दागी हैं तो क्या हुआ हमको ही देना वोट !

शिखा कौशिक 'नूतन '



मंगलवार, 21 मई 2013

ANTI TERRORISM DAY-21ST MAY




I AM A HUMAN , I LOVE HUMANITY
I HATE TERROR , HATE TERROR , HATE TERRORISM !

STOP VIOLENCE THIS IS TOO MUCH SO FAR ,
WE WANT PEACE , WE DON'T WANT WAR ,
COME WITH ME , SHOUT LOUDLY !
I HATE TERROR , HATE TERROR , HATE TERRORISM !


MEND YOUR WAYS MR. TERRORIST ,
ADMIT YOUR SIN IN YOUR OWN INTEREST ,

COME WITH ME , SHOUT LOUDLY !
I HATE TERROR , HATE TERROR , HATE TERRORISM !

ZERO TOLERANCE AGAINST TERRORISM ,
TOGETHER WE CAN MAKE THIS WORLD BEAUTIFUL ,
 COME WITH ME , SAY WITH ME !


I HATE TERROR , HATE TERROR , HATE TERRORISM !

SHIKHA KAUSHIK 'NUTAN '




सोमवार, 20 मई 2013

चेहरे पर चेहरा -सुश्री पुनीता सिंह की कहानी


   चेहरे  पर चेहरा    -सुश्री पुनीता सिंह की कहानी  "सरिता"के मई द्वितीय अंक में  शीर्षक -चहरे पर चेहरा "प्रकाशित हुई है। पढ़े और अपनी प्रतिक्रया अवश्य दें ।
         Indian_bride : Beautiful brunette portrait with traditionl costume. Indian style           
मैं जब व्याह कर आयी तो उम्र के उस दौर में थी जहाँ लडकियाँ सपनों की एक अनोखी दुनियाँ में खोयी रहती हैं।पढना लिखना, घूमना फिरना,हल्के फुल्के घरेलू काम कर देना वो भी माँ ज्यादा जोर देकर, कहतीं तो कर देती वरना मस्ती मारना सहेलियों से गप्पें मारना यही काम होता था मेरा,।मुझसे छोटी दो बहिनें थीं इसीलिये पापा को मेरी शादी की बहुत जल्दी थी।शादी के वक्त मेरी उम्र उन्नीस और अमर की चौबीस के आसपास थी।छोटे से कस्बे के पाँच कमरों वाले घर में काफी चहल-पहल रहती थी।सारा दिन घर की जिम्मेदारियाँ निभाते बीत जाता। छोटा देवर आशु बहुत ही शैतान था घर में सबसे छोटा होने के कारण सबके लाड प्यार में एकदम जिद्दी बन गया था।स्कूल से आते ही सारा समान पूरे घर में फैला कर रख देता कपडे कहीं फेकता, मोज़े कहीं तो स्कूल बैग कहीं।अर्चना और शोभा से वो पहले घर आ जाता था।आते ही फरमाइशों का दौर शुरु कर हो जाता,खाने में रोज़ उसे कुछ भी पसन्द नहीं आता,दाल,सब्जी,रायता चावल सभी थाली में छोड रुठ कर सो जाता।पता नहीं कैसा खाना चाहता था वो?माँजी भी उसकी इन आदतों से काफी परेशान रहती थी।मैं कहना चाहती थी कि आप ने ही उसकी आदतों को बिगाड कर रखा है,पर कह नहीं पाती। मालूम था माँजी नाराज़ हो जायेगीं। एक वार अमर ने कह दिया था तो कई दिनों तक घर का माहौल अशान्त बना रहा था।आशु उनका बहुत ही दुलारा था।
    अमर के बाद दो-दो साल के अन्तर पर अर्चना और शोभा का जन्म हुआ था।माँजी को एक और बेटे की चाह थी ताकि अमर के साथ उसका भाई-भाई का जोडा बन सके।ये बातें बाबूजी के मुहँ से माँजी पर गुस्सा होने के समय ज़ाहिरहो गई थी।अमर और आशु में चौदह साल का फासला था,दोनों में बिल्कुल भी नहीं बनतीं थीं।अमर बहुत ही शान्त स्वभाव के थे और आशु उग्र,मुहँफट और जिद्दी।माँ-बाबूजी से बराबर ज़ुबान लडाता,अपनी पढाई पर भी ध्यान नहीं देता था।आशु को बिगाडने में सबसे बडा हाथ माँजी का ही था। घर में जो कुछ बनता सभी को पसन्द आता कभी-कभी की बात और है मगर आशु की पसन्द ही कुछ और होती माँ जी वैसे तो रसोई में झाँकती भी नहीं थी पर आशु की पसन्द का खाना रोज़ अलग से खुद बनाती।इसी लिये उसे अपनी ज़िद्द मनमाने की आदत सी हो गई थी।
    अमर की शादी जल्दी करवा दी गई क्योकि अमर को बाबूजी का बिज़निश ही संभालना था।माँजी को भी बहू के रुप में एक सहयोगी की ज़रुरत महसूस होने लगी और व्याहकर मैं इस घर में आ गई।उम्र का वह ऎसा दौर था जब थकान का नाम ही नहीं था एक घरेलू लडकी की तरह पूरे घर का काम मैनें संभाल लिया था सभी की तारीफे सुन उत्साह में बस काम ही काम के बारे में सोचती रही कभी अपनी खुशियों की तरफ ध्यान ही नहीं दिया उसी का खामियाज़ा मुझे आज भुगतना पड रहा था माँजी कई-कई महीनें मेरे ऊपर सारा घर छोड बाहर अपने मायके या रिश्तेदारों के यहाँ रहती।अर्चना और शोभा के इम्तहान भी शुरु हो गये थे पर वो अभी तक लौट कर नहीं आयी।कभी नानीजी बीमार तो कभी मामाजी के बेटे को खाँसी जुकाम, अपनी जिम्मेदारियाँ छोड्कर दूसरो का घर सम्भालना कहाँ की अक्लमन्दी है?बाबूजी बहुत गुस्सा रहते थे उनसे फोन पर ही काफी कुछ सुना डालते पर माँजी को जब आना होगा तभी आयेगीं।इस उम्र में भी माँजी महीनों मायके में गुजार आतीं बच्चों को साथ लेकर जाना भी उन्हें पसन्द नही था।पूरी आज़ादी से रहतीं,उनकी घर गृहस्थी भी बढिया चलती रहती।मैं महीनों मायके जाने को तरसती रहती।मेरे जाने से घर में सभी को असुविधा हो जाती थी। किसी को भी नहीं महसूस नहीं होता कि मेरा भी इस घर -चूल्हे-चौके से मन ऊब जाता होगा यहाँ तक कि अमर भी मेरी भावनाओं को नहीं समझते जब भी मै मायके जाने की बात करती कोई ना कोई बहाना बना मुझे रोक देते,कभी अर्चना  शोभा के एग्ज़ाम कभी आशु को कौन देखभाल करेगा माँजी भी नहीं है।जब माँजी आ जातीं तो-माँ क्या सोचेगीं अभी अभी कल ही तो माँ आयीं है कुछ दिन तो गुजरने दो,जैसे बहाने बनाने शुरु कर देते।मैं तडप कर रह जाती पर कुछ कह नहीं पाती।
  मई जून की छुट्टीयों में भैया ने शिमला घूमने जाने का प्रोग्राम बनाया था। भैया ने मुझे भी अपने साथ ले जाने के लिये बाबूजी को फोन कर दिया।पन्द्रह दिनों का प्रोगाम था।पता लगते ही घर में जैसे मातम सा छा गया।माँजी एकदम से उखड गयीं-"अपना प्रोगाम बता दिया हमारे बारे में कुछ सोचा ही नहीं मै बुढिया इतने दिनों तक अकेले कैसे पूरा घर संभालूगीं?गुस्से में भर कर मुझसे कहने लगीं-तू अपने भाई से बोल देना इस तरह आना-जाना हम पसन्द नहीं करते हैं हमें जब सुविधा होगी तभी तो भेज पायेगें"।
   "तो आप मना कर दीजिये अगर आपका मन नहीं है तो"मैने भी थोडा  नाराज़गी भरे स्वर में कह दिया।
    "कह तो ऎसे रही है जैसे हमारे मना करने से मान जायेगी तेरा मन ही नहीं है जाने का ,पहले ही भाई-बहन की बात हो गई होगी"।माँजी ने तीखे स्वरों में कहा।
   " किसका मन नहीं करता होगा मायके जाने का?यहाँ तो महीनों हो जातें हैं,अपने आप तो कोई कभी कहता ही नहीं हैं भैया कभी बुलाने को कहते तो घर में तूफान खडा हो जाता है। घर में एक नौकरानी के चले जाने से सारा काम रुक जो जाता है वरना मुझसे इतना प्यार किसे था।"मै भी गुस्से में कहना तो चाहती थी पर बात और कलह का रुप लेगी यही सोच कर चुप रह गई।
   अमर भी कहने लगे-"अच्छा तुम्हारे भैया का फोन आया घर में तनाव ही फैल गया"।
  "तो आप भी यही चाहतें हैं कि कोई भी मुझे ना बुलाये और ना मैं इस घर से बाहर कदम रखूँ। बंधुआ मज़दूर जैसी पूरी ज़िन्दगी इसी तरह दिनरात चुल्हे चोके में पिसती रहूँ मुझे भी चेन्ज़ की ज़रुरत हो सकती है कोई भी नही सोचता"।मेरी आँखों में आसूँ आ जाते हैं।
मेरे आँसू देखते ही अमर मुझे समझाने लगते-"तुमने घर को इतनी अच्छी तरह से संभाल लिया है सभी को तुम्हारी आदत सी पड गयी है तुम्हारे जाने के बाद ना तो समय पर नाश्ता मिलेगा ना रात को ढंग का डिनर ,माँ से कुछ कह भी नहीं सकता ।हर समय नाराज़ सी रहतीं हैं काम का लोड जो ज्यादा हो जाता है उन पर। तुम्हारे आने के बाद वो किचन में कम ही जातीं हैं"।
  सुवह बताना था कि हमारा क्या प्रोग्राम बना है-भैया लेने आयेंगें या इधर से कोई मुझे छोडने जायेगा।कितनी बार कहा सीधी ट्रेन है लखनऊ की, मैं चली जाऊँगी,वहाँ भैया लेने आ जायेगें पर कोई जाने देता ही नही। कहीं अकेले आना- जाना सीख गई तो जल्दी-जल्दी जाने लगूँ। किसी का आसरा भी ना देखना पडेगा।
 सुवह हिम्म्त करके बाबूजी के साथ जाकर अमर ने ही माँजी से बात की-"जाने भी दो माँ ,कुछ दिनो की ही तो बात है अर्चना- शोभा है; कामबाली है, सब काम हो ही जायेगा। आप ज्यादा टेन्शन मत लो"।
अमर बहुत ही कम बोलते थे बीबी की तरफ से बोलते देख माँजी को बहुत गुस्सा आ गया-"बडा आया बीबी की तरफ्दारी करने बाला,मैने क्या मना किया है?उसका प्रोग्राम पक्का है कौन सा मेरे रोकने से रुकने वाली है?तुझे जाना हो तो तूभी चला जा देखूँ कौन सा काम यहाँ रुक जायेगा?ज़ोरु का गुलाम कहीं का"माँजी ने धीरे से कहा पर अमर ने सुन लिया। सारा मूड खराब हो गया। बिना नाश्ता किये ही घर से चले गये।  
 सन्डे की सुवह भैया ने फोन करने को कहा था सभी लोग घर पर ही थे। भैया ने फोन किया रिंग पर रिंग बजे जा रहीं थी पर कौन उठाये ?आखिर बाबूजी ने फोन उठाया,मेरे और अमर के जाने का प्रोग्राम पक्का कर दिया और दिन भी बता दिया।माँजी का चेहरा देखने लायक था।बाबूजी इस घर के बडे थे आखिरी फैसला उन्हे ही सोच-समझकर लेना होता था।ज़िद्दी पत्नी से वो ज्यादा उलझते नहीं थे ताकि घर की शान्ति बनी रहे।माँजी बाबूजी पर काफी बिगडीं,पर बाबूजी चुपचाप रहे।सभी काम तो चलते रहे पर दो दिनों तक घर का वातावरण काफी बोझिल रहा।जाने का सारा उत्साह ही खत्म हो गया था।सारा काम खत्म कर रात को मैं अपनी पैकिंग करने लगी। कम से कम पन्द्र्ह-बीस दिनों के लिये आराम की जिन्दगी गुज़ार सकूगीं।भैया,सपना भाभी,छोटा भतीजा सभी बहुत ध्यान रखते थे मेरा।जितने दिन रहूँ मेरी ही पसन्द का खाना बनता था,  भाभी बाज़ार जातीं तो पूछ्तीं मुझे कुछ चाहिये तो नहीं?साडी ,शाल जो भी चीज़ पर मैं हाथ रख देती, मुझे जबरन दिलवा देतीं, पैसे भी नहीं लेतीं।मायके में माँ के बाद भैया भाभी ही तो रह जायेगें जो मुझे पूरी इज़्ज़त दे सकते थे।ससुराल के तनाव से कुछ दिनों के लिये राहत मिल जाती थी।
  दो दिन की छुट्टी करके अमर मुझे ले कर लखनऊ पहुँचे स्टेशन पर भैया गाडी लेकर पहले से ही हम दोनों की प्रतीक्षा कर रहे थे। छोटा भतीजा अभिषेक भी साथ था,कितना लम्बा हो गया था। कितने दिनों बाद देख रही थी उसे। आधे घन्टे में हम लोग घर आ गये। माँ और भाभी मेरे और अमर के स्वागत मे लगीं हुई थी।पूरा घर साफ-सँवरा हुआ लग रहा था।फैश हो कर हम सभी ने साथ बैठकर नाश्ता किया और गप्पें मारने लगे।
   "कितना कमज़ोर कर दिया है हमारी ननदरानी को आपने"भाभी ने अमर को ताना मारते हुये कहा।
   "पूरी किचन की मालकिन तो ये ही हैं,अब डाईटिंग करें तो कोई क्या कर सकता है।हमें तो जो कुछ भी बनाकर दे देंती हैं ,शरीफ पतियों की तरह चुपचाप खा लेतें है"।अमर ने भी मज़ाक में ज़वाब दिया।
 सभी के ठ्हाकों से घर गूँज उठा।अमर के घर में ऎसा वातावरण कहाँ मिलता था?हर वक्त सहमा-सहमा सा माहौल,बाबूजी भी बहुत नापतोल कर बोलते।माँजी के तेज़तर्रार स्वभाव के कारण अक्सर घर में बिना बात के कलेश हो जाता था।अर्चना -शोभा ज़रुर अपने कालेज के किस्से सुनातीं तो थोडा हंसी-मज़ाक हो जाता था,वो भी माँजी के सामने कुछ नहीं सुनातीं पता नहीं कौन सी बात का वो क्या मतलब निकालने लगें?
अभिषेक के टैस्ट  चल रहे थे इसलिये वो हमारे साथ नहीं जा रहा था।अमर को सुवह भैया स्टेशन छोड्ने निकल गये हमें भी रात को निकलना था।
एक हफ्ता खूब मौज़-मस्ती से गुज़ार हम लोग लौट आये।भाभी ने जी खोल कर शिमला में शापिंग की,सभी के लिये कुछ ना कुछ उपहार लेकर आयीं थीं।मैने भी माँजी और बाबूजी के लिये शाल,अर्चना और शोभा के लिये आर्टीफिशल ईअर रिंग,आशु और अमर के लिये भी उपहार लिये थे अब पता नहीं सबको पसन्द आते हैं या नहीं?ज्यादा कीमती गिफ्ट खरीदने की गुन्जाइश भी नहीं थी।  
 घूमने के बाद घर पहुँचकर थकान बहुत महसूस हो रही थी। हम सभी डिनर लेकर जल्दी ही सो गये।रविवार था इसलिये भैया, भाभी,अभिषेक देर तक सो रहे थे। मैने और माँ ने साथ बैठ्कर चाय पी।
 कल माँ से कोई बात भी नहीं हो पाई थकान बहुत हो रही थी।माँ ने प्यार से अपने पास बिठाया कहने लगीं-"तेरी ससुराल में सब ठीक चल रहा है,अमर तेरा ध्यान तो रखतें है।मेरे सिर पर हाथ रख कर बोली-तुझसे एक बात कहनी थी, बेटी बुरा मत मानना।इस टूर पर तुझे ले जाने का सपना का बिल्कुल मन नहीं था। दोनों में खूब बहस हुई कह रही थी"शादी के बाद ऎसा चाँस पडा है कि हम अकेले जायें कहीं आपने बिना मुझसे पूछे दीदी का प्रोग्राम बना डाला"।मेरे कान में जब बात पड गयी तो मैने तुझे बताना ज़रुरी समझा"।
"ये तुम क्या कह रही हो माँ"मैं बहुत हैरान थी। भाभी ने तो हर समय मेरा बहुत ध्यान रखा, कहीं से भी नहीं लगा कि वो मुझे नहीं ले जाना चाहतीं अपने साथ।
"विजय को पता है तू कहीं घूमने नहीं जा पाती फिर अभिषेक भी नहीं जा रहा था इसलिये उसने सोचा उसी बज़ट में तेरा घूमना हो जायेगा। पर बहू को अच्छा नहीं लगा।तुझे बुरा तो लग रहा होगा पर                         आगे से इस बात का ख्याल रखना।पहले इसलिये नहीं बताया घूमने का तेरा सारा मूड ही चौपट हो जाता"।माँ कह रहीं थी।
 आँखे बन्द कर मैं सोफे पर चुपचाप लेट गई ।माँ मेरी मनोदशा समझतीं थी,मुझे अकेला छोड वो अपने दैनिक काम निपटाने में लग गई। ये दुनिया भी कितनी अजीब है यहाँ हर इन्सान एक चेहरे पर दूसरा चेहरा लगाये घूम रहा है। भाभी ने एक अच्छी भाभी का रोल  बखूबी निभाया। अगर माँ ने नहीं बताया होता तो--- ,पर माँ ने सही समय देख मुझे सही राह दिखा दी ताकि उनके ना रहने के बाद भी मेरा मायके में पूरा सम्मान बना रहे।भैया तो मेरे अपने हैं पर भाभी तो और भी अच्छी है जिन्होनें इच्छा ना होते हुये भी पूरे टूर पर ये एहसास भी नहीं होने दिया कि वो मुझे नहीं लाना चाहतीं थीं।मुझे अमर और उनके घरवालों से ये बातें छुपानी होंगीं,कितनी मुसीबतों के बाद वहाँ से निकलना हो पाया था पता होता तो प्रोग्राम बनाती ही नही।अब जो हुआ सो हुआ। सबकी तरह मुझे भी अपने चेहरे पर एक और चेहरा लगाना होगा-मुस्कराता,हँसता हुआ चेहरा जो बयाँ कर रहा हो मेरा ये सफर बहुत ही यादगार रहा है।अमर को भी यही बताउँगी कि ये दिन बहुत ही हँसी खुशी से बीते।
प्रेषक-
पुनीता सिंह

रविवार, 19 मई 2013

डॉगी और कुत्ते में के फरक होवे है- लघु कथा


डॉगी और कुत्ते में के फरक होवे है- लघु कथा 

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मिश्रा साहब के बंगले पर माली का काम करने वाला बुद्धू पौधों की सिचाई कर रहा था .आज उसके साथ उसका पांच वर्षीय बेटा दीपू भी आया था .दीपू बगीचे के फूल देखकर आनंदित हो रहा था तभी मिश्रा साहब का सात वर्षीय बेटा जॉनी अपने डॉगी  के पीछे दौड़ते दौड़ते हुए वहां आ पहुंचा .जॉनी के सुन्दर डॉगी को देखते ही दीपू चिल्लाया -''बापू देख कित्ता सुन्दर कुत्ता !!''जॉनी दीपू की बात सुनकर गुस्से में भरकर बोल -''शटअप ...ये कुत्ता नहीं ..ये डॉगी है स्टुपिड ...रास्कल ..!!''जॉनी को गुस्सा होते देख बुद्धू दीपू को डपटते हुए बोला -''माफ़ी मांग इनसे ...बाबू भैया माफ़ कर दो इसे ..अक्ल नहीं है इसमें .'' जॉनी ने एक घृणा भरी दृष्टि दीपू पर डाली और पुचकारते हुए अपने डॉगी को गोद में उठाकर वहां से चला गया .जॉनी के जाते ही दीपू ने मासूमियत के साथ बुद्धू से पूछा - '' बापू डॉगी और कुत्ते में के फरक होवे है ?'' बुद्धू   दीपू के सिर पर हल्की सी चपत लगाते हुए बोला -''छोरे जो बंगले में रहवे है वो डॉगी और जो सड़क पे रहवे है वो कुत्ता .समझा कछु ? दीपू समझते हुए बोला -''यानि बापू ..बाबू भैया डॉगी है और... मैं कुत्ता ....क्यूँ ठीक कहा बापू ? '' दीपू की बात सुनकर बुद्धू उदास होते हुए बोला -'' हां ! बेटा ठीक कहा .'' 

शिखा कौशिक 'नूतन' 

No ‘Assembly’ For Women-By Christina Daniels


No ‘Assembly’ For Women

Once again, Karnataka has an Assembly that has no women. What are the implications for legislation?

By Christina Daniels May 9, 2013 6:14PM
The 2013 Assembly elections in Karnataka have generated tremendous national interest, not least of all because the first ever BJP government in South India was shown the door. But the elections that had a record 70.23% voter turnout, brought only six woman MLAs into the Assembly. And five of them are first- time entrants into the Assembly!

So while religious, caste and class equations have been taken into consideration, are women adequately represented in the fourteenth assembly? Could this translate into fewer opportunities for proactive legislation that genuinely impacts women?

The imbalance begins at the candidature level itself. In Karnataka, there were just 170 females candidates in the fray, against 2778 male candidates in 2013. This inspite of the fact that an almost equal number of men and women came out to vote—22.22 million men voters against 21.35 million women voters.

So while women seem to be trusted to vote, they do not seem to be trusted to lead on their own merit. When they do enter politics, they seem to need the backing of their family or a powerful male figure. Yet, it must be said that the new assembly is still an improvement on the thirteenth assembly, which had only five women MLAs or a 2.67% representation. 

Interestingly, women had the best representation during the 50s and 60s, even touching 18 elected representatives in 1962. But since then, the entry of both money and muscle power into politics have created the perception that politics is unsuitable women. So, while women achievers have made their mark in various spheres, they remain under represented here.

It should come as no surprise then that when women protestors marched on the streets of Delhi after the rape of a young student there, they were labeled as ‘painted’ and ‘dented’ women by a male politician. If women do not participate in legislation, they cannot expect their views to be adequately represented.

Yet, the Panchayat system shows that there is hope yet, and that this trend can be reversed. Once 50% reservation for women was introduced here, their representation in Village Panchayats improved dramatically. While many of these women function as proxies for their husbands, it is still a beginning at the grassroots level.

I have never been a supporter of reservation. But six women in the Karnataka Assembly, spread over three different political parties, is extremely disheartening. Where is the critical mass in any single party to lobby effectively for women’s issues? It is necessary to correct this imbalance if legislation is to be representative of all sections of society.  

बुधवार, 15 मई 2013

मेरे भारत के घर-घर में न पाकिस्तान बनाना !



  

आड़ इस्लाम की लेकर , देशभक्तों पे निशाना ,
मियां ये खेल है गन्दा ,पड़ेगा तुमको पछताना !

नहीं मिल्लत की ये खिदमत , इसे कहते हैं गद्दारी ,
बड़े शातिर हो मियां तुम , आग आता है लगाना !

सलाम माँ को करने से  रोकता है हमें मजहब ,
मियां मासूम मिल्लत को छोड़ दो ऐसे भटकाना !

मोहब्बत छीन  दिलों से , उनमे भर रहे नफरत ,
ढूंढ लेते हो मियां रोज़ , नया एक बहाना !

नाम लेकर तू खुदा का ये कैसी चल रहा चालें ?
तुझे मैं याद दिला दूं  , खुदा के घर भी है जाना !

तुम्हे पैगाम है मेरा , संभल जाओ मियां जल्दी ,
अमन का मुल्क है भारत , यहाँ दहशत न फैलाना !

न दिल नापाक रख अपना , हिदायत ये भी याद रख ,
मेरे भारत के घर-घर में न पाकिस्तान बनाना !

[ मिल्लत-मुस्लिम समाज ]

मेरा भारत ऐसा  है !
Photo: Yahi hai mera Bharat
RAHUL GANDHI WITH A VISION FOR COMMON PEOPLE

   शिखा कौशिक 'नूतन '








मंगलवार, 14 मई 2013

एक हज़ार का नोट -a short story



One Thousand Rupee Indian Note Stock Photography - Image: 5849772

सत्ताधारी पार्टी प्रमुख के सांसद पुत्र अपने कारों के काफिले के साथ अपने संसदीय क्षेत्र  के दौरे पर थे . एक गाँव से गुजरते हुए उन्होंने एक दस वर्षीय बालक को अख़बार बेचते हुए देखा .उन्होंने उसे पास आने का संकेत किया .बालक अख़बार की एक प्रति लेकर उनकी ओर तेज़ी से दौड़कर पहुँच गया .और उन्हें अख़बार की प्रति पकड़ा दी .अख़बार लेकर मुस्कुराते  हुए पार्टी प्रमुख के सांसद पुत्र ने अपनी जेब से एक हज़ार का नोट निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिया .इस पर वह बालक मुस्कुराते हुए बोला-''नेता जी ..ठीक है आपके शासन में महगाई ने  गरीब आदमी की कमर तोड़ दी है .हमारा पूरा परिवार दिन भर मेहनत करके भी दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पाता .माँ-बापू रोज़ जहर खाकर मरने के बारे में सोचते हैं .मैं कड़ी धूप ,बारिश , कातिल ठंड में नंगे बदन व् नंगे पैर दिन भर मेहनत करता हूँ पर फिर भी आपकी जानकारी के लिए बता दूं  कि भारत में अभी अख़बार की एक प्रति की कीमत एक हज़ार रूपये नहीं है .'' यह कहकर वो नोट बिना लिए ही तेज़ी से अपने गंतव्य  की ओर दौड़ पड़ा और सत्ताधारी पार्टी प्रमुख के सांसद पुत्र ने एक हज़ार के नोट को मुट्ठी  में भींच लिया !

   शिखा कौशिक 'नूतन '

रविवार, 12 मई 2013

एक यादगार दिवस (अखिल भारतीय महिला आश्रम में मनाया मातृ दिवस)

अखिल भारतीय महिला आश्रम देहरादून में आज मातृ दिवस पर उत्तराखंड महिला एसोसिएशन द्वारा प्रोग्राम आयोजित किया गया जिसमे मैंने और मेरी प्रिय मित्र डॉ . नूतन गैरोला और कल्पना आत्रे ने अपना सहयोग दिया। माँ को पत्र लेखन में मुझे और नूतन जी को पुरस्कृत किया गया । हमने वृद्ध महिलाओं (जिनको आश्रम में छोड़ दिया गया )और बच्चों को कपडे और खाने का सामान वितरित किया । मैंने माँ के ऊपर लिखी एक ग़ज़ल गायी  । हम दोनों ने माँ को लिखे पत्र पढ़े ,वहां नन्ही नन्ही बच्चियों (जिनमे कोई अनाथ है या किसी को माता - पिता ने खुद आश्रम में छोड़ दिया) से बाते की ,कई बार माहौल ग़मगीन भी हुआ कुछ वृद्ध महिला की आँखों से तो अश्रु की झड़ी भी लगी थी । मेरी मित्र नूतन और खुद मैं पत्र पढ़ते हुए भावुक हो उठे थे। एक यादगार दिन जिसको हम कभी नहीं भूल सकते दिल में लेकर भारी दिल से उन बच्चों और महिलाओं से विदा लेकर वापस लौट कर आये ,पर आते हुए एस लग रहा था की हमारे और उनके बीच कोई भावनात्मक रिश्ता बन चुका है अतः फिर मिलने का वादा कर हमने विदा ली ----सबको मात्र दिवस की शुभकामनाएं ।---देखिये कुछ चित्र वहां के 
वृद्ध बेसहारा महिलाओं को कपडे और खाद्य सामग्री भेंट करते हुए मैं और मेरी प्रिय मित्र डॉ नूतन गैरोला 
यहाँ मीडिया को एक ग्रुप फोटो देते हुए सबके साथ 
यहाँ माँ के नाम पत्र पढ़ते हुए मैं 
यहाँ महिला आयोग की अध्यक्ष सुशीला बलूनी जी से पुरस्कार लेते हुए 
आश्रम की प्यारी बच्चियां जो मदर डे पर अपनी माँ के लिए तरसती दिखाई दी 
हम सब ने कहा आप से हमें माँ कह सकती हो 
हिन्दुस्तान व् अन्य अखबारों ने  उस आयोजन की बढ़िया कवरेज दी 
बच्चों ने हाथ हिल कर हमको विदा किया और हम फिर मिलने का वादा करके भारी मन से लौट आये ,किन्तु मदर डे पर हमें भगवान् ने हमे इतना अच्छा तोहफा दिया इतने प्यारे बच्चे और माओं से मिलवाया ,हमे एक मकसद दिया । 
अब अंत में अपनी प्रस्तुति का एक विडियो दिखाना चाहती हूँ 
और मातृ दिवस की एक बार फिर से शुभकामनायें देती हूँ 
अब देखिये विडियो ------

''मदर्स डे'' का सच्चा उपहार


 

घर घर बर्तन माँजकर  विधवा सुदेश अपनी एकलौती संतान लक्ष्मी का किसी प्रकार पालन पोषण कर रही थी  .लक्ष्मी पंद्रह साल की हो चली थी और  सरकारी  स्कूल  में  कक्षा  दस  की छात्रा थी .आज  लक्ष्मी का मन बहुत उदास  था .उसकी  कक्षा  की  कई  सहपाठिनों  ने उसे बताया था कि उन्होंने अपनी माँ के लिए आज मदर्स डे पर सुन्दर उपहार ख़रीदे हैं पर लक्ष्मी के पास इतने पैसे नहीं थे कि वो माँ के लिए कोई उपहार लाती  .स्कूल से आकर लक्ष्मी ने देखा माँ काम पर नहीं गई है और कमरे में  एक खाट  पर बेसुध लेटी हुई है .लक्ष्मी ने माँ के माथे पर हथेली रख कर देखा तो वो तेज ज्वर से तप रही थी .लक्ष्मी दौड़कर डॉक्टर साहब को बुला लाई और उनके द्वारा बताई गई दवाई लाकर  माँ को दे दी .माँ जहाँ जहाँ काम करती है आज लक्ष्मी स्वयं वहां काम करने चली गयी .लौटकर देखा तो माँ की हालत में काफी सुधार हो चुका था .लक्ष्मी ने माँ का आलिंगन करते हुए कहा -''माँ आज मदर्स डे है पर मैं आपके लिए कोई उपहार नहीं ला पाई ...मुझे माफ़ कर दो !''सुदेश ने लक्ष्मी का माथा चूमते हुए कहा -''रानी बिटिया कोई माँ उपहार की अभिलाषा में संतान का पालन-पोषण नहीं करती ...तुम्हारे मन में मेरे प्रति जो स्नेह है वो तुमने मेरी सेवा कर प्रकट कर दिया है .आज तुमने मुझे ये अहसास करा दिया है कि मैं एक सफल माँ हूँ .मैंने जो स्नेह के बीज रोपे वे आज पौध बन कर तुम्हारे ह्रदय में पनप रहे हैं .तुमने ''मदर्स डे'' का सच्चा  उपहार दिया है !!''

शिखा कौशिक 'नूतन '

शुक्रवार, 10 मई 2013

'वन्देमातरम' नहीं इबादत ये माँ को तसलीम !



News for bsp leader insulted vande mataram

IBNLive
  1. BSP MP Insults Vande Mataram in Lok Sabha
Indiatimes.com ‎- 4 hours ago
One honourable member walked out when Vande Mataram was being ... He has insulted Parliament," party leader Shahnawaz Hussain told ...


'' वन्देमातरम '' कहने में जिस मियां की हो तौहीन ,
   ऐसे माँ के गद्दारों से सारे हक़ लो छीन !

नहीं इबादत इसको कहते , ये है माँ से प्यार ,
लेकर धर्म का नाम बनाओ इसको मत व्यापार ,
किसने दी है नमक हरामी की तुमको तालीम ?
   ऐसे माँ के गद्दारों से सारे हक़ लो छीन !

आपस में दिनभर करते हो मियां जी आप सलाम ,
भारत माँ को करने में आड़े आता 'इस्लाम' ,
'वन्देमातरमनहीं इबादत ये माँ को तसलीम !
   ऐसे माँ के गद्दारों से सारे हक़ लो छीन !

माँ के उपकारों का बदला क्या देगी औलाद ?
सिर्फ ह्रदय से गाकर महिमा पाते  आशीर्वाद ,
माँ की ममता नहीं देखती धर्म व् मजहब-दीन !
ऐसे माँ के गद्दारों से सारे हक़ लो छीन !

खुली हवा में जीने का दिया हमें अधिकार ,
करे शुक्रिया  जो माँ का उसको है धिक्कार ,
भारत माँ में बसे हैं बन्दे अपने राम-रहीम !
ऐसे माँ के गद्दारों से सारे हक़ लो छीन !

नहीं सियासत के चक्कर में माँ का कर अपमान ,
ख़ुदा ने बख्शी  बरकत जो देता माँ को मान ,
अब  फ़तूर को छोड़ ख़ुदा के बन्दे अरे सलीम !
ऐसे माँ के गद्दारों से सारे हक़ लो छीन !

शिखा कौशिक 'नूतन '

गुरुवार, 2 मई 2013

रानी


वह रोज आती है मेरे यहाँ अपनी माँ के साथ ! छोटी सी बच्ची है पाँच छ: साल की ! नाम है रानी ! माँ बर्तन माँज कर डलिया में रखती जाती है वह एक-एक दो-दो उठा कर शेल्फ में सजाती जाती है ! छोटे-छोटे हाथों से बड़े-बड़े भारी बर्तन कुकर कढ़ाई उठाती है तो डर लगता है कि कहीं गिरा न ले अपने पैरों पर ! कितनी चोट लग जायेगी !
मैं उसे प्यार से अपने पास बिठा लेती हूँ अक्सर ! बिस्किट, रस्क या कुछ खाने को दे देती हूँ कि उसकी माँ उसे काम ना बता पाये ! लेकिन ज़रा देर में ही उसकी पुकार लग जाती है ! कभी पुचकार के साथ तो कभी खीझ भरी झिड़की के साथ !
चल रानी ! जल्दी-जल्दी डला खाली कर दे बेटा ! फिर झाडू भी तो लगानी है ! ज़रा जल्दी हाथ चला ले !
मेरे मन में मरोड़ सी उठती है ! मेरे परिवार में भी बच्चियाँ हैं ! अच्छे स्कूल में पढती हैं ! क्या इस बच्ची को पढ़ने का हक नहीं है ! क्या उसका बचपन इसी तरह अपनी माँ के साथ बर्तन माँजते और झाडू लगाते ही बीत जायेगा ! अगर यह नहीं पढ़ा पा रही है तो मैं उसके स्कूल की फीस भर दूँगी ! कम से कम उसका भविष्य तो बन जायेगा ! मैं उसकी माँ मीरा को बुलाती हूँ ! उसे अपने मन की बात बताती हूँ ! लेकिन मेरी बात सुन कर जब उसके चहरे पर कोई अपेक्षित प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती है तो मुझे आश्चर्य के साथ कुछ निराशा भी होती है !
मैं तो उसका स्कूल में एडमीशन करवाना चाहती हूँ और तुम कोई दिलचस्पी ही नहीं दिखा रही हो ! इतनी ज़रा सी बच्ची से घर का काम करवा रही हो पता है यह अपराध होता है ! बच्चों से काम नहीं कराते ! किसीने रिपोर्ट कर दी तो हमें भी सज़ा हो जायेगी और तुम भी लपेटे में आ जाओगी ! इसे अपने साथ मत लाया करो !
 तो कहाँ छोड़ कर आऊँ इसे आप बताओ ! मीरा जैसे फट पड़ी ! सारा दिन तो मेरा आप लोगन के घर के काम करने में निकल जाता है ! इसे घर में किसके पास छोड़ूँ ! इसका बाप सुबह से ही कारखाने चला जाता है काम पर ! लड़के भी दोनों अभी बच्चा ही हैं ! स्कूल से आकर बाहर दोस्तों में डोलने चले जाते हैं ! उनके ऊपर इसकी जिम्मेदारी कैसे डाल सकू हूँ ! लड़की जात है इसीके मारे साथ लेकर आती हूँ ! सबका काम निबटाते-निबटाते मुझे संजा के सात बज जाते हैं ! कैसा बुरा बखत चल रहा है आजकल ! अकेली छोरी चार पाँच बजे संजा को स्कूल से घर लौटेगी तो कौन इसे देखेगा ! इसीलिये इसका नाम नहीं लिखवाया ! मेरी आँख के सामने रहेगी तो बची तो रहेगी ! नहीं तो आजकल तो हर जगह बस एक ही बात सुनाई देत है ! कैसा बुरा ज़माना आ गया है !
मुझे कोई जवाब नहीं सूझ रहा था ! वाकई मीरा जैसे लोगों की समस्या गंभीर है ! यह भी कामकाजी महिला है ! लेकिन अपने बच्चों को क्रेच में नहीं डाल सकती ! लड़कों को पढ़ा रही है लेकिन लड़की को स्कूल में सिर्फ इसलिए नहीं भर्ती कराया कि उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किस पर डाले ! कैसे विचित्र नियम और क़ानून हमने बनाये हैं ! श्रम दिवस के गुणगान बहुत गाये जाते हैं लेकिन जो वास्तव में श्रमजीवी हैं उनके लिये ये क़ानून कितने सुविधाजनक एवँ फलदायी हैं और कितने समस्याएँ बढ़ाने वाले और दिक्कतें पैदा करने वाले हैं इसका आकलन करने की ज़हमत कौन उठाता है ! जबकि सबसे ज्यादह ज़रूरत इसी बात की है !
 स्वयंसेवी संस्थायें जो निर्धन बस्तियों में इनकी सहायता के लिये काम कर रही हैं उन्हें इन बच्चों के लिये नि:शुल्क क्रेच खोलने चाहिये जहाँ इन्हें प्रारम्भिक शिक्षा भी मिल सके, इनके खेलकूद, मनोरंजन एवँ उम्र के अनुसार इनकी कलात्मकता को बढ़ावा देने वाली ट्रेनिंग की भी समुचित व्यवस्था हो और ये एक सुरक्षित एवँ स्वस्थ माहौल में रह सकें ! मँहगाई इतनी बढ़ी हुई है कि इस वर्ग के परिवार में एक व्यक्ति की कमाई से सबका पेट भर जाये यह कल्पना भी असंभव है ! और माता पिता जब दोनों ही काम पर निकल जाते हैं तो नासमझ बच्चे गली मोहल्लों में असुरक्षित यहाँ वहाँ घूमते रहते हैं जिन्हें समाज में व्याप्त नकारात्मक प्रवृत्ति के लोग आसानी से मिठाई, चॉकलेट्स या खिलौने इत्यादि का लालच देकर आसानी से फुसला लेते हैं और फिर हृदय विदारक पाशविक घटनाओं को अंजाम देने में सफल हो जाते हैं !
बच्चों के यौन शोषण की समस्या की जड़ें कहाँ पर हैं उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है यह तो बहुत ही पेचीदा सवाल है ! सबकी मानसिकता में रातों रात सुधार आ जाये, फिल्मों, टीवी, या सेंसर बोर्ड के सारे कायदे कानूनों में बदलाव कर दिया जाये, लोगों को नैतिक शिक्षा और संस्कारों की घुट्टी पिलाना शुरू कर दी जाये ये सब बातें कहने सुनने में भले ही अच्छी लगें पर व्यावहारिकता के स्तर पर अमल में लाना असंभव हैं ! लेकिन अगर हम सचमुच गंभीरता से कोई निदान ढूँढना चाहते हैं तो इतना तो कर ही सकते हैं कि नासमझ छोटे बच्चे सड़कों पर लावारिस घूमते ना दिखें इसके लिये कुछ ऐसी व्यवस्था की जाये कि माता पिता पर बिना कोई अतिरिक्त भार डाले हुए बच्चों की बुनियादी शिक्षा और सुरक्षा का दायित्व उठा लिया जाये ! और ज़रूरी नहीं है कि प्रोफेशनल एन जी ओज़ ही इस तरह के काम को अंजाम दे सकते हैं ! शहरों में कुछ इस तरह की व्यवस्था होती है कि जहाँ सम्भ्रांत लोगों की रिहाइशी कॉलोनीज़ होती हैं उन्हीं के आस पास उनके घरों में तरह तरह से अपनी सेवाएं देने वाले वर्ग के लोगों की बस्तियाँ भी होती हैं ! सम्भ्रांत लोग अपनी और अपने बच्चों की सुरक्षा तो चाक चौबंद रखते हैं लेकिन दरिंदों की लपेटे में ये बच्चे आ जाते हैं जिनके पास उनके घर वालों की रहनुमाई उपलब्ध नहीं होती क्योंकि वे उस समय आपको घरों में आपकी सेवा में उपस्थित होते हैं और जिनके बिना आपका एक वक्त भी काम नहीं चल सकता ! तो क्या हम इनकी सेवाओं के बदले इतना भी नहीं कर सकते कि इनके बच्चों को कुछ समय देकर उनकी सुरक्षा, शिक्षा और खुशी के लिये थोड़ा सा वक्त दे दें ! इससे कितनी ही रानी, गुड़िया, मुनिया, बिटिया तो बच ही जायेंगी हमें भी खुद पर नाज़ करने के लिये एक पुख्ता वजह मिल जायेगी !
साधना वैद