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शनिवार, 10 दिसंबर 2016

'हर ज़ख्म छिपाना पड़ता है '

अपनों की गद्दारी का ;
हर ज़ख़्म छिपाना पड़ता है !
गैरों के  अपनेपन  से  ;
ये दिल बहलाना पड़ता है !
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है मालूम हमें मक्कारी  ;
पीठ के पीछे करता है ,
पर महफ़िल में हंसकर उससे ;
हाथ मिलाना पड़ता है !
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धोखा खाकर भी न सम्भले ;
मौत के मुंह तक आ पहुंचे ,
हमदर्दों की हमदर्दी का ;
मोल चुकाना पड़ता है !
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मेरे कातिल खड़े भीड़ में ;
मातम खूब मानते हैं ,
हाय ज़नाज़े को कन्धा भी ;
उन्हें लगाना पड़ता है !
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'नूतन' दिल के टुकड़े-टुकड़े ;
हुए हैं दुनियादारी में ,
जल्लादों के आगे सिर ये ;
रोज़ झुकाना पड़ता है !

शिखा कौशिक 'नूतन'

1 टिप्पणी:

शारदा अरोरा ने कहा…

dard ko khub ubhara hai Shikha ji ,badhiya abhivyakti.