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गुरुवार, 31 जनवरी 2013

आक्रोश

आक्रोश का ज्वार
बन कर न रह जाए कहीं
मौसमी ज्वर
कहीं कम न हो जाए
तपिश इस ज्वाला की
है नारी अस्मिता का यज्ञ
दो आहुति
अपने आक्रोश की
प्रज्वलित रहे
जब तक कि
प्रचंड ज्वाला
न लील जाए
विकृत वीभत्स विचारों को
यह लहू जो खौल रहा
रगों में
उबाल में इसके
ठंडक न आने पाए
कुत्सित विकृतियाँ
बीमार दिमागों की
छिपती रहेंगी कब तक
कानून की ओट में
बेनकाब दरिंदगी का चेहरा
सरेआम  कराया जाए
शालिनी रस्तोगी 

13 टिप्‍पणियां:

Shalini kaushik ने कहा…

सार्थक भावनात्मक अभिव्यक्तिनसीब सभ्रवाल से प्रेरणा लें भारत से पलायन करने वाले
आप भी जाने मानवाधिकार व् कानून :क्या अपराधियों के लिए ही बने हैं ?

sriram roy ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना ....

Anita ने कहा…

आक्रोश सुफल हो..

shalini rastogi ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद शालिनी जी,अनिता जी एवं श्रीराम रॉय जी!

Aditi Poonam ने कहा…

इस संवेदनशील रचना के लिए बधाई आपको

Pratibha Verma ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना ....

Jyoti khare ने कहा…

जीवन के सही रूप को दर्शाती
बहुत कहीं गहरे तक उतरती कविता ------बधाई

Rajesh Kumari ने कहा…

ये ज्वाला ठंडी ना होने पाए ,बहुत सशक्त सार्थक अभिव्यक्ति हेतु बधाई शालिनी जी

shalini rastogi ने कहा…

रचना के अनुमोदन के लिए आप सभी का ह्रदय से आभार !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सहमत हूं ... दरिंदों को बेनकाब करना जरूरी है ... अभी तक पहचान सार्वजनिक होनी चाहिए ...

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

सशक्त आक्रोश ...!!

shalini rastogi ने कहा…

धन्यवाद दिगंबर जी एवं हरकीरत जी!

Rajesh Kumari ने कहा…

बिलकुल सही कहा बहुत अच्छा लिखा बधाई आपको ये आक्रोश यूँ ही कायम रहे