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रविवार, 31 अगस्त 2025

"वे लोग" उपन्यास : गाँव–शहर की दूरी और स्त्री की आंतरिक पीड़ा का सूक्ष्म आख्यान है।


"वे लोग" उपन्यास : गाँव–शहर की दूरी और स्त्री की आंतरिक पीड़ा का सूक्ष्म आख्यान है।
सुमति सक्सेना लाल जी का उपन्यास “वे लोग” सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा पाठ है, जिसमें गाँव–शहर के द्वंद्व के साथ-साथ पारिवारिक रिश्तों की आंतरिक जटिलताएँ भी गहराई से उभरती हैं। माँ–बेटी के बीच के मानसिक द्वंद्व ही नहीं, भाई–भाभी का तरल मन भी पाठक को उन दिनों की याद दिलाता है, जब रिश्तों के लिए रिश्ते अपने भीतर स्पेस रखते थे।

जिस दौर की पृष्ठभूमि में यह कृति रची गई होगी, उसमें शहर की सुविधाओं और आधुनिकता के साथ जीवन अपना आकार ले रहा था, जबकि गाँव अभी भी बुनियादी आवश्यकताओं से जूझ रहे थे। वहाँ गाय पाल लेना भी गृहस्थी चल जाने की उम्मीद बन जाता रहा था। इस अंतराल ने न केवल सामाजिक संरचना को प्रभावित किया, बल्कि रिश्तों और स्मृतियों के अनुभव को भी नया रूप दिया।

कथावाचक की दृष्टि और स्त्री–संवेदना से भरी यह कृति की लिखत बार–बार दर्शन और मनोविज्ञान के तंतुओं में पाठक का मन उलझा लेती है।

उपन्यास का कथावाचन एक स्त्री के दृष्टिकोण से होता है। स्त्री की यह दृष्टि उपन्यास में घटनाओं का केवल विवरण नहीं देती, बल्कि स्मृतियों, चेहरों और मौन मुद्राओं के भीतर छुपी भावनात्मक परतों को उद्घाटित भी करती है। अब अम्मा की तस्वीर पर ठहरी कथावाचक की नज़र को ही देखें, “गालों के गड्ढे, निगाहों की चमक और थकी-सी हताशा” जीवन–संघर्ष का दर्पण बन जाती है। इसी तरह मामा–मामी का प्रसंग, जहाँ “हम दोनों की तरफ देखने का मतलब है स्नेह का इज़हार” कहा गया है, घरेलू जीवन के सूक्ष्म और मूक स्नेह को पाठकीय अनुभव का हिस्सा बना देता है।

पृष्ठ 52–53 के अंश विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। यहाँ लेखिका कथावाचक की माँ के भीतर के द्वंद्व को उद्घाटित करती हैं — कि जन्म और जननी से भी बड़ी वह जगह होती है जहाँ किसी बच्चे की परवरिश होती है। यह विचार भारतीय पारिवारिक संरचना में मातृत्व की भूमिका को एक गहरे सामाजिक संदर्भ में रखता है। इसी क्रम में अम्मा का कथन “विरले ही होते होंगे जो सड़क की रोशनी में बैठकर पढ़ लेते हैं और कुछ बन जाते हैं, अपना बेटा तो उसमें से नहीं है”  स्त्री–माँ की पीड़ा और कड़वे यथार्थ की गहन इबारत बन जाती है। सच तो यह है कि यह वाक्य केवल एक व्यक्तिगत दुःख नहीं, बल्कि स्त्री जीवन की सामूहिक विवशताओं का साक्षात्कार बनकर उभरता है।

आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो उपन्यास के पात्रों में प्रत्यक्ष बाहरी “एजेंसी” भले कम दिखाई देती है, मगर किरदारों की ऊहापोह और उनके जीवन की बाहरी परिस्थितियों के अधीन दैनिक जीवन यथार्थपरक और जीवंत लगता है। मन के मेले इतने गहन और जीवंत हैं कि पात्रों की आंतरिक दुनिया में कुछ इतना तरल और जटिल देखने को मिलता है। कृति में पात्रों की पात्रता में इतना आत्ममंथन है कि हर दृश्य पाठक को ठहरकर सोचने पर विवश करता है। वे लोग उपन्यास की यही सबसे बड़ी ताक़त है। पात्रों के भीतर की पीड़ा, स्मृतियाँ और मौन स्वयं पाठकीय अनुभव का हिस्सा बन जाते हैं।

“वे लोग” की सबसे बड़ी विशेषता इसकी शैली है। इसमें न ही लेखकीय आडंबर है, न बेतुका पकड़ा और रोपा हुआ विमर्श, और न ही अतिनाटकीयता है, फिर भी किरदारों के बीच का अपनापन, दूरी, हार्दिक ऊष्मा और मानवीय पीड़ा हृदय तक पहुँच जाती है। साधारण घरेलू क्षण भी लेखिका की दृष्टि में मानवीय भावनाओं के आईने में बदल जाते हैं।

भूमिका पढ़ते हुए जाना कि लेखिका का संबंध गाँव से न के बराबर रहा है, फिर भी उन्होंने गाँव के जीवन को साधने की ही नहीं, जीने की कोशिश की है। कच्चा घर–आँगन हो या खेत–खलिहान, बागवानी हो या ज़मीन के लिए आपसी बतकही, सब कुछ उन्होंने रुचिकर ढंग से प्रस्तुत किया है।

लेखिका के धैर्य और विस्तृत दृष्टि की सराहना करनी होगी, आपने अपने लेखकीय मंतव्य और चेष्टाओं से उन सूक्ष्म क्षणों को पकड़ने का प्रयास किया, जिन्हें जिया किसी और ने, किंतु परकाया प्रवेश से उन्होंने रचा। दर्शनशास्त्र की प्राध्यापक रहीं सुमति जी की कल्पनाशीलता अद्भुत लगती है। 

कुल मिलाकर सुमति जी ने गॉंव से और स्त्रियों की ज़िंदगी से जुड़े अनेकों सवाल, स्त्री विमर्श के हंगामें से बचते हुए उठाए हैं। स्त्री और पुरुष दोनों के दुखों के प्रति वे समान रूप से संवेदनशील हुई हैं। यह उपन्यास मूलरूप से अम्मा और बिट्टो को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। यानी पाठक स्त्री के सुख दुःख को कृति के आरपार देखते हैं। ये भी नहीं कि लेखिका सर्फ स्त्री के प्रति ही तरल हुई, उनकी सहानुभूति बप्पा जैसे चरित्र के साथ भी दिखती है। उन्होंने कथा वाचिका के मामा और पापा (ससुर जी) के चरित्र चित्रण में भरपूर प्यार उड़ेला है। 

अतएव कहा जा सकता है कि सुमति जी की ये कृति जिंदगी की अनगढ़ पगडंडियों पर चलते रिश्तों की तरल कहानी ही। इस पारिवारिक रिश्तों की संवेदनशील और संतुलित दास्तान में न नारी विमर्श का कोई अतिरिक्त मान यानी जानबूझकर लाउड विमर्श घुसाया गया है, और न ही पितृसत्ता की क्रूरता को ज़ोरशोर से रेखांकित किया है।

जिस तरह संसार स्त्री पुरुष दोनों को मिलाकर जीवन रचता है। उन्होंने गांव के अंजान परिवेश में प्रवेश कर उसे जानने की जिजीविषा रखी और अपनी लेखकीय परिधि को विस्तृत किया। यही सब बातें इस उपन्यास को विशिष्ट बनाती हैं।

यह कृति केवल कथा नहीं, बल्कि स्मृति, रिश्तों और स्त्री–संवेदना का गहन दस्तावेज़ है।

कल्पना मनोरमा

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