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शनिवार, 24 मई 2014

शायद फिर कोई बस्ती है बसने वाली यहाँ!

शाखों से जुदा पत्ते 
तनों से जुदा शाखें 
क्षत-विक्षत बिखरी चहुंओर 
ये तरुवर की लाशें 

टूटे घोसलों के बिखरे तिनके 
तिनको में बिखरा आशियाँ 
हाय ये बेघर परिंदे 
अब जाये कहाँ?

है कौन यहाँ आया 
किसने की ये तबाही 
करते करुण क्रंदन 
बर्बादी के ये मंजर दे रहे गवाही 

 लाशों के इन टुकड़ों से 
लिखने विकास की एक नयी दास्ताँ 
टूटे बिखरे आशियानो के तिनको पर 
शायद  फिर कोई इंसानी बस्ती है बसने वाली यहाँ!

शिल्पाभारतीय "अभिव्यक्ति"

3 टिप्‍पणियां:

kuldeep thakur ने कहा…

नयी पुरानी हलचल का प्रयास है कि इस सुंदर रचना को अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
जिससे रचना का संदेश सभी तक पहुंचे... इसी लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 26/05/2014 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...

[चर्चाकार का नैतिक करतव्य है कि किसी की रचना लिंक करने से पूर्व वह उस रचना के रचनाकार को इस की सूचना अवश्य दे...]
सादर...
चर्चाकार कुलदीप ठाकुर
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Anita ने कहा…

मार्मिक रचना

sushmaa kumarri ने कहा…

कोमल भावो की और मर्मस्पर्शी.. अभिवयक्ति