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शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

मानव की जय -जयकार !

rising sun
होगी  सुबह ,
दिनकर उदित होगा पुनः ,
निज रथ  पे हो सवार !
...................
हर लेगा तम ,
होगा सुगम ,
जीवन का सब व्यापार !
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छोडो न  आशा  ,
हो व्यथित ,
किंचित करो विचार !
..........................
मानव  हो तुम ,
निज बुद्धि -बल की,
तेज करो धार  !
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गिर कर उठो ,
उठकर  बढ़ो  ,
हो तीव्र नित रफ़्तार !
.......................................................
होकर हताश ,
यूँ निराश ,
मान लो मत हार !
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तेरी धरा ,
तेरा गगन ,
सृष्टि का कर श्रृंगार !
................
दानवी बाधा   कुचल ,
ब्रह्माण्ड में हो अब सकल ,
मानव की जय -जयकार  !


शिखा कौशिक 'नूतन '






बुधवार, 5 नवंबर 2014

''नारी को मत यूँ करो नग्न !''



मत बहको इतना  कवि-कलम,
मर्यादित हो करना वर्णन ,
श्रृंगार -भाव की आड़ में तुम ,
नारी को मत यूँ करो नग्न !
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कामदेव के दास नहीं ,
तुम मात शारदा-तनय हो ,
न हो प्रधानता रज-तम की ,
अब सत्व-गुणों की प्रलय हो !
अनुशासित होकर करो सृजन !
नारी को मत यूँ करो नग्न !
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नारी-तन के भीतर जो उर ,
उसमें भावों का अर्णव है  ,
कुच-केश-कटि-नयनों से बढ़ ,
उन भावों में आकर्षण है ,
नारी का मन है सुन्दरतम !
नारी को मत यूँ करो नग्न !
................................
श्रंगारिक रचना एक मात्र ,
कवियों का कर्म न रह जाये ,
नख-शिख वर्णन में डूब कहीं ,
न नारी -गरिमा मिट जाये ,
मत करना ऐसा कभी यत्न !
नारी को मत यूँ करो नग्न !

शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 1 नवंबर 2014

कविता मात्र श्रृंगार नहीं !


कोमल पुष्पों का हार नहीं ,
रसिक-नृप-दरबार नहीं ,
ये नूपुरों की झंकार नहीं ,
कविता मात्र श्रृंगार नहीं !
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कविता नहीं सीमित नख -शिख तक ,
नारी की चंचल -चितवन तक ,
षड-ऋतुओं के वर्णन तक ,
कामोद्दीपक भावों तक ,
प्रेमी-युगलों को हर्षाती ;
केवल मदमस्त फुहार नहीं !
कविता मात्र श्रृंगार नहीं !
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कविता-शिव का पर्याय है ,
शिव में ब्रह्माण्ड समाये है ,
वही सत्य है वही सुन्दर है ,
आनंद का यही उपाय  है ,
मानवता  के आदर्शों का
स्थायी  दृढ़  आधार  यही  !
कविता मात्र श्रृंगार नहीं !
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वीरों में भर देती साहस  ,
मातृ -भूमि हित मिट जाओ ,
मत करो पलायन डर कर तुम ,
भले रणभूमि  में कट  जाओ ,
वीरों के कर में है सजती ,
शत्रु-मर्दन तलवार यही !
कविता मात्र श्रृंगार नहीं !
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करुणा से ह्रदय द्रवित करती ,
प्रफुल्लित उर को कर देती ,
कविता में हास-रुदन दोनों ,
जीवन में रंग यही भरती ,
कविता नहीं होती मधुशाला ,
पावन गंगा -सम धार यही !
कविता मात्र श्रृंगार नहीं !

शिखा  कौशिक  'नूतन '