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गुरुवार, 30 जनवरी 2014

''सियासत की गोली गांधी के जा लगी !


[Remembering the Mahatma on his death anniversary]
फूल को तलवार बना देती सियासत !
मासूम को मक्कार बना देती सियासत !
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साकेत में धर रूप मंथरा का ये ,
अभिषेक को वनवास बना देती सियासत !
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शकुनि ने फेंके पांसे धर्मराज फंस गए ,
घर-घर को कुरूक्षेत्र बना देती सियासत !
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क़त्ल कर रहे मज़हब के नाम पर ,
इंसान को शैतान बना देती सियासत !
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'नूतन' इसी की गोली गांधी के जा लगी ,
क्यूँ गोडसे को कातिल बना देती सियासत ?
शिखा कौशिक 'नूतन'

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

क्षण है बंधु वीरोचित ये संघर्ष प्रलय का !


प्रश्न इस समय नहीं पराजय -जय का ,
नहीं हास व् नहीं शोक का न ही मृत्यु -भय का ,
सतत चुनौती को स्वीकारे ऐसे वज्र ह्रदय का ,
क्षण है बंधु वीरोचित ये संघर्ष प्रलय का !
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शत्रु-दल की नींव हिला दे हम वीरों का गर्जन ,
बाहु-बुद्धि-बल से करना शत्रु का है मर्दन ,
निज उर में उत्साह की लहरें करती क्षण-क्षण नर्तन ,
नहीं हटेगा एक पग पीछे कट जानें दो गर्दन !
प्राण-आहूति देते जाना लक्ष्य आज सभी का !
क्षण है बंधु वीरोचित ये संघर्ष प्रलय का !
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नहीं झुकेगा शीश हमारा कट कर भले गिरेगा ,
वीर कभी घुटने न टेके लड़ते हुए मरेगा ,
वक्षस्थल पर आगे बढ़कर शत्रु-वार सहेगा ,
रक्त बहाकर रण-भूमि की सूनी माँग भरेगा !
नव -घावों से और उबलता अर्णव इनके बल का !
क्षण है बंधु वीरोचित ये संघर्ष प्रलय का !
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प्रबल मनोबल इनका मानों जल है आग-पवन है ,
नहीं काटने से कट पाता शक्तिमान सबल है ,
क्या होगा परिणाम नहीं चिंतित वीरों का मन है ,
करना रण-कौशल का उनको क्षण क्षण प्रदर्शन है !
जय-पराजय नहीं सदा संघर्ष मूल जीवन का !
क्षण है बंधु वीरोचित ये संघर्ष प्रलय का !
शिखा कौशिक 'नूतन'

दिन-रात हो रही है कातिल की हिफाज़त !


शबनम से जलन होती शोलों की हिमायत ,
फूलों से चुभन होती काँटों की हिमायत !
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अपनों पे भरोसा नहीं गैरों से शिकायत ,
ऐसे नहीं चल पायेगी दुकान-ए-सियासत !
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तोहमत उन्ही के सिर पर जो क़त्ल हो गए ,
दिन-रात हो रही है कातिल की हिफाज़त !
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वे हाथ जोड़ मांगते वोट-नोट सब ,
हैरान खुदा देखकर गुंडों की शराफत !
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इंसानियत की बस्ती को आग लगाकर ,
'नूतन' करे दरिंदा मसीहा की खिलाफत !
शिखा कौशिक 'नूतन'

बुधवार, 15 जनवरी 2014

''....बेटी ही बचाएगी .....''


युग बदला है ...तुम भी बदलो !
बेटी को भी जीने का हक़ दो !
दो-दो कुलों का ये मान बढ़ाएगी !
बेटी ही बचाएगी ..बेटी ही बचाएगी ..!
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नन्हीं -नन्हीं कलियों को यूँ न कुचलो कोख में !
जन्म इनको लेने दो खेलने दो गोद में !
ये ही तो खिलकर जगत महकाएंगी !
बेटी ही बचाएगी ..बेटी ही बचाएगी ..!
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इनको पढ़ाओ ...आगे बढ़ाओ !
इन पर भी अपना प्यार लुटाओ !
बदले में सौ गुना तुम को लौटायेगी !
बेटी ही बचाएगी ..बेटी ही बचाएगी ..!
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बेटे व् बेटी में भेद न करना !
बेटी करेगी सच हर सपना !
मौका दो खुशियों का परचम फहराएगी !
बेटी ही बचाएगी ..बेटी ही बचाएगी ..!
शिखा कौशिक 'नूतन'

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

मंथन

           सीता के मन मे आज अपने तीस साल के वैवाहिक जीवन के बारे मे मंथन चल रहा है|                                                                                                                                                          ''एक बड़े ऑफिसर की पत्नी हो तुम, अभी तक सलीके से रहना नहीं आया तुम्हे! गाँव को छोड़े बरसो हो गये है|,सीता को उसके पति रामलाल जी ने डाँटते हुए कहा| रामलाल जी को गाँव से शहर आये हुए तीस साल हो गये थे;पर सीता के रहन-सहन के अंदाज मे कोई बद्लाव नहीं आया,और वो चाहती भी नहीं थी| उसका मानना था ,इंसान चाहे दुनिया के किसी भी हिस्से मे जाकर रहे अपने शहर की भाषा,रहन-सहन कभी नहीं भूलना चाहिए| यही कारण था,सीता को अब तक शहर की हवा छु तक नहीं गयी थी|
                                   रामलाल जी और सीता मे अक्सर इस बात को लेकर झगड़ा होता रहता था| पति का स्वभाव बहुत गुसैल था,इसलिए घर मे इतने नौकर होते हए भी सीता उनका हर काम अपने हाथ से करती थी| सुबह से शाम तक सीता घर के काम मे नौकरों की मदद करती रहती थी| उसका सोचना था,घर की ग्रहणी जितना घर को सहेजती है,उतना नौकर नहीं कर सकता|
                                     रामलाल जी सरकारी खजाने मे ए.टी.ओ. की पोस्ट पर थे| पत्नी से कभी प्यार से बात नहीं करते थे;पर ऑफिस मे उनके सद्व्यवहार के और इमानदारी के चर्चे थे| जब तक पति ऑफिस नहीं चले जाते,सीता चैन की सांस नहीं ले पाती थी;पता नहीं कब किस बात पर उनका गुस्सा भडक जाये घर मे अशांति हो जाये| उम्र के इस पड़ाव तक उसने कभी चैन की सांस नहीं ली| फिर भी पति खुश नहीं|
                                     तभी नौकर ने आकर बताया ''मेम साहब,साहब आ गये|, सीता जल्दी से पोर्च की और गयी; देखा पति तमतमाए हुए दरवाजे की और ही आ रहे थे| वो डर के मारे वापस मुड गयी| रसोई घर मे चाय का पानी गैस पर चढाया,नाश्ते की तैयारी मे लग गयी|
                   चाय-नाश्ता लेकर वो बैठक मे गयी| वो तो हैरान रह गयी! पति बहुत गुस्से मे थे| साथ मे एक ऑफिस का कर्मचारी भी बैठा था| जैसे ही सीता बैठक मे पहुंची,उन दोनों मे हो रही बात -चित बंद हो गयी| सीता को कुछ समझ नहीं आ रहा था;हाँ,इतना जरुर वो जानती थी आजकल ये बहुत तनाव मे रहते है पता नहीं क्या हुआ है!
                          नाश्ता टेबुल पर रख कर वो अपने कमरे मे आ गयी| सोचने लगी कुछ तो हुआ है|ये तो मुझे कभी बतायेंगे नहीं| किसी अनिष्ट की आशंका से घबरा कर उसने मन ही मन कुछ तय किया| और वो गाँव की औरत सीता पहली बार अपने पति की आज्ञा के बिना घर से बाहर निकली|
                         रामलाल जी के दोस्त शर्मा जी उन्ही की ऑफिस मे कैशियर थे ;उनके घर जाकर अपने पति के बारे पता लगाया | वो ये सब जान कर हैरान रह गयी! ''भाभी जी हमने आपको बताया नहीं, आपको फ़िक्र हो जाती,रामलाल जी को किसी ने रिश्वत के झूठे केस मे फंसाया है| सब जानते है,वो कितना ईमानदार है,कभी किसी से एक पैसा नहीं लिया तो अब क्या लेगा,अब तो एक साल बाद रिटायर होने वाले है|,शर्मा जी ने कहा |
                                सीता घर आ गयी| शाम को उसने पति से कहा ''आपने अभी तक मुझे अपनी धर्मपत्नी बनने का सौभाग्य नहीं दिया,तभी आप अकेले इतने दिनों से परेशान हो रहे हो,मुझे कुछ नहीं बताया |,
                                 रामलाल जी ने पहली बार पत्नी के प्यार को महसूस करते हुए कहा ''कैसे बताता तुम्हे! कभी प्यार से तेरा नाम तक नहीं लिया| मै भीतर से कमजोर हूँ तेरे प्रति अपना वयवहार सब समझता था;पर बाहर से कठोर हूँ तो कभी तुम्हे अपने प्यार को महसूस ही नहीं होने दिया| पर तुमने फिर भी अपना पत्नी धर्म निभाया,मुझे माफ़ कर देना|पर तुम्हे पता कैसे लगा?
                                  '' मैने आपके दोस्त शर्मा जी से पता लगाया था, आप बिलकुल भी फ़िक्र ना करे,आप पर सबको पूरा भरोसा है| जल्दी ही आप दोष मुक्त हो जाओगे| ,पत्नी से ये सब सुनकर रामलाल जी ने राहत की साँस ली| पत्नी का अपने जीवन मे कितना महत्व है वो आज जान पाए थे|
       शांति पुरोहित
                         
                               

बुधवार, 8 जनवरी 2014

फर्ज

flower childट्रिन-ट्रिन अचानक फोन की घंटी घनघना उठी,पीहू ने फोन उठाया सामने से बेटे रंजन की आवाज आई ''ममा, मै ,कल आ रहा हूँ;मेरा दीक्षांत समारोह सम्पन हो गया,अब मै आपके साथ कुछ दिन तो आराम से मस्ती करूंगा|' उसने सब एक साँस मे बोल कर फोन कट कर दिया;पीहूकुछ बोलने का मौका ही नहीं दिया|
                  पीहू और वरुण का बेटा रंजन जो सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज मे ऍम.बी .बी .एस .कर रहा था | पीहू आज रंजन के आने की खबर सुनकर बहुत खुश हो रही थी| इतने सालो बाद उसका राज दुलारा घर लौट रहा था| अभी से उसकी पसंद का खाना बनाने के बारे मे सोचने लगी;रंजन को मुंग की दाल का हलुवा मेरे हाथ का बना बहुत पसंद है| ''अरे ! मै अभी से उसकी पसंद के खाने के बारे मे सोचने लगी;पहले वरुण को तो बताऊ,'वरुण को फोन किया ''हेल्लो ,वरुण कल शाम को रंजन आ रहा है, वरुण तो ये खबर सुनकर उछल पड़ा,बोला ''अरे ! ये बहुत अच्छी खबर है;मै अपना काम जल्दी से खत्म करके अभी घर आ रहा हूँ|
                            पिहू ने रामू को बुलाया '' मेरे लिए चाय लाओ,
                                                               ''जी मेम साहब ,अभी लाया ,
                                      थोड़ी देर मे रामू चाय लेकर आया ,''मेम साहब चाय ,
                      पीहू चाय पीकर पलंग पर तकिये के सहारे लेट कर कुछ देर आराम करने के लिए बैठ गयी| आज फिर पिहू को रंजन के जन्म के समय की सभी यादे चल-चित्र की तरह एक-एक कर याद् आने लगी|
                          ''आप माँ बनने वाली है,पीहू ,डॉ ने जब कहा उस वक्त ह्मारी ख़ुशी का कोई पारावार नहीं था| डॉ.ने मुझे चेकअप के बाद कुछ दवाई और सलाह दी.हम घर आ गये| वरुण शादी के तुरंत बाद ही बच्चा नहीं चाहते थे |मेरी ''राजस्थान जुडिसियल सर्विस'' परीक्षा की तैयारी चल रही थी| वरुण चाहते थे की मै,अपनी पढाई पूरी करु;मैं मन लगाकर अपनी पढाई कर रही थी|
                   बस कुछ ही समय बचा था,परीक्षा होने मे,अचानक अख़बार दवारा सुचना आई,किसी कारण  से अब ये परीक्षा की डेट रद्द की जाती है| वरुण ने फिर परिवार पूरा करने का फैसला लिया;शादी को तीन साल हो गये थे,ससुराल वाले तो शादी होने के कुछ वक्त बाद ही अपने पोते-पोती के लिए आस लगा कर बैठ गये थे....पर वरुण इस बारे मे किसी की भी नहीं सुनता था|
                    वरुण मारुती कार उद्योग मे सी.ई.ओ.था|उसे अक्सर मिटिंग के किये शहर से बाहर जाना पड़ता था;कई बार विदेशी दौरे पर भी जाना पड़ता था| वरुण ने घर के तमाम काम करने के लिए एक बाई रख ली थी;डॉ. ने मुझे बेडरेस्ट करने के लिए बोला था|
                 कुछ समय बाद वरुण ने अपने डायरेक्टर से कह कर अपने टूर कैंसिल करवाकर ऑफिस मे ही ड्यूटी करने की इजाजत ले ली थी| मुझे हर पन्द्रह दिन बाद अस्पताल चेकअप के लिए जाना पड़ता था| समय अपनी गति से चल रहा था |
               उस वक्त वरुण घर मे ही थे,'''वरुण.मै जोर से चिल्लाई,मुझे अचानक दर्द होने लगा|' अभी कुछ दिन पहले ही डॉ. के पास जाकर आये है| मुझे 'लेबर पैन' होने शुरू हो गये थे;अभी तो सातवा महिना ही चल रहा था की ये पैन ! हम दोनों ही घबरा गये डॉ.के पास जाते ही मेरा ट्रीटमेंट चालू हुआ,डॉ. ने वरुण को बताया''बच्चा अभी निकालना पड़ेगा,नहीं तो पीहू को नुकसान हो सकता है|, वरुण के पास हाँ बोलने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था|
                         वरुण ने अपने परिवार वालो को इस बारे मे फोन से सुचना कर आने का बोल दिया| डॉ. ने ओपरेट करके बच्चे को निकाल दिया| डॉ. ने वरुण से कहा ''बहुत महंगा इलाज है,बहुत पैसे लगेंगे,|'वरुण के कहा'डॉ.अपने बच्चे को बचाने के लिए मै कुछ भी करूँगा,आप इलाज शुरू कीजिये,पैसे की परवाह मुझे नहीं है|'और उसने ऐसा किया भी|
                  प्री-मेस्चौर बच्चा था, तो उसे करीब दो माह अस्पताल के आई,सी.यु . कक्ष मे डॉ.की देख-रेख मे रखना पड़ा | इसी दौरान डॉ ,के सामने रोज एक नई समस्या आ खड़ी होती थी| पर ना तो वो कभी हिम्मत हारे ,और ना हमे कभी हमे निराश होने दिया| भगवान का भरोसा पूरा था| अपने बच्चे से इतने समय तक अलग रहना मेरे लिए बहुत मुश्किल था|  साथ ही हर दिन एक नई आशंका से घिरा आता था ,किसी अनिष्ट की आशंका से घिरे वो एक-एक दिन निकालना बहुत ही मुश्किल था | वो घर आया तो भी उसे पालना मेरे अकेली के बस का नहीं था;पुरे परिवार ने मेरा साथ दिया| वो समय निकालना मेरे लिए बहुत मुश्किल था| और उन्ही दिनों हम दोनों ने सोच लिया था कि हम हमारे बेटे रंजन ,को डॉ. बनायेगे, चाइल्ड स्पेस्लिस्ट बनायेगे | उस वक्त डॉ.हमारे लिए भगवान से कम नहीं थे| डॉ.के ही अथक प्रयास से हमारे बच्चे को बचाया जा सका था|  रंजन ने जब स्कूल की पढाई पूरी की तभी हमने उसे अपनी इच्छा के बारे मे बताया, ''रंजन मैंने और वरुण ने तुम्हे डॉ.बनाने के बारे मे सोचा है,क्या तुम हमारी ये इच्छा पूरी करोगे ?,मैंने रंजन से कहा | रंजन ने हमारा मान रखते हए, हमारी इच्छा को अपना कर्तव्य समझते हुए पूरी करने के लिए हाँ कहा और जी-जान से मेहनत  करने लगा|और आज उसने डॉ .बनकर हमारी वो इच्छा पूरी की| सोचते-सोचते कब शाम हो गयी पता ही नहीं चलता, वरुण आ गये थे | वरुण के आते ही घर मे रौनक आ जाती थी| वो आते ही खुद मेरे लिए चाय बनाते थे|
                        ''चलो जल्दी से तैयार हो जाओ,शौपिंग के लिए,रंजन के पसंद की बहुत सी चीजे लानी है|,वरुण ने कहा| हम दोनों ने रामू के साथ मिलकर अपने घर को सजाया, आज हमारा राजदुलारा डॉ,बनकर जो आ रहा था | रंजन समाज सेवा कर के अपना फर्ज अदा करना चाहता था |
      शांति पुरोहित |
       
                     

रविवार, 5 जनवरी 2014

आँगन में तब आई धूप !

Sun : Enjoyment  Free Happy Woman Enjoying Nature  Girl Outdoor
ठिठुर-ठिठुर काली भई तुलसी
हरा रूप जब भया कुरूप
आँगन में तब आई धूप !
....................................
कातिल शीत हवाएं आकर
चूस गयी तन का पीयूष
आँगन में तब आई धूप !
.....................................
गर्म शॉल लगें सूती चादर
कैसे काटें माघ व् पूस
आँगन में तब आई धूप !
...................................
सब जन कांपें हाड़ हाड़
हो निर्धन या कोई भूप
आँगन में तब आई धूप !
......................................
हिम सम लगे सारा जल ,
क्या जोहड़ नहर व् कूप ,
आँगन में तब आई धूप !
........................................
चहुँ ओर कोहरे की चादर ,
बना पहेली एक अबूझ ,
आँगन में तब आई धूप !
.....................................................
हुआ निठल्ला तन व् मन ,
गई अंगुलियां सारी सूज ,
आँगन में तब आई धूप !
.................................
पाले ने हमला जब बोला ,
बगिया सारी गई सूख ,
आँगन में तब आई धूप !
शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 4 जनवरी 2014

सुकून

कितने साल इन्तजार किया था,ये दिन देखने के लिए ,तब जाके मालती की शादी तय हुई| दुनिया मे कितने सारे लोग होंगे जिनको इस बारे मे पता ही नहीं होगा, आज अचानक पता नहीं क्यों मेरे मन मे मालती का ख्याल आ गया | मालती हमारे पडौस मे रहने वाले रमाशंकर जी की बेटी थी|
             ''मावली, ''गुलाबपूरा, मे रहती थी मालती| गाँव मे हर परिवार मे पांच से छ बच्चे थे,पर मालती अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी |  उसके माँ-पिताजी को बहुत दुःख था बेटा नहीं होने का,पर उपरवाले की मर्जी को अपनी किस्मत मान लिया और बेटी को ही सब कुछ मान कर चैन से जीने लगे|
              बड़े प्यार से फूल की तरह बेटी को रखते थे|बेटी के पैदा होते ही बाप की कमाई दोगुनी हो गयी थी| तो उसके पापा, रमाशंकर प्यार से उसे लक्ष्मी बुलाने लगे| इतने छोटे गाँव की लड़की के लिए कोई अच्छा रिश्ता नहीं आ रहा था | मालती के पापा,मालती को पुराने रीती- रिवाज मानने वालो के घर नहीं ब्याहना चाहते थे,क्युकी उन्होंने अपनी बेटी को दसवी तक शिक्षा दिलाई थी| साथ ही मालती सुन्दर भी बहुत थी,जैसे -उपरवाले ने उसे बहुत फुर्सत मे बनाया हो| जो भी देखता उसे,बस देखता ही रह जाता
                    गाँव से उसको शहर भेजने की लिए परिवार और गाँव के ना जाने कितने लोगो को समझाना पड़ा, तब कहीं जाकर वो मालती को शहर भेजकर दसवी तक पढ़ा सके थे |
                     पास के शहर ''उदयपुर''के एक एक पढ़े-लिखे लड़के के साथ अब रिश्ता तय हुआ है| क्युकी लड़के के माता-पिता की ये इच्छा थी कि, लड़की सुन्दर और संस्कारी होनी चाहिए,तो ये लड़की मालती उनको भा गयी| लड़के की सोच थी कि दोनों पढ़े -लिखे होंगे तो अहम टकराएगा,घर मे रोज की कलह होगी सुन्दर तो वो थी, ,इसलिए उसे भी कोई एतराज नहीं था इस रिश्ते से|
                      लड़के वाले स्वतंत्र विचारो के थे,दकियानूस बिलकुल भी नहीं थे| मालती के पापा -मम्मी बहुत खुश थे| बहुत अच्छी शादी की,सब जमा-पूंजी लगा दी| रमाँशंकर जी ने मालती और उसके ससुराल वालो को बहुत कुछ दिया;लडके के परिवार वालो को इतनी उम्मीद नहीं थी| वो लोग तो अपनी पसंद की बहु पा लेने भर से ही बहुत खुश थे ;उस पर इतना सत्कार भी ....
                         बारात वापस रवाना होने का समय आ गया,तो रमाशंकर जी ने समधी जी से विनय पूर्वक निवेदन किया ,''हम चाहते है ,आप अभी नहीं सुबह चले जाओ|, पर लडके के पिताजी ने कहा ''आपने बहुत सत्कार किया,कोई कसर नहीं छोड़ी ;अब हम अपने घर जाकर अपनी बहु का सत्कार करना चाहते है,इसलिए हमे अभी जाना होगा |, और वो चले गये | सुना है ,होनी को कौन टाल सकता है, अभी बारात को रवाना हुए एक घंटा ही हुआ था कि अचानक रमाशंकर जी के पास किसी बाराती का फोन आया ''बस दुर्घटना ग्रस्त हो गयी,और दुल्हे पक्ष के पांच रिश्तेदार दुर्घटना स्थल पर ही मारे गये|,
                            रमाशंकर जी के होश उड गये,ये दुखद समाचार सुनकर| पत्नी को अलग बुलाकर कहा '' बारात की बस दुर्घटना ग्रस्त हो गयी है,मुझे अभी जाना होगा|,पत्नी ने कहा ''आप अकेले नहीं जा सकते मै भी चलूंगी|,मालती की माँ के दिमाग मे पुरे राश्ते यही चल रहा था कि अब मेरी मालती का क्या होगा?मालती को अब घर मे सब घ्रणा की नजर से देखेंगे| घटना स्थल पर पहुँच कर देखा,हाहाकार मचा हुआ था| सब लोगो के चेहरे उदासी मे घिरे हुए थे ;पोस्ट-मार्टम के लिए लडके के पिताजी वहीं रुक गये और बाकी सब लोगो को दूसरी बस से घर के लिए रवाना किया|
                          घर मे भी ये दुखद समाचार पहुँच गया था,वहां भी मातम छाया हुआ था| घर मे इक्कठा लोगो ने दबी जुबान मे नई बहु को अभागी,भाग्यहीन कहना शुरू कर दिया था| ''बहु के पैर घर मैं पड़ते ही घर की ख़ुशी मातम और रोने धोने मे तब्दील हो गयी ;आगे जाकर पता नहीं क्या होगा इस घर का ? ''मालती की सास नैना देवी ने जब अपने कानो ऐ लोगो को ये कहते हुए सुना, तो वो अपना सब दुःख भुलाकर जोर से बोली ''कोई इस दुःख की घड़ी मे हमारे साथ रहना चाहे, तो ठीक ,पर कोई भी हमारी नई बहु के बारे मे कुछ भी उल्टा सुलटा नहीं बोलेगा;इसमें उस मासूम का कोई कसूर नहीं| किसी के भी करने से कभी किसी का कोई अनिष्ट नहीं होता है|ये तो सब किस्मत का लिखा होता है |''
                       जैसे ही बारात वापस दुल्हे के दादा कृपा शंकर जी ने अपनी रोबीली आवाज मे अपनी बड़ी बहु से कहा ''नैना बहु,नई बहु का विधिवत स्वागत करो'बाद मे रोना धोना होगा|'' दुर्घटना मे कृपाशंकर जी ने अपना छोटा पोता,और चार अन्य रिश्तेदार खोये थे | बहु रोने लगी थी ;कहीं न कहीं वो अपने को इन सबका जिम्मेदार मानने लगी थी |दादाजी और कोई भी घर का व्यक्ति बहु को इसका कारण बिलकुल ही नहीं मान रहे थे| नैना देवी ने अपनी बहु का  स्वागत किया' बहु -बेटे की आरती उतारी;तब बहु का गृह-प्रवेश कराया| तो लोगो को बड़ा आश्चर्य हुआ! बहु के माता-पिता भी ये सब देख रहे थे| रामशंकर जी ने अपनी पत्नी से कहा ''हमने वाकई अच्छे विचारो वाले घर मे अपनी बेटी का ब्याह किया है इस घर मे हमारी बेटी हमेशा खुश रहेगी और वो सुकून से अपने घर चले गये |
     शांति पुरोहित
               
           
                     
               

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

हर्षोल्लास ह्रदय में भरकर लें संकल्प अटल !

2014 Projection Target Shows Profit And Growth Stock Photo
मलिन वदन ले विदा हो रहा वर्ष एक पल-पल ,
उदित हो रहा मधुर हास मुख लेकर वर्ष-नवल ,
नवप्रभात में त्याग निराशा का जर्जर -आँचल ,
हर्षोल्लास ह्रदय में भरकर लें संकल्प अटल !
…………………………………………………….
ना टेकेंगे घुटने अपने अन्यायी के आगे ,
वज्र-ह्रदय कर टकरायेंगे जब तक वो ना भागे ,
कट जाने का ;मिट जाने का भय न मन में व्यापे ,
भाई-भतीजावाद के बंधन आओ मिलकर काटें ,
सत्य-न्याय के पथ पर तत्क्षण जन-जन चले सकल !
हर्षोल्लास ह्रदय में भरकर लें संकल्प अटल !
………………………………………………………….
नहीं निवाला मुंह में रखें देख किसी को भूखा ,
सरस बनें ,करुणामय हों ,व्यवहार करें न रूखा ,
देख विपत्ति में किसी जन को अपना हाथ बढ़ाएं ,
मानव हैं तो मानवता का अपना धर्म निभाएं ,
देख परायी आखें-नम हो अपने नयन सजल !
हर्षोल्लास ह्रदय में भरकर लें संकल्प अटल !
………………………………………………….
नारी के गौरव की रक्षा घर-बाहर चहुँ ओर ,
ना हर पाये पापी रावण एक भी सीता और ,
नहीं कोख में नन्हीं कलियाँ और कुचलने देंगें ,
फूलों सी बेटी पर हम तेजाब न डालने देंगें ,
अबला से बनवाना है नारी को अति-सबल !
हर्षोल्लास ह्रदय में भरकर लें संकल्प अटल !
…………………………………………………………………….
टूट न जाएँ सम्बल अपना चलना संभल-संभल ,
आत्म-निरक्षण करते जाना रखना है संयम ,
नहीं फिसलना ,ना ललचाना ,ना होना विह्वल ,
ना घबराना ,ना इतराना ,ना होना चंचल ,
इच्छा-शक्ति दृढ़ रखना व् हो उत्साह प्रबल !
हर्षोल्लास ह्रदय में भरकर लें संकल्प अटल !
शिखा कौशिक ‘नूतन ‘