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शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

क्या वारिस कभी बन पाएंगी मासूम बेटियां ?

मासूम बेटियां

कब तक कत्ल की जाएँगी मासूम बेटियां ?
कब हक़ से जन्म पाएंगी मासूम बेटियां ?
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इनको चटककर खिलने का हक़ कैसे मिलेगा ?
कब तक मसल दी जाएँगी मासूम बेटियां ?
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कब गूंजेंगी किलकारियां बेख़ौफ़ हो इनकी ?
क्या वारिस कभी बन पाएंगी मासूम बेटियां ?
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माता के रूप में तो गायी जाती है महिमा ,
पूजी मगर कब जाएँगी मासूम बेटियां ?
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ये चाँद की हैं चांदनी 'नूतन' सीप का मोती ,
सौगात कब कहलाएंगी मासूम बेटियां ?

शिखा कौशिक 'नूतन'

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

अपने शहर में हम मगर गुमनाम रह गए !


शहर शहर मशहूर हुए ;नहीं गुमनाम रह गए ,
अपने शहर में हम मगर गुमनाम रह गए !
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गैरों ने दी इज्जत बहुत सिर पर बिठा लिया ,
अपनों की नज़र में मगर बदनाम रह गए !
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हमने बचाया ऐब से अपना सदा दामन ,
हमको मगर ज़ालिम कई बेईमान कह गए !
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हादसे सब झेलकर दिल बन गया फौलाद ,
आँखों के रास्ते मगर अरमान बह गए !
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हम दर्द अपना कह न पाये अपनी जुबां से ,
'नूतन' यूँ ही चुप रह के सब इल्ज़ाम सह गए !

शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 9 नवंबर 2013

माँ के लिए ..........

                                                                                                                                                                                                 
Cover Photo
                                                                                                                                                                                                                                       शोर्य को स्कूल और पति संजय के ऑफिस जाने के बाद संगीता, लोन मे बैठ कर चाय के साथ अख़बार पढ़ती थी,ये उसकी रोज की आदत थी | अन्दर का पेज जैसे ही खोला एक समाचार पर नजर पड़ी ,पूरी खबर पढने लगी जो इस प्रकार थी| सेठ दीनानाथ की दूकान का वफादार मुनीम, बीस हजार रुपया ले कर फरार हो गया |
            ये कैसे हो सकता है?, इतना ईमानदार था ,मुनीम रामसिंह ,फिर उसने ऐसा क्यों किया ?, संगीता हैरान रह गयी ये खबर पढकर ! दीनानाथ जी संगीता के पडौसी होने के नाते उनका एक दुसरे के घर आना -जाना होता रहता था | फिर उनकी पत्नी संगीता की सहेली भी थी |
            उस दिन दीनानाथ जी के घर उनके पौत्र चिन्मय की जन्म दिन की पार्टी का अवसर था | रिश्तेदारों के आलावा, शहर की जानी -मानी हस्तिया पार्टी मे शिरकत करने वाली थी | सेठ दिनानाथ जी शहर के रसूखदर आदमी थे | उनका तैयार वस्त्रो का बहुत बड़ा शो रूम था | परिवार मे दो बेटे और एक प्यारी सी बेटी दिव्या थी |
                  बेटी ने M.B.B.S.किया और अपने साथ ही पढने वाले डॉ. विक्रम से उसकी शादी कर दी | और वो अपने ससुराल चली गयी | छोटा बेटा कमलेश पढने के लिए विदेश गया, वहीं पर काम करने लगा, वहीँ की गौरी लड़की के साथ ब्याह कर लिया | दीनानाथ जी और उनकी पत्नी ने बेटे की जिद के आगे समझोता कर लिया | बड़ा बेटा विमलेश, ही परिवार सहित इनके पास रहता था | यहाँ का सारा काम -धंधा ,ये दोनों बाप -बेटे मिलकर सम्भालते थे |
               आज तो सुबह से ही हवेली के सभी नौकर हवेली को सजाने मे लगे हुए थे | दीनानाथ जी के पर -दादा के ज़माने की बहुत बड़ी हवेली थी | रख -रखाव के लिए नौकरों की फौज लगी रहती है |
                    शाम के सुहाने वक्त मे पार्टी शुरू हो चुकीं है | दीनानाथ जी आगन्तुको के स्वागत के लिए दरवाजे पर खड़े,उनका अभिवादन स्वीकार कर रहे है | पास ही खड़े उनके बेटे विमलेश की गोद मे चिन्मय को तोहफा भी दे रहे थे | पार्टी मे खाने -पीने के साथ नाच -गाने का भी प्रोग्रेम था| पार्टी अरेंज करने मे पैसा पानी की तरह लगाया था | सभी लोग पार्टी का आनंद ले रहे थे, वहीँ सेठ का एक नौकर रामसिंह, ये सब देख कर दुखी हो रहा था | उसका सोचना था कि,दिखावे के लिए ये बड़े लोग इतना पैसा खर्च कर सकते है,और एक जरूरत मंद इंसान को पैसा उधार भी नहीं दे सकते है?,
               पिछले दस दिनों से रामसिंह सेठ से अपनी माँ के इलाज़ के लिए बीस हजार रुपया उधार मांग रहा था ,पर सेठ के कान मे जैसे ये बात गयी ही नहीं हो | पैसा पास मे नहीं है, तो क्या माँ को बिना इलाज मर जाने तो नहीं दे सकता ? एक के बाद एक विचार रामसिंह के दिमाग मे आ- जा रहे है | आखिर उसने मन ही मन कुछ निश्चय किया ,और मौका पाकर सेठ की दुकान की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए | दुकान के गल्ले मे से रुपया निकाला और घर चला गया |
              दुसरे ही दिन अपनी माँ को इलाज के लिए शहर ले गया | डॉक्टर के प्रयास और रामसिंह की सेवा से माँ जल्दी ही अच्छी होने लगी | एक दिन माँ ने पूछा 'मेरे इलाज के लिए इतने पैसे कहाँ से लाया बेटा ?' माँ सेठ से पेशगी लाया हूँ | पर सच्चाई तो कुछ और ही थी , जिसे सिर्फ वो ही जानता था |
              दुसरे दिन सेठ ने दूकान के गल्ले मे देखा तो पैसे कम मिले |,और आज रामसिंह भी अभी तक नहीं आया | सेठ को समझते देर नहीं लगी कि रामसिंह ही रुपया लेकर फरार हुआ है | सेठ ने पुलिस थाने मे रिपोर्ट लिखवानी चाही पर सेठानी ने रामसिंह की माली -हालत और परेशानी का सोच कर पुलिस थाने मे रिपोर्ट लिखवाने से मना किया |  सेठ ने इस घटना को फिलहाल भूल जाने मे ही अपना भला समझा | कहीं ना कहीं सेठ अपने को ही इस घटना का जिम्मेदार समझ रहा था | काश ! मुझे  रामसिंह की मदद कर देनी चाहिए थी |
              रामसिंह की मेहनत रंग लाई, माँ अब ठीक हो गयी तो रामसिंह अपने खेत को ओने -पोंने भाव मे बेच कर , बीस हजार रुपयों के साथ सेठ के सामने हाजिर हो गया | विनम्र  भाव से बोला ' मैं गुनाह गार हूँ मैंने आपका विस्वास तोडा है | जो सजा देंगे भुगतने को तैयार हूँ | माँ को बचाने के लिए मुझे ये सब करना पडा | मेरी नौकरी ,मेरी बदनामी से ज्यादा मुझे अपनी माँ की जान ज्यादा प्यारी थी | जिसे बचाने के लिए मुझे ये सब करने पर विवश होना पडा | और सेठ को पैसा लौटा कर माफ़ी मांगने लगा | सेठ को पहले तो गुस्सा आया पर खुद को भी जिम्मेदार मानते हुए आगे से फिर कभी ऐसा मत करना बोलकर उसे माफ़ कर दिया |साथ ही ये भी सन्तोष था कि इतने रुपयों मे से केवल बीस हजार रुपया ही ले कर भागा है | पर रामसिंह ने विश्वास तोडा ये सेठ के लिए सोचने वाली बात थी | और उसकी माँ के प्रति एसी भावना देख कर मन ही मन बहुत खुश हुआ | रामसिंह अपनी माँ के सामने किसी भी चीज को तुच्छ समझता है | तो मालिक के फायदे लिए भी कुछ भी कर सकता है | और उसे वापस काम पर रख लिया |
 शांति पुरोहित 

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

दीपोत्सव महापर्व की हार्दिक शुभकामनायें

दीपोत्सव


एक नहीं ले पांच पर्व , दीपोत्सव संग में लाया है ,
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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पांच पर्व का महापर्व ,जन-जन सर्वत्र मनाता है ,
कार्तिक मास की त्रयोदशी से ये आरम्भ हो जाता है ,
नीरस जीवन में रस भर दे इस उत्सव की ये माया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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त्रयोदशी का पर्व महा ;धनतेरस रूप में प्रचलित है ,
पूजे जाते धन्वन्तरी हैं ;आयुर्वेद के जनक जो है ,
स्वस्थ रहो -दीर्घायु हो वरदान इन्ही से पाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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चतुर्दशी पर नरकासुर के वध का उत्सव मनता है ,
दीप जलाये जाते हैं ; यम का दीपक भी जलता है ,
वनवास काट आते रघुवर इस पर्व ने याद दिलाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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आती है तिथि अमावस की इस पर होता लक्ष्मी -पूजन ,
तम पर प्रकाश की जीत का पर्व ,श्री राम आगमन हर्षित जन ,
चीर निशा -तम-जाल को ये प्रकाशित करने आता है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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अन्नकूट का पर्व महा आयोजित होता अगले दिन ,
इंद्र-कोप से रक्षा हित कृष्ण उठायें गोवर्धन ,
सामूहिक रूप से जन-जन ने अन्नकूट को खाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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इस महापर्व का अंतिम पर्व 'यम द्वितीया' कहलाता है,
बहन यमी के भ्रातृ प्रेम की सबको याद दिलाता है ,
हो दीर्घायु भाई मेरा बहनों ने तिलक लगाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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आओ जानें अब कारण भी दीवाली पर्व आयोजन के ,
आये थे राम वनवास काट तब दीप जले घर-आँगन में ,
घोर निशा को दीपों से आलोकित कर चमकाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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कहते हैं हुआ इसी दिन था सर्वज्ञात समुद्र मंथन ,
क्षीरोदधि से निकले थे रत्न ;माँ लक्ष्मी प्रकट हुई तत्क्षण ,
इसीलिए लक्ष्मी-पूजन का अटल विधान बनाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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सिक्खों में भी इस दिन जन-जन खुश होकर दीप जलाता है ,
औरंगजेब की कैद से मुक्त गुरु जी की याद दिलाता है ,
अत्याचारों के आगे कब वीरों ने भाल झुकाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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कहते हैं कृष्ण कन्हैय्या ने इस दिन ही वरा कन्याओं को ,
दुष्ट असुर के चंगुल से छुड्वाया था राजाओं को ,
अंत पाप का करें प्रभु ये विश्वास जगाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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महावीर,दयानंद ने इस दिन परम -धाम प्रस्थान किया ,
भक्तों ने दीप जला हर वर्ष नम्र ह्रदय से याद किया ,
सत्य-अहिंसा अपनाने का मार्ग हमें दिखलाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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इसी दिवस पर रचना की विक्रमादित्य ने संवत की ,
किया पराजित शकों को व् शक्ति हर ली थी हूर्णों की ,
भारत-वीरो ने भुजबल से माता का मान बढाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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महाराज बलि व् वामन की कथा लोक में कहें सुनें ,
पाताल लोक जब गया बलि देवों को राहत तभी मिले ,
तब हर्षित हो जलाये दीप ऐसा ही सुना-सुनाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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प्रहलाद पिता हिरण्यकश्यप ; ऋषियों को अकारण कष्ट दिए ,
पुत्र ने पूजा विष्णु को ,उस पर भी अत्याचार किये ,
नृसिंह ने मारा आकर जब चहुँ हर्ष तब छाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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दीपोत्सव संग जुडा ये सब हमको प्रतिपल सिखलाता है ,
नन्हे प्रज्वलित एक दीपक से अंधकार मिट जाता है ,
झूठ की सत्ता मिली धूल में सत्य आज मुस्काया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
शिखा कौशिक 'नूतन'