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शनिवार, 30 मार्च 2013

वो लड़की ! सोये हुए ज़मीर जगा देती है !!

Mad_girl : Latin girl with an angry and desperate look isolated on a white background Stock Photo 

वो  लड़की  पगली  है ,
बावली है , बहकी हुई है ,
तभी तो ठहाका लगा देती है !
उसके ठाहके की गूँज   
सोये  हुए  ज़मीर जगा  देती है !! 


दुष्कर्म पीडिता की मौत पर
आक्रोशित होती है ,रोती है
और जब उस पीडिता का
पिता लेता है इस हादसे
का मुआवजा और भाई
मांगते हैं नौकरी
तब वो लड़की चीखकर

कहती है बेशर्मों बंद करो
ये सब,  वहशीपन
तुममे भी कम नहीं !
मजाक मत बनाओ मेरी
सखी साथ हुई
दरिदगी  का  !



ये कहकर हो जाती है चुप
फिर बिखरे  बालों को कसकर
पकड़ती है हथेलियों  में ,
सिर उठाकर देखती है
सहमी नज़रों से इधर-उधर ,
आँखों के अंगारों से
ठन्डे ज़ज्बात तपा देती है !
वो लड़की पगली है

बावली है , बहकी हुई है ,
तभी तो ठहाका लगा देती है !



 वो कहती है बैठो सडको पर
जब तक दुष्कर्मी सब
चढ़ न जाये फाँसी  पर  ,
ठुकरा दो मुआवज़े ,
नौकरी की पेशकश और
फ़्लैट ,बस याद रखो
वे आँहें ; वे टीस जो
बिटिया ने भरी -सही हैं !
ज़ख्म देने वालों को
 इतने सस्ते में मत छोड़ो !


 ये कहकर खींचती है
लम्बी सांसे और चुप हो जाती है ,
फिर सोचती है अपना नाम
पर याद नहीं आता ,
वो सड़क पर पड़ा एक पत्थर
आकाश में उछाल देती है ,
बुझे आशा के दिए दिल में जगा  देती है ,

वो लड़की पगली है
बावली है , बहकी हुई है ,
तभी तो ठहाका लगा देती है !




शिखा कौशिक 'नूतन '





शुक्रवार, 29 मार्च 2013

MSN survey: Are women in charge of their own safety?

MSN survey: Are women in charge of their own safety?

The Her Courage survey asked ‘Are women in charge of their own safety?’ Responses received from around 600 MSN users reveal that they are, using a mix of self-defence tactics and calling for help when needed. A minority still prefers to ignore threats and keeping quiet, revealing that age-old conditioning is still at work
Most women wish to take charge of their safety

In our survey, we asked the question ‘Are women in charge of their own safety?’ The answer, it emerges, is mostly ‘yes’. In fact, it bolsters the argument that women don’t need protection as much as they need to be empowered to go about their daily lives without fear.
The fact – proved time and again by reports of assaults on women across the country – remains that it is still unsafe for women out there. So, how prepared are our women to handle threats to their safety? How do they react when harassed in public places?
The survey results revealed that most women take a sensible, intelligent approach to their safety. Bravado or foolhardiness won’t do when they know it’s not a perfectly safe environment. So, to the question ‘If you know you will be returning home late or have to pass through less-than-safe areas you would…?’  an overwhelming 77 % responded they would have someone accompany them; 18 % of feisty women thought pepper spray would be adequate protection, while only 5 % said they wouldn’t worry about it.
When asked how they would react to being groped in a crowded bus or street, 47 % said they would scream and attract attention to the harasser; 36% respondents chose to be more aggressive and retaliate by slapping the man, and 17% said they would ignore it, showing that some women believe suffering in silence is the only way.
When faced with the irritation of obscene calls or text messages a majority of 51 %, responses, said they would go to the police, which is what the experts advise, too. Some 33 % thought having a male tackle the caller may solve the problem while, again, a small number of 16% thought ignoring would be the solution.

MSN survey: Are women in charge of their own safety? 
To the more general question on the best way to handle a perceived threat from a man 46 % said it would be to equip oneself with self-defence tactics such as martial arts, while 34 % per cent said they would call for help. Some 20% believe that dressing conservatively could ward off threats; this, however, may be a misconception for other surveys have revealed that harassers don’t always discriminate between fully-covered women and those who wish to dress more daringly.
The survey asked how public transport could be made safer for women and, here again, a significant 50% said it was up to the women to be more alert and seek help when faced with threats to their safety; 39% said more security personnel should be deployed, while 11 % said it couldn’t be done.
Clearly, there’s no denying that women feel fear and threatened. In an ideal world, the cause of their fear should be tackled and eliminated. Until then, women simply find their own coping mechanisms and our survey shows they are taking charge of their safety.

रविवार, 24 मार्च 2013

मृत शरीर को प्रणाम :सम्मान या दिखावा

मृत शरीर को प्रणाम :सम्मान या दिखावा
Wallpaper last tribute of respect, jackson \ 's funeral, vmi, may 15, 1863


अरस्तू के अनुसार -''मनुष्य एक सामाजिक प्राणी  है समाज जिससे हम जुड़े हैं वहां रोज़ हमें नए तमाशों के दर्शन होते हैं .तमाशा ही कहूँगी मैं इन कार्यों को जिनकी आये दिन समाज में बढ़ोतरी हो रही है .एक शरीर ,जिसमे प्राण नहीं अर्थात जिसमे से आत्मा निकल कर अपने परमधाम को चली गयी ,को मृत कहा जाता है और यही शरीर जिसमे से आत्मा निकल कर चली गयी बड़ी संख्या में लोगों द्वारा उस आत्मा के ही कारण अंतिम प्रणाम किये जाने को अंतिम दर्शन हेतु रखा जाता है जबकि आत्मा के जाने के बाद शरीर मात्र एक त्यागा हुआ वस्त्र रह जाता है .आत्मा के शरीर त्यागने के बाद जल्दी से जल्दी अंतिम संस्कार की क्रिया को अंजाम दिया जाता है क्योंकि जैसे जैसे देरी होती है शरीर का खून पानी बनता है और वह फूलना  शुरू हो जाता है साथ ही उसमे से दुर्गन्ध निकालनी आरम्भ हो जाती है ..अंतिम संस्कार का अधिकार हमारे वेद पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र को दिया गया है जिसे कभी कभी संयोग या सुविधा की दृष्टि से कोई और भी अंजाम दे देता है और अंतिम संस्कार करने वाले की वहां उपस्थिति को ऐसी स्थिति को देखते हुए अनिवार्यता कह सकते हैं किन्तु परिवहन क्रांति /संचार क्रांति का एक व्यापक प्रभाव यहाँ भी पड़ा है अब बहुत दूर दूर बैठे नातेदारों की प्रतीक्षा भी अंतिम संस्कार में देरी कराती है और संचार क्रांति के कारण जिन जिन को सूचना दी जाती है उन सभी की उपस्थिति की अपेक्षा भी की जाती है न केवल उनके अंतिम दर्शन के भाव को देखते हुए बल्कि अपने यहाँ आदमियों की भीड़ को बढ़ाने के लिए भी जिसमे विशेष स्थान गाड़ियों का है क्योंकि आज गाड़ियाँ इतनी ज्यादा हो गयी हैं कि आज हर कोई बसों की असुविधा को देखते हुए इनका ही इस्तेमाल कर रहा है .और परिणाम यह है कि जो कार्य उस वक़्त शीघ्रता शीघ्र संपन्न होना चाहिए उस ओर विलम्ब प्रक्रिया बढती ही जाती है .
अभी हाल में ही हमारे पड़ोस में  एक बुजुर्ग जिनकी आयु लगभग ८७ वर्ष थी ,का दिन में लगभग ३ बजे निधन हो गया अब बुजुर्ग थे तो अच्छा खासा खानदान लिए बैठे थे तमाम परिवारी जन पास ही मौजूद थे अंतिम क्रिया जिसे करनी थी उस बेटे के घर पर ही उन्होंने अपने प्राण त्यागे थे किन्तु दो बेटे जो और हैं उनमे से एक बेटा व् एक बेटी उस दिन नहीं पहुँच पाए इसलिए अंतिम क्रिया अगले दिन के लिए टाल दी गयी .अब जहाँ तक भावुकता की बात की जाये तो ऐसे उदहारण भी हैं जिसमे मृत शरीर को उनके परिजनों ने लम्बे समय तक अपने पास ही रखा उनका अंतिम संस्कार करने की वे हिम्मत ही नहीं जुटा पाए और ऐसे भाव ही अधिकांश लोग रखते हैं और इसलिए ही कहते हैं कि बेटे बेटी को अंतिम दर्शन का अधिकार है उनसे यह अधिकार नहीं छीना जाना चाहिए और इसलिए यह प्रतीक्षा गलत नहीं है किन्तु मैं पूछती हूँ कि ये अंतिम दर्शन कहा ही क्यूं जाता है ?क्या हमारे बड़ों का जो अंश हममे है और उनके प्रति जो श्रृद्धा व् जो सम्मान हममे है क्या वह बस यहीं ख़त्म हो जाता है ?क्या इस तरह हम यहाँ उन्हें वास्तव में अपने से बिल्कुल अलग नहीं कर देते  हैं ?उनके विचारों को सम्मान देकर उन्हें याद रखकर जो ख़ुशी हम उन्हें जीते जी दे सकते हैं क्या उसका लेशमात्र भी इस दिखावे में है ?
    शरीर से जब प्राण निकल जाते हैं तो वह मात्र देह होती है जो जितनी जल्दी हो सके जिन तत्वों से मिलकर बनी है उनमे मिल जानी चाहिए अन्यथा विलम्ब द्वारा हम उस शरीर की दुर्गति ही करते हैं जिसके अंतिम दर्शनों के नाम पर हम उसका सम्मान करने को एकत्रित होते हैं .आज परिवहन व् संचार क्रांति ने ये संभव कर दिया है तो हम ऐसे मौकों पर दूर-दराज के नाते रिश्तेदारों को भी इस कार्य में जोड़ लेते हैं .ऐसे में  यदि देखा जाये तो महाराजा दशरथ के अंतिम संस्कार भी चौदह वर्ष बाद ही किया जाना चाहिए था क्योंकि उनके दो पुत्र उनके पास नहीं थे और उन्हें भी तो अपने पिता के अंतिम दर्शन का अधिकार था किन्तु तब न तो परिवहन के इतने सुलभ साधन थे और न ही सूचना के लिए हर हाथ में मोबाइल ,तो भगवान राम व् अनुज लक्ष्मण को इस अधिकार से वंचित रहना पड़ा और जहाँ तक मृत शरीर को अंतिम प्रणाम कर हम मृतात्मा के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शित करते हैं तो यह मात्र प्रदर्शन है क्योंकि आत्मा कभी नहीं मरती .श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय २ के श्लोक २० में कहा गया है -
''न जायते म्रियते वा कदाचि-
    न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः .
अजो नित्यः शाश्वतो$यं  पुराणों
    न हन्यते हन्यमाने शरीरे .२०.''

[यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है ;क्योंकि यह अजन्मा ,नित्य ,सनातन और पुरातन है ;शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता .]
इस प्रकार भले ही शरीर रूप में कोई हमारा हमसे अलग हो गया हो किन्तु हमसे वह आत्मा रूप में कभी अलग नहीं होता और न ही हम ऐसा मान सकते हैं इसलिए ऐसे में जिस आपा-धापी में अंतिम दर्शन के नाम पर हम अंतिम संस्कार के लिए जाने में भीड़ बढ़ाते हैं वह महज एक दिखावा है और कुछ नहीं .कविवर गोपाल दास ''नीरज''ने भी कहा है -
''किसके रोने से कौन रुका है कभी यहाँ ,
जाने को ही सब आयें हैं सब जायेंगे .
चलने की तैयारी ही तो बस जीवन है ,
कुछ सुबह गए कुछ डेरा शाम उठाएंगे .''
  शालिनी कौशिक
      [कौशल]

शनिवार, 16 मार्च 2013


महाभारत  पर  हाइकू


                महाभारत
                अन्याय के खिलाफ
                बिछी बिसात    
       
                                                     ***

                भीष्म तुम भी
                देखते रहे सब
                क्यों चुपचाप?          

                                                     ***

                स्वयं को हार
                द्रौपदी को लगाया
                कैसे दाँव पे?              

                                                     ***

                                                    भूली नहीं वो
                होना चीर-हरण
                लिया बदला            

                                                     ***

                भूलो ना कभी
                होना चीर-हरण
                बना मरण               

                                                     ***

                                                   नारी, बेचारी!
                द्रौपदी सीता पड़ीं
                कितनी भारी           

                                                     *** 

बुधवार, 13 मार्च 2013

[WOMAN ABOUT MAN]

 

आज करूँ आगाज़ नया ये अपने ज़िक्र को चलो छुपाकर ,
कदर तुम्हारी नारी मन में कितनी है ये तुम्हें बताकर .


 जिम्मेदारी समझे अपनी सहयोगी बन काम करे ,
साथ खड़ी है नारी उसके उससे आगे कदम बढाकर .



 बीच राह में साथ छोड़कर नहीं निभाता है रिश्तों को ,
अपने दम पर खड़ी वो होती ऐसे सारे गम भुलाकर .


 कैद में रखना ,पीड़ित करना ये न केवल तुम जानो ,
जैसे को तैसा दिखलाया है नारी ने हुक्म चलाकर .


 धीर-वीर-गंभीर पुरुष का हर नारी सम्मान करे ,
आदर पाओ इन्हीं गुणों को अपने जीवन में अपनाकर .


 जो बोओगे वो काटोगे इस जीवन का सार यही ,
नारी से भी वही मिलेगा जो तुम दोगे साथ निभाकर .


 जीवन रथ के नर और नारी पहिये हैं दो मान यही ,
''शालिनी''करवाए रु-ब-रु नर को उसका अक्स दिखाकर .
            
           शालिनी कौशिक
  [WOMAN ABOUT MAN]


आज तक पुरुष ही महिला के सम्बन्ध में अपने विचार अभिव्यक्त करता रहा है और इस सम्बन्ध  में ब्लॉग जगत में बहुत से ब्लॉग हैं जैसे भारतीय नारी ,नारी आदि .८ मार्च २०१३ से मैंने भी एक सामूहिक ब्लॉग की शुरुआत की है जिसका नाम है ''  [WOMAN ABOUT MAN] '' .यहाँ आप सभी महिला ब्लोगर्स आकर पुरुषों के सम्बन्ध में अपने सकारात्मक ,नकारात्मक जो भी विचार हों और उनसे जुड़े जो खट्टे -मीठे अनुभव हों सम्पूर्ण ब्लॉग जगत से साझा कर सकती है .यदि आप मेरे इस ब्लॉग से जुड़ने की आकांक्षी हैं तो मेरे इस  इ मेल पर मेल करें - kaushik_shalini@hotmail.com

रविवार, 10 मार्च 2013

Voices of Indian women

 go to MSN India

Voices of Indian women

Voices of Indian women (© Reuters)
Shaswati Roy Chaoudhary, 23, who works for an online fashion company holds a bottle of pepper spray in a public park in New Delhi.


Voices of Indian women (© Reuters)
A salesgirl applies lipstick inside a shop with bottles of pepper spray displayed for sale in New Delhi.
Voices of Indian women (© Reuters)
Baishali Chetia, 30, a freelance visual artist, takes part in a Krav Maga class, an Israeli self defence technique, in New Delhi.
Voices of Indian women (© Reuters)
Sweety, 22, a student, takes a self defence class in New Delhi.





गुरुवार, 7 मार्च 2013

एक तमाचा नपुंसक व्यवस्था के मुंह पर

 Brave woman award to Nirbhaya
 International award for Delhi gang-rape victim 'Nirbhaya ...
 

जब भी 'दामिनी ' होगी सम्मानित 
ये होगा एक तमाचा उस 
नपुंसक व्यवस्था के मुंह पर 
जो खुले छोड़ देती है 
दरिंदों को दरिंदगी के लिए !!!
 
EVERY TIME WHEN ''DAMINI'' HAS BEEN AWARDED -ITS A SLAP ON THE IMPOTENT SYSTEM WHICH IS RESPONSIBLE FOR SUCH INCIDENTS .

मंगलवार, 5 मार्च 2013

Creating Awareness for Stopping Female Foeticide

Creating Awareness for Stopping Female Foeticide

Though sex ratio in the country has improved from 927 in 1991 to 940 in 2011 as per Census 2011(Prov.), Child Sex Ratio has dipped from 945  females per thousand males in 1991 to 914 females per 1000 males in 2011. 
Some of the reasons for female foeticide are son preference, low status of women, social and financial security associated with sons, socio-cultural practices including dowry & violence against women, small family norm and consequent misuse of diagnostic techniques with the intention of female foeticide.
Government has adopted a multi-pronged strategy to curb female foeticide in the country. For prohibition of sex selection, before and after conception, and for regulation of prenatal diagnostic techniques, the Government has enacted a comprehensive legislation the Pre-conception and Pre-natal Diagnostic Techniques (Prohibition of Sex Selection) Act, 1994, further amended in 2003.
The measures include the following:-
· The Government have intensified effective implementation of the said Act and amended various rules covering provision for sealing, seizure and confiscation of unregistered ultrasound machines and punishment against unregistered clinics. Regulation of use of portable ultrasound machines within the registered premises only has been notified. Restriction on medical practitioners to conduct ultrasonography at maximum of two ultrasound facilities within a district has been placed. Registration fees have been enhanced. Rules have been amended to provide for advance intimation in change in employees, place, address or equipment.
· The Government has requested all the State/UT Governments to strengthen implementation of the Act and take timely steps to stop use of illegal sex determination.
· Hon’ble Prime Minister has urged the Chief Ministers of all the States to provide personal leadership to reverse the declining trend in child sex ratio and address the neglect of the girl child through focus on education and empowerment
· Ministry of Health & Family Welfare has intensified efforts to exhort the States and UTs to pay utmost attention to serious implementation of the PC&PNDT Act.
· The Central Supervisory Board (CSB) under the PNDT Act has been reconstituted and regular meetings are being held.
· Matter has been taken up with the Ministry of Communication and Information Technology to block sex selection advertisement on websites.
· The National Inspection and Monitoring Committee (NIMC) have been reconstituted and inspections of ultrasounds diagnostic facilities have been intensified. Inspection have been carried out in many states including Bihar, Chhattisgarh, Delhi, Haryana, Madhya Pradesh, Maharashtra, Odisha, Punjab, Uttarakhand, Rajasthan, Gujarat and Uttar Pradesh.
· The Government is rendering financial support to the States and UTs for Information, Education and Communication campaigns and for strengthening structure for the implementation of the Act under the National Rural Health Mission.
· States have been advised to focus on District/Blocks/Villages with low Child Sex Ratio to ascertain the causes, plan appropriate Behaviour Change Communication campaigns and effectively implementation provisions of the PC&PNDT Act.
· States are undertaking various Information, Education and Communication (IEC) activities to create awareness about the Act including public messages through print & electronic media, capacity building workshops for programme managers and judicial officers, Grant in Aid to Non-Governmental Organizations for community mobilization and involvement of religious leaders for awareness generation etc.
This information was given by Minister of State for Health & Family Welfare Shri Abu Hasem Khan Choudhury in written reply to a question in the Rajya Sabha on March 5, 2013.
from-

RESPECT OUR WOMEN


 

We are indeed a strange society. Men revere women, treat them with gentleness while considering them a 'weaker sex', and at the same time, for as long as one can remember, there have been innumerable acts of violence against women by men. What makes Indian men so conflicted? This International Women's Day (March 8), let us focus on what can be done to improve the status of women in society and let us fight the injustices committed against them.

What are the challenges that women face? MSN India interviews eminent female personalities to discuss the mindset of the Indian male. Read inspiring stories of women who have faced numerous challenges to emerge at the top of their chosen fields. From a male perspective, we showcase personalities who suggest reforms to ensure women's welfare. Last but most important, let us pledge to prevent violence against women and raise our voices as one to bring that change.

सोमवार, 4 मार्च 2013

हाईकोर्ट बेंच नहीं अब हम अपना राज्य ही लेंगे .


                           
 पश्चिमी यू.पी.उत्तर प्रदेश का सबसे समृद्ध क्षेत्र है .चीनी उद्योग ,सूती वस्त्र उद्योग ,वनस्पति घी उद्योग ,चमड़ा उद्योग आदि आदि में अपनी पूरी धाक रखते हुए कृषि क्षेत्र में यह उत्तर प्रदेश सरकार को सर्वाधिक राजस्व प्रदान करता है .इसके साथ ही अपराध के क्षेत्र में भी यह विश्व में अपना दबदबा रखता है .यहाँ का जिला मुजफ्फरनगर तो बीबीसी पर भी अपराध के क्षेत्र में ऊँचा नाम किये है और जिला गाजियाबाद के नाम से तो अभी हाल ही में एक फिल्म का भी निर्माण किया गया है .यही नहीं अपराधों की राजधानी होते हुए भी यह क्षेत्र धन सम्पदा ,भूमि सम्पदा से इतना भरपूर है कि बड़े बड़े औद्योगिक घराने यहाँ अपने उद्योग स्थापित करने को उत्सुक रहते हैं और इसी क्रम में बरेली मंडल के शान्ह्जहापुर में अनिल अम्बानी ग्रुप के रिलायंस पावर ग्रुप की रोज़ा  विद्युत परियोजना में २८ दिसंबर २००९ से उत्पादन शुरू हो गया है .सरकारी नौकरी में लगे अधिकारी भले ही न्याय विभाग से हों या शिक्षा विभाग से या प्रशासनिक विभाग से ''ऊपर की कमाई'' के लिए इसी क्षेत्र में आने को लालायित रहते हैं .इतना सब होने के बावजूद यह क्षेत्र पिछड़े हुए क्षेत्रों में आता है क्योंकि जो स्थिति भारतवर्ष की अंग्रेजों ने की थी वही स्थिति पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बाकी उत्तर प्रदेश ने व् हमारे भारतवर्ष ने की है .
     ''सोने की चिड़िया''अगर कभी विस्तृत अर्थों में भारत था तो सूक्ष्म अर्थों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश आज भी है .यहाँ से लेने को तो सभी लालायित रहते हैं किन्तु देने के नाम पर ठेंगा दिखाना एक चलन सा बन गया है .आज पूरा पूर्वी उत्तर प्रदेश पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दम पर फल-फूल रहा है .छात्रों को राज्य सेवा ,शिक्षा में कहीं भी आने के लिए परीक्षा देनी हो तो अपने पैसे व् समय अपव्यय करने के लिए तैयार रहो और चलो इलाहाबाद या लखनऊ .समझौते की गुंजाईश न हो ,मरने मिटने को ,भूखे मरने को तैयार हैं तो चलिए इलाहाबाद ,जहाँ पहले तो बागपत से ६४० किलोमीटर ,मेरठ से ६०७ किलोमीटर ,बिजनोर से ६९२ किलोमीटर ,मुजफ्फरनगर से ६६० किलोमीटर ,सहारनपुर से ७५० किलोमीटर ,गाजियाबाद से ६३० किलोमीटर ,गौतमबुद्ध नगर से ६५० किलोमीटर ,बुलंदशहर से ५६० किलोमीटर की यात्रा कर के धक्के खाकर ,पैसे लुटाकर ,समय बर्बाद कर पहुँचो फिर वहां होटलों में ठहरों ,अपने स्वास्थ्य से लापरवाही बरत नापसंदगी का खाना खाओ ,गंदगी में समय बिताओ और फिर न्याय मिले न मिले ,परीक्षा पास हो या न हो उल्टे पाँव उसी तरह घर लौट आओ .ऐसे में १९७९ से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट खंडपीठ के आन्दोलन कारियों में से आगरा के एक अधिवक्ता अनिल प्रकाश रावत जी द्वारा विधि मंत्रालय से यह जानकारी मांगी जाने पर -''कि क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खंडपीठ स्थापना के लिए कोई प्रस्ताव विचाराधीन है ?''पर केन्द्रीय विधि मंत्रालय के अनुसचिव के.सी.थांग कहते हैं -''जसवंत सिंह आयोग ने १९८५ में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित करने की सिफारिश की थी .इसी दौरान उत्तराखंड बनने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिले उत्तराखंड के अधिकार क्षेत्र में चले गए वहीँ नैनीताल में एक हाईकोर्ट की स्थापना हो गयी है .इस मामले में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की राय मागी गयी थी .इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश  ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की किसी शाखा की स्थापना का कोई औचित्य नहीं पाया है .''
     सवाल ये है कि क्या उत्तराखंड बनने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाईकोर्ट से दूरी घट गयी है ?क्या नैनीताल हाईकोर्ट इधर के मामलों में दखल दे उनमे न्याय प्रदान कर रही है ?और अगर हाईकोर्ट के माननीय  मुख्य न्यायाधीश को इधर खंडपीठ की स्थापना का कोई औचित्य नज़र नहीं आता है तो क्यों?क्या घर से जाने पर यदि किसी को घर बंद करना पड़ता है तो क्या उसके लिए कोई सुरक्षा की व्यवस्था की गयी है ?जबकि यहाँ यू.पी.में तो ये हाल है कि जब भी किसी का घर बंद हो चाहे एक दिन को ही हो चोरी हो जाती है .और क्या अपने क्षेत्र से इलाहाबाद तक के सफ़र के लिए किसी विशेष सुविधा की व्यवस्था की गयी है ?जबकि यहाँ यू.पी. में तो आर.पी.ऍफ़.वाले ही यात्रियों को ट्रेन से धकेल देते हैं .राजेश्वर व् सरोज की घटना अभी एक दिन पूर्व की ही है जिसमे सरोज की जान ही चली गयी .क्या इलाहाबाद में वादकारियों के ठहराने व् खाने के लिए कोई व्यवस्था की गयी है ?जबकि वहां तो रिक्शा वाले ही होटल वालों से कमीशन खाते हैं और यात्रियों को स्वयं वहीँ ले जाते हैं .और क्या मुक़दमे लड़ने के लिए वादकारियों को वाद व्यय दिया जाता है या उनके लिए सुरक्षा का कोई इंतजाम किया जाता है ?जबकि हाल तो ये है कि दीवानी के मुक़दमे आदमी को दिवालिया कर देते हैं और फौजदारी में आदमी कभी कभी अपने परिजनों व् अपनी जान से भी हाथ धो डालता है .पश्चिमी यू.पी .की जनता को इतनी दूरी के न्याय के मामले में या तो अन्याय के आगे सिर झुकाना पड़ता है या फिर घर बार  लुटाकर न्याय की राह पर आगे बढ़ना होता है .
     न्याय हो या शिक्षा का क्षेत्र दोनों में ही यदि हाईकोर्ट व् सरकार अपनी सही भूमिका निभाएं तो बहुत हद तक जन कल्याण भी कर सकती है और न्याय भी .आम आदमी जो कि कानून की प्रक्रिया के कारण ही बहुत सी बार अन्याय  सहकर घर बैठ जाता है और दूरी को देख छात्र परीक्षा देने से पीछे हट जाता है ,दोनों ही आगे बढ़ेंगे यदि हाईकोर्ट ,शिक्षा प्रशासन ,सरकार सही ढंग से कार्य करें .यह हमारा देश है हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था है फिर हमें ही क्यों परेशानी उठानी पड़ती है ?यदि वेस्ट यू.पी.में हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित की जाती है तब निश्चित रूप से मुक़दमे बढ़ेंगे और इनसे होने वाली आय से जो सरकारी खर्च में इस स्थापना के फलस्वरूप बढ़ोतरी हुई होगी वह तो पूरी होगी ही सरकार की आय में भी बढ़ोतरी होगी और जनता में सरकार के प्रति विश्वास भी बढेगा जो सरकार के स्थायित्व के लिए व् भविष्य में कार्य करने के लिए बहुत आवश्यक है .   शिक्षा परीक्षा की जो प्रतियोगिताएं इलाहाबाद ,लखनऊ में आयोजित की जाती हैं उससे वहां पर छात्रों व् उनके परिजनों की बहुत भीड़ बढती है जिसके लिए प्रशासन को बहुत सतर्कता से कार्य करना होता है उसे यदि  जिले या मंडलों के कॉलेज में बाँट दिया जाये तो सरकार पर इतने इंतजाम का बोझ नहीं पड़ेगा और प्रतिभागियों को भी सुविधा रहेगी .वे आसानी से सुबह को अपने घर से जाकर शाम तक घर पर लौट सकेंगे और इस तरह न उन्हें अपने घर की चिंता होगी और न प्रशासन को व्यवस्था की . किन्तु पूर्व का अर्थात इलाहाबाद व् लखनऊ का राजनीतिक प्रभाव इतना ज्यादा है कि कुछ भी ऐसा नहीं किया जायेगा जिससे पश्चिम की जनता वहां से कटे और उनकी आमदनी पर प्रभाव पड़े भले ही इधर की जनता लुटती पिटती रहे .इसलिए कोई भी प्रयास जो इस दिशा में किया जाता है वह सफल नहीं होता .चाहे केन्द्रीय रेल बजट हो या उत्तर प्रदेश सरकार का बजट हो इधर के लिए ऐसे ही काम किये जाते हैं जो ''ऊंट के मुहं में जीरा'' ही साबित होते हैं .रेल बजट में दिल्ली-सहारनपुर वाया शामली रूट के दोहरीकरण के नाम पर सर्वे का लॉलीपाप ही दिया गया .उत्तर प्रदेश सरकार के बजट में २५९ सेतुओं के निर्माण का प्रावधान है जिसमे से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मात्र 9 सेतु ही हैं .
    आज स्थिति ये है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ठगा जा रहा है और ये यहाँ की जनता को ही अब सोचना होगा कि उसे मात्र कुछ भाग लेना है या अपना पूरा अधिकार .कृषि ,उद्योग ,धन आदि सभी संपदाओं से भरपूर इस क्षेत्र को अब छोटे मोटे इन तुच्छ प्रलोभनों का मोह त्यागना होगा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए ही आगे बढ़ना होगा क्योंकि इसके बगैर यहाँ की जनता का कल्याण नहीं होगा और हर मामले में पूर्व को पश्चिम के सिर पर ही बैठाया जाता रहेगा .इसलिए अब तो यहाँ की जनता को यही कहना होगा -
       ''बहकावों में न आयेंगे ,
           अपनी सरकार बनायेंगे .
       तुम ना समझोगे औचित्य ,
            हम ना तुमको समझायेंगे .
        हम जनता हैं ,हम ताकत हैं ,
           अब तुमको भी दिखलायेंगे .

         छोटी मोटी मांगे न कर ,
          अब राज्य इसे बनवाएँगे .''
    शालिनी कौशिक
        [कौशल]