समर्थक

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

तभी रुकेगा दहशतगर्दी का जूनून

पक्षपात ये नहीं वजह बढती कट्टरता -JAGRAN JUNCTION FORUM
 Peace : dove of peace


पक्षपात ये नहीं वजह बढती कट्टरता ,
नाम धर्म का लेकर ;खेल ये है नफरत का ,
भोली जनता भ्रमित , हो रहे रोज़ धमाके ,
मानवता रोती ,दहशत के लगे ठहाके ,
आपस में सद्भाव लायेगा अमन-सुकून ,
तभी रुकेगा दहशतगर्दी का जूनून !!

     शिखा कौशिक 'नूतन'

 

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

इबादत गैरों की अपनों से फरक करते हैं .

 Expressive criminal -Funny Male Business Criminal Laughing -

तबस्सुम चेहरे पर लाकर हलाक़ करते हैं ,
अकलमंद ऐसे दुनिया में तबाही करते हैं .


बरकंदाज़ी करते ये फरीकबंदी की ,
इबादत गैरों की अपनों से फरक करते हैं .


फ़रेफ्ता अपना ही होना फलसफा इनके जीवन का ,
फर्जी फरजानगी की शख्सियत ये रखते हैं .


मुनहसिर जिस सियासत के मुश्तरक उसमे सब हो लें ,
यूँ ही मौके-बेमौके फसाद करते हैं .


समझते खुद को फरज़ाना मुकाबिल हैं न ये उनके,
जो अँधेरे में भी भेदों पे नज़र रखते हैं .


तखैयुल पहले करते हैं शिकार करते बाद में ,
गुप्तचर मुजरिम को कुछ यूँ तलाश करते हैं .

हुआ जो सावन में अँधा दिखे है सब हरा उसको ,
ऐसे रोगी जहाँ में क्यूं यूँ खुले फिरते हैं .


 रश्क अपनों से रखते ये वफ़ादारी करें उनकी ,
मिटाने को जो मानवता उडान भरते हैं .

हकीकत कहने से पीछे कभी न हटती ''शालिनी''
मौजूं  हालात आकर उसमे ये दम भरते हैं .


शब्दार्थ-तखैयुल -कल्पना ,फसाद-लड़ाई-झगडा ,फरज़ाना -बुद्धिमान ,मुनहसिर-आश्रित ,बरकंदाज़ी -चौकीदारी ,रश्क-जलन ,फरक-भेदभाव .

शालिनी कौशिक
       [कौशल ]

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

अफ़सोस ''शालिनी''को ये खत्म न ये हो पाते हैं .

अफ़सोस ''शालिनी''को ये खत्म न ये हो पाते हैं .


खत्म कर जिंदगी देखो मन ही मन मुस्कुराते हैं ,
मिली देह इंसान की इनको भेड़िये नज़र आते हैं .

तबाह कर बेगुनाहों को करें आबाद ये खुद को ,
फितरतन इंसानियत के ये रक़ीब बनते जाते हैं .

फराखी इनको न भाए ताज़िर  हैं ये दहशत के ,
मादूम ऐतबार को कर फ़ज़ीहत ये कर जाते हैं .

न मज़हब इनका है कोई ईमान दूर है इनसे ,
तबाही में मुरौवत की सुकून दिल में पाते हैं .

इरादे खौफनाक रखकर आमादा हैं ये शोरिश को ,
रन्जीदा कर जिंदगी को मसर्रत उसमे पाते हैं .

अज़ाब पैदा ये करते मचाते अफरातफरी ये ,
अफ़सोस ''शालिनी''को ये खत्म न ये हो पाते हैं .

शब्दार्थ :-फराखी -खुशहाली ,ताजिर-बिजनेसमैन ,
              मादूम-ख़त्म ,फ़ज़ीहत -दुर्दशा ,मुरौवत -मानवता ,
           शोरिश -खलबली ,रंजीदा -ग़मगीन ,मसर्रत-ख़ुशी ,
           अज़ाब -पीड़ा-परेशानी .

                             शालिनी कौशिक 
                                    [कौशल ]


बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

INDIA'S MESSAGE TO KASHMIR ON VALENTINE DAY

 भारतीयों का वेलेंटाइन सन्देश कश्मीर की अवाम के नाम !

दिल दिया दर्द लिया

 Broken-Heart picture





DR.SHIKHA KAUSHIK ‏@shikhagulka

INDIA'S MESSAGE TO KASHMIR ON VALENTINE DAY - WE HAVE GIVEN OUR HEART TO YOU AND YOU HAVE GIVEN PAIN !

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

अफ़रोज़ ,कसाब-कॉंग्रेस के गले की फांस

अफ़रोज़ ,कसाब-कॉंग्रेस के गले की फांस
Delhi Gangrape Case : sixth accused in the case as minor as unfortunate, says father
दिल्ली गैंगरेप कांड के एक आरोपी अफ़रोज़ के नाबालिग होने के कारण उसकी इस कांड में सर्वाधिक वहशी संलिप्तता होने के बावजूद उसे नाममात्र की ही सजा मिलने की बात है और इसलिए एक प्रश्न यह भी उठाया जा रहा है कि यदि कसाब भी नाबालिग होता तो क्या वह भी छूट जाता ? 
दिल्ली गैंगरेप कांड के एक आरोपी अफ़रोज़ के नाबालिग होने के कारण उसकी इस कांड में सर्वाधिक वहशी संलिप्तता होने के बावजूद उसे नाममात्र की ही सजा मिलने की बात है और इसलिए एक प्रश्न यह भी उठाया जा रहा है कि यदि कसाब भी नाबालिग होता तो क्या वह भी छूट जाता ?   इस प्रश्न के उत्तर के लिए हमें भारतीय कानून का गहराई से विभिन्न पहलूओं पर अवलोकन करना होगा .
   किशोर न्याय [बालकों की देखभाल व् संरक्षण ]अधिनियम २००० की धारा २ k के अनुसार किशोर से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जिसने १८ वर्ष की आयु पूरी न की हो .

  और इसी अधिनियम  की धारा १६ कहती है कि किसी किशोर को जिसने कोई अपराध किया है मृत्यु या आजीवन कारावास का दंड नहीं दिया जायेगा और न ही प्रतिभूति या जुर्माना जमा करने में चूक होने पर कारावासित किया जायेगा  ......इसी धारा में आगे कहते हुए ये भी कहा गया है कि किशोर जिसने १६ साल की आयु पूरी कर ली है और उसका अपराध गंभीर प्रकृति का है और उसका आचरण व् व्यवहार ऐसा नहीं है कि स्पेशल होम भेजना उसके व् अन्य किशोरों के हित में हो तो बोर्ड उसे अन्य सुरक्षित स्थल में भेजेगा और आगे की कार्यवाही के लिए राज्य सरकार को रिपोर्ट करेगा .
किन्तु राज्य सरकार भी अन्य व्यवस्थाएं करते हुए किशोर के लिए निर्धारित अवधि के कारावास से अधिक के निरोध का आदेश नहीं दे सकती .
    दूसरी ओर भारतीय संविधान का अनुच्छेद १४ यह उपबंधित करता है कि ''भारत राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से अथवा विधियों के समान संरक्षण से राज्य द्वारा वंचित नहीं किया जायेगा .''......और अनुच्छेद १४ का यह संरक्षण नागरिक और अनागरिक दोनों को प्राप्त है और विधि के समक्ष समता व् विधियों के समान संरक्षण दोनों वाक्यांशों का एक ही उद्देश्य है -समान न्याय  और इसके अनुसार ये अधिकार नागरिक व् विदेशी को समान रूप से प्राप्त हैं .विधि की दृष्टि में सभी व्यक्ति समान हैं और एक जैसी विधियों से नियंत्रित होंगे .अर्थात भारत में दोहरी विधि प्रणाली प्रचलित नहीं है .  

ऐसे में यदि कसाब नाबालिग होता तो वह भी इस संरक्षण का अधिकारी होता जिसका अधिकारी आज अफ़रोज़ हो रहा है .
   अब एक बात और जिसका आलोचकों द्वारा बहुतायत में ढोल पीटा जा रहा है कि अफ़रोज़ को मुस्लमान होने की वजह से बचाया जा रहा है तो ये जानकारी तो उन्हें होनी ही चाहिए कि ये इस देश का कानून है जो अफ़रोज़ को देखकर नहीं बनाया गया और हमारा कानून धर्म,मूलवंश,लिंग,जाति जन्मस्थान के आधार पर अनु.१५ के अंतर्गत विभेद को प्रतिषिद्ध करता है अर्थात यहाँ कोई धर्म ,मूलवंश ,जाति,लिंग जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का शिकार नहीं होगा .

यहाँ दिल्ली सरकार  कानून के अनुसार कार्य कर रही है इसलिए इस मामले में उसे कोई दोष नहीं दिया जा सकता यदि कोई दोष दिया भी जायेगा तो हमारी कानून व्यवस्था को दिया जायेगा जो भावी समस्याओं को देखते हुए किसी कानूनी दंड का पहले किये गए अपराध पर लागू किये जाने का प्रबंध नहीं करती .
  कानून व्यवस्था बनाये रखना राज्य सूची का विषय है और ऐसे में दिल्ली सरकार अपनी लापरवाह व्यवस्था की दोषी है किन्तु नित नयी घटती ऐसी दुखद घटनाएँ हमारी कानूनी व्यवस्था में अमूल चूल परिवर्तन की बात जोह रही हैं जिसका दारोमदार केन्द्रीय  व्यवस्थापिका  का है और ऐसी घटनाएँ जो बहुत पहले से घट रही हैं उन्हें देखते हुए उसके द्वारा सही कदम न उठाया जाना जितना सत्तारूढ़ दल को दोषी बनत है उतना ही दोष वह अन्य दलों जिसमे लगभग सम्पूर्ण विपक्ष आता है ,का भी है .जो अपने राजनीतिक दांवपेंचों में ही उलझे रहते हैं किन्तु उस ओर ध्यान नहीं देते जिसके संरक्षण व् विकास के लिए जनता उन्हें वहां भेजती है .और तो और दोषी हमारी जनता हम सभी हैं क्योंकि नेता ही नहीं हम भी तब जागते हैं जब पानी सिर के ऊपर  से गुजर जाता है .
  और अंत में ,अफ़रोज़ को यदि मुसलमान होना की वजह से बचाया जा रहा है तो ऐसा कहने वाले बुद्धिजीवियों से मेरा यही कहना  है कि कसाब भी एक मुसलमान था और उसे भले  ही दूसरे  राज्य में फांसी पर लटकाया गया हो पर सरकार वहां भी कॉंग्रेस की ही है इसलिए इस संकीर्ण मानसिकता में वे देश के  सर्वाधिक प्रभावशाली दल को न लपेटें तो देश हित में उत्तम कार्य होगा .साथ ही  वर्तमान सरकार की आलोचना कर आलेखों के जरिये अपनी बुद्धि का दुरूपयोग करने वाले प्रबुद्ध जन यदि अफ़रोज़ का बालिग होना  साबित कर उसे दामिनी के साथ किया गए वीभत्स कृत्य करने की सही सजा दिला दें तो शायद अपनी लेखन क्षमता के साथ भी न्याय करेंगे और दामिनी की आत्मा व् समस्त नारी समुदाय के साथ भी .
              शालिनी कौशिक                 [कानूनी ज्ञान ]


रविवार, 3 फ़रवरी 2013

नारी महज एक शरीर नहीं

 Indian_girl : Indian young womanIndian_girl : Indian young woman with sari vector  Stock Photo
महिला सशक्तिकरण का दौर चल रहा है .महिलाएं सशक्त हो रही हैं .सभी क्षेत्रों में महिलाएं अपना परचम लहरा रही हैं .२०१२ की शुरुआत ज्योतिषियों के आकलन ''शुक्र ग्रह का प्रभुत्व रहेगा ''फलस्वरूप महिलाएं ,जो कि शुक्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करती हैं ,प्रभावशाली होंगी .सारे विश्व में दिखाई भी दिया कहीं महिला पहली बार राष्ट्रपति हो रही थी तो कहीं प्रधानमंत्री बन रही थी .अरब जैसे देश से पहली बार महिला एथलीट ओलम्पिक में हिस्सा ले रही थी .सुनीता विलियम्स के रूप में महिला दूसरी बार अन्तरिक्ष में जा रही थी और पता नहीं क्या क्या .चारों ओर महिलाओं की सफ़लता  के गुणगान गाये जा रहे थे  कि एकाएक ढोल बजते बजते थम गए ,,पैर ख़ुशी में नाचते नाचते रुक गए ,आँखें फटी की फटी रह गयी और कान के परदे सुनने में सक्षम होते हुए भी बहरे होने का ही मन कर गया जब वास्तविकता से दो चार होना पड़ा और वास्तविकता यही थी कि महिला होना ,लड़की होना एक अभिशाप है .सही लगी अपने बड़ों की ,समाज की बातें जो लड़की के पैदा होने  पर  की जाती हैं .सही लगी वो हरकत जिसका अंजाम कन्या भ्रूण हत्या होता है .जिस जिंदगी को इस दुष्ट दुनिया में जीने से पहले ही घोट दिया जाये जिस पंछी के पर उड़ने से पहले ही काट दिया जाएँ उसकी तमन्ना   भी कौन करेगा ,वह इस दुनिया में आने की ख्वाहिश ही क्यों करेगा ?
      दिल्ली में फिजियोथेरेपिस्ट मासूम छात्रा के साथ जिस बर्बरता से बलात्कार  की घटना को अंजाम दिया गया उससे शरीर में एक सिहरन सी पैदा हो गयी .ये ऐसा मामला था जो सुर्ख़ियों में आ गया और इसलिए इसके लिए जनता जनार्दन उठ खड़ी हुई ,वही जनता जो एक घंटे तक सड़क पर सहायता को पुकारती  उस मासूम की मदद को आगे न बढ़ सकी ,वही जनता जो रोज ये घटनाएँ अपने आस पास देखती है किन्तु अनदेखा कर आगे बढ़ जाती है .ये जनता के ही हाल हैं जो एक भुगत भोगी कहती है कि ''गली में उसे दो आदमियों ने कुछ गलत कहा और वे उसके जानकर ,उसके गहरे हमदर्द  ऊपर उसकी आवाज को सुनकर भी पहचान कर भी खिड़की बंद कर अन्दर बैठ गए .''ये जनता ही है जो कि एक आदमी जो गरीब तबके का है उसकी बेटी को अमीर तबके के लोगों द्वारा छेड़खानी किये जाने पर पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से रोकती है और सुलह करने का दबाव बनाती है .ये जनता ही है जो कि एक ५५ वर्ष की महिला को एक २५ साल के लड़के से जो कि प्रत्यक्ष रूप में एक चोर व् अनाचारी है ,पिटते देखती है न उसकी सहायतार्थ आगे आती है  और न ही  गवाही को तैयार होती है क्योंकि वह महिला अकेली बेसहारा है किसी गलत काम में किसी का साथ नहीं देती .ये जनता आज एक महिला के लिए इंसाफ की मांग कर रही है जबकि महिला को सताने वाली भी जनता ही है और ऐसा नहीं कि जनता में सिर्फ पुरुष ही हैं महिलाएं भी हैं और महिला होकर महिला पर तंज कसने में आगे भी  महिलाएं ही हैं .
    महिलाओं में करुणा और दया होती है सुना भी है और महसूस भी किया है किन्तु ईर्ष्या का जो ज्वालामुखी महिला में नारी में होता है वह भी देखा है ,नहीं बढ़ते  देख सकती  किसी अन्य  महिला को अपने से आगे और इसलिए उसकी राहों में कांटे भी बो सकती है और शरीर में अपने और उसके आग भी लगा सकती है .स्वयं इस पुरुष सत्तात्मक समाज के अत्याचार झेलने के बावजूद उसे कमी नज़र आती है महिला में ही ,कि यदि फलां लड़की के साथ कोई गलत हरकत हुई है तो दोष उसी का होगा और इसलिए आज तक पुरुष वर्चस्व बना हुआ है .क्यों ताकना पड़ता है महिलाओं को सहायता के लिए पुरुष के मुख की ओर और क्यों एक लड़की स्वयं २०-२५ साल की होते हुए भी ४-५ साल के लड़के के साथ कहीं जाकर सुरक्षित महसूस करती है .प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती ,दिल्ली गैंगरेप घटनाक्रम के समय लड़की के साथ लड़का भी था ,उससे बड़ा भी था कहाँ बचा पाया उसे अपने ही वर्ग के पुरुष रुपी दरिंदों से .
   
ऐसे में यदि महिलाओं को स्वयं की स्थिति सुदृढ़ करनी है तो सबसे पहले अपने दिमाग से ये नितांत शरीर पर आधारित इज्ज़त जैसी व्यर्थ की बातें निकालनी  होंगी जिसे शिकार समझ पुरुष अपने शरीर का इस्तेमाल हथियार की तरह करता है और इस तरह सारे में ये धारणा बलवती करता है कि पीड़ित नारी का शरीर दूषित हो गया है जबकि दूषित है वह मनोवृति जो महज शरीर से किसी व्यक्ति का आकलन करती है .नारी महज एक शरीर नहीं है और यह मनोवृति नारी को स्वयं बनानी होगी .गलत काम जो पुरुष करता है उसकी मनोवृति गलत उसका शरीर दूषित ये धारणा ही सबको अपनानी होगी .नारी को नारी का साथ देने को ,उसके साथ हुए अन्याय  अत्याचार  का बदला लेने को एकजुट होना होगा ,प्रत्येक नारी को ,दूसरी नारी को जो आज झेलना पड रहा है उसे अपना भी कल सोच उस स्थिति का दमन करने को सबल बनना पड़ेगा .बलात्कार जैसी घटनाएँ नारी को तोड़ने के लिए या उसके परिजनों पर कलंक लगाने के लिए की जाती हैं इसे मात्र एक अपराध के दायरे में लाना होगा और अपनी इज्ज़त सम्मान के लिए नारी को शरीर का सहारा छोड़ना होगा ..

    कवि रैदास कह गए है -
''मन चंगा तो कठौते में गंगा .''
     तो जिसका मन पवित्र है उसका शरीर दूषित हो ही नही सकता .ये मात्र एक अपराध है और अपराधी को कानून से सजा दिलाने के लिए महिलाओं को स्वयं को मजबूत करना होगा तभी महिला सशक्तिकरण वास्तव में हो सकता है .यदि महिलाएं ऐसे नहीं कर सकती तो वह कभी आन्दोलन करने वाली ,तो कभी मूक दर्शक बन तमाशा देखने वाली जनता की जामत में ही शामिल हो सकती हैं इससे बढ़कर कुछ नहीं .अब महिलाओं को इस स्थिति पर स्वयं ही विचार करना होगा .
           शालिनी कौशिक