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रविवार, 30 सितंबर 2012

सलाम मदर इण्डिया को -लघु कथा


सलाम मदर  इण्डिया को -लघु कथा 

   
'विलास ..  .. विलास ' बाइक पर विलास के  घर  के  बाहर  कुंदन  और  किशोर  दबी  जुबान  में आवाज  लगा  रहे  थे  .फरवरी के महीने  की  सुबह  के चार  बज रहे थे . विलास हल्के  क़दमों  से  हाथ में एक थैला लेकर चुपके से घर से निकल लिया .बाइक पर  किशोर के पीछे  विलास के बैठते  ही  कुंदन ने  बाइक  स्टार्ट  कर  दी .हवा  में उड़ते  हुए  तीनों  एक घंटे  में शहर  के चौराहे  पर पहुँच  गए  .विलास ने  घडी  में टाइम  देखा  .पांच  बजने  वाले  थे .कुंदन बोला  -''तैयार  रहना  विलास आज उन दोनों की सारी  हेकड़ी  निकाल देंगें .'' तभी  सामने  से स्कूटी  पर आती  दो  छात्राएं  दिखाई  दी . उनके थोडा आगे  निकलते ही कुंदन ने बाइक उनकी  स्कूटी  के पीछे दौड़ा दी .सड़क  पार होते   ही स्कूटी ज्यों   ही एक   गली  में  मुड़ी  कुंदन ने सुनसान  इलाका  देख  अपनी  बाइक की   रफ़्तार  बढ़ा दी और स्कूटी के आगे जाकर रोक  दी .तेज ब्रेक लगाने  के कारण स्कूटी का संतुलन बिगड़ा और संभलते संभलते भी भी दोनों छात्राएं सड़क पर गिर पड़ी .विलास तेजी से बाइक से उतरा और थैले में से बोतल निकालकर उनकी ओर बढ़ा .बोतल का ढक्कन  खोलकर उसमे भरा  द्रव सड़क पर गिरी छात्राओं के चेहरों पर  उड़ेल  दिया .छात्राओं ने चीखकर अपना  मुंह ढक लिया  पर ये क्या वहां चारो  ओर गुलाब जल की खुशबू फ़ैल गयी .विलास ने हाथ में पकड़ी बोतल के मुंह को नाक के पास  लाकर  सूंघा  ..उसमे से गुलाब जल की ही खुशबू आ रही  थी  .उसने बोतल को ध्यान  से देखा .ये तेजाब वाली बोतल नहीं थी .
तभी  किशोर जोर  से बोला  -''....विलास जल्दी भाग .......पुलिस ...पुलिस पुलिस की जीप आ रही है  .विलास के हाथ कांप  गए  बोतल हाथ से छूटकर वही गिर गयी ..विलास बाइक की ओर दौड़ा तभी गली में एक कार आकर  रुकी .विलास पहचान गया ये उनकी ही कार थी .कार का गेट  तेजी से खुला  और एक महिला उसमे  से बाहर   निकली .विलास उन्हें देखते  ही बोला  .-''..मम्मी  आप   ...यहाँ ....!!!'' पीछे से आती पुलिस की जीप भी वहां आकर रुकी .महिला ने विलास के पास आकर  एक जोरदार  तमाचा  उसके  गाल पर जड़ दिया और क्रोध  में कांपते हुए  बोली -''....मैं  तेरी  मम्मी नहीं .!!''दौड़कर आते पुलिस के सिपाहियों को देखकर तीनों  भागने  का प्रयास  करने  लगे  पर विफल  रहे  .विलास की मम्मी ने फिर उन छात्राओं के पास पहुंचकर  उन्हें  सहारा  देकर  खड़ा  किया ओर उन्हें अपनी कार से डॉक्टर  की क्लिनिक  तक  पहुँचाया .................फिर एक लम्बी सांस  लेकर  सोचा -'''अगर  मैं विलास की गतिविधियों पर ध्यान न देती और तेजाब की बोतल की जगह थैले में गुलाब जल की बोतल न रखती तो आज उसने तो इन  कलियों को झुलसा ही डाला था  .
                                       shikha kaushik 

सोमवार, 24 सितंबर 2012

उमा की लाडली

                              लाडली
        यह  सतरूपा, कुल कल्याणी ,जो विद्या से निखर जाए 
इसकी खुशबू के सम्मुख तो , जूही , चन्दन शर्माए     
बेटी दिवस ,बालिका दिवस ,डॉटर दिवस किसी भी नाम से पुकारिए बात एक ही है भारत के बहुत से क्षेत्रों में सितम्बर के चौथे रविवार में मनाया जाता है अर्थात इस साल २३ सितम्बर अथवा कल के दिन मनाया गया |मेरा मानना है की बेटी दिवस सिर्फ एक ही दिन क्यूँ हर दिन क्यों नहीं जब जब आप बेटी का मुस्कुराता हुआ चेहरा देखें वही पल बेटी दिवस हो ।
उमा की सदस्या श्रीमती कल्पना आत्रे और लाडली बेबी के साथ 
नीचे  राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा श्री मति सुशीला बलूनी जी के साथ 
बच्चियों के स्वास्थ की जांच करती हुई डाक्टर 

नवरात्रे आ रहे हैं घर घर में बेटी पूजा लक्ष्मी पूजा कन्या पूजा होगी समझ नहीं आता जहां धार्मिक ग्रंथों में भी और आज के समाज में भी नारी की पूजा होती है कन्या की पूजा होती है वही समाज कन्या भ्रूण हत्या ,दहेज़ प्रताड़ना /हत्या जैसा जघन्य अपराध कैसे कर सकता है कहाँ कमी है कौन सा सूत्र कमजोर है हमें वही ढूँढना है ---और ये काम बखूबी कर रही है "उमा  अर्थात उत्तराखंड महिला एसोसिएशन"सौभाग्य से मैं भी जुडी हूँ इस एसोसिएशन से |आज लाडली नाम से बालिका दिवस बड़ी धूम धाम से मनाया गया देहरादून की बहुत से स्कूल की बच्चियों ने रंगारंग कार्यक्रम में भाग लिया केवल रंगारंग कार्यक्रम ही नहीं आज के प्रोग्राम में एक दिन की बच्चियों से लेकर  छः साल की बच्चियों का हेल्थ चेक अप (फ्री) किया गया बेबी शो का आयोजन भी किया गया आज के चीफ गेस्ट उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री बहुगुणा जी और राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा श्री मति सुशीला बलूनी जी थी मुख्यमंत्री जी तेज बुखार  होने की वजह से उपस्थित नहीं हो पाए उनका खेद पात्र आ गया था प्रोग्राम पंजाब नेशनल बैंक के मनेजर द्वारा स्पोंसर  किया गया और उमा की अध्यक्षा श्रीमती साधना शर्मा जी के संयोजन में हुआ सफल हुआ |देखिये कुछ चित्र उस प्रोग्राम के ---
बच्चियों ने फेंसी ड्रेस में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया कोई इन्दिरा  गाँधी ,कोई कल्पना चावला ,कोई किरन बेदी ,सानिया मिर्जा आदि बन कर आई । नन्ही नन्ही बच्चियों और उनके मातापिता का उत्साह देखते ही बनता था ।बाद में सभी बच्चों को उपहार दिए गए ।
 बेबी शो और फेंसी ड्रेस के बच्चों को पुरस्कार दिए गए।देहरादून के मीडिया वाले भी सभी उपस्थित थे ।बाद में सुशीला जी का जबरदस्त वक्तव्य हुआ जिसका केंद बिंदु नारी सशक्तिकरण भ्रूण ह्त्या कन्या बचाओ पर आधारित था।अंत में चाय नाश्ते के बाद प्रोग्राम का समापन हुआ । 

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

श्री गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें !


सर्वप्रथम आप जानिए ''संकष्टनाशनस्तोत्रं '' के बारे में -
Ganesha Chaturthi Wallpapers''नारद'' जी कहते हैं -
''पहले मस्तक झुकाकर गौरिसुत को करें प्रणाम ; आयु,धन, मनोरथ-सिद्धि ;स्मरण से मिले वरदान ;
'वक्रतुंड' प्रथम नाम है ;''एकदंत'' है  दूजा ;
तृतीय 'कृष्णपिंगाक्ष' है ;'गजवक्त्र' है चौथा ;
'लम्बोदर'है पांचवा,छठा 'विकट' है नाम,
'विघ्नराजेन्द्र' है सातवाँ ;अष्टम 'धूम्रवर्ण' भगवान,
नवम 'भालचंद्र' हैं ,दशम 'विनायक' नाम ,
एकादश 'गणपति' हैं ,द्वादश 'गजानन' मुक्तिधाम ,
प्रातः-दोपहर-सायं जो नित करता नाम-ध्यान ;
सब विघ्नों का भय हटे, पूरण होते काम  ,
बारह-नाम का स्मरण,सब सिद्धि करे प्रदान ;
ऐसी  महिमा प्रभु की उनको है सतत प्रणाम ,  
इसका जप नित्य करो ;पाओ इच्छित वरदान ;
विद्या मिलती छात्र को ,निर्धन होता धनवान ,
जिसको पुत्र की कामना उसको मिलती संतान ;
मोक्षार्थी को मोक्ष का मिल जाता है ज्ञान ,
छह मास में इच्छित फल देता स्तोत्र महान ,
एक वर्ष जप करने से होता सिद्धि- संधान ,
ये सब अटल सत्य है ,भ्रम का नहीं स्थान ;
मैं 'नारद 'यह बता रहा ;रखना तुम ये ध्यान ,
जो लिखकर स्तोत्र ये अष्ट-ब्राहमण को करे दान ;
सब विद्याएँ जानकर बन जाता है विद्वान .''

                    
प्रथम -पूजनीय -श्री गणेश [अष्ट विनायक ]
किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पूर्व ''श्री गणेशाय नम: '' मन्त्र का उच्चारण समस्त विघ्नों को हरकर कार्य की सफलता को सुनिश्चित करता है .पौराणिक आख्यान के अनुसार -एक बार देवताओं की सभा बुलाई गयी और यह घोषणा की गयी कि-''जो सर्वप्रथम तीनों लोकों का चक्कर लगाकर लौट आएगा वही देवताओं का अधिपति कहलायेगा .समस्त देव तुरंत अपने वाहनों पर निकल पड़े किन्तु गणेश जी का वाहन तो मूषक है जिस पर सवार होकर वे अन्य देवों की तुलना में शीघ्र लौट कर नहीं आ सकते थे .तब तीक्ष्ण मेधा सम्पन्न श्री गणेश ने   माता-पिता [शिव जी व्  माता पार्वती ] की परिक्रमा की क्योंकि तीनों लोक माता-पिता के चरणों  में बताएं गएँ हैं .श्री गणेश की मेधा शक्ति का लोहा मानकर उन्हें 'प्रथम पूज्य -पद ' से पुरुस्कृत किया गया .
 ''अष्ट -विनायक ''
भगवान   श्री गणेश के अनेक   रूपों   की पूजा   की जाती  है .इनमे इनके आठ स्वरुप अत्यधिक प्रसिद्ध  हैं .गणेश जी के इन   आठ स्वरूपों   का नामकरण   उनके   द्वारा   संहार किये गए असुरों के आधार पर किया गया है 
                                             
... ashta...
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हे अष्टविनायक तेरी जय जयकार !
हे गणनायक !  तेरी जय जयकार  !
हे गौरी सुत ! हे शिव  नंदन !
तेरी महिमा  अपरम्पार   
हे अष्टविनायक तेरी जय जयकार  !
प्रथम विनायक   वक्रतुंड है सिंह सवारी  करता   ;
मत्सर असुर का वध कर दानव भगवन पीड़ा सबकी हरता ,
हे गणेश तेरी जय जयकार ! 
हे शुभेश तेरी जय जयकार !
द्वितीय विनायक एकदंत मूषक की करें सवारी ;
मदासुर का वध कर हारते विपदा सबकी भारी ,
हे गजमुख  तेरी जय जयकार 
हे सुमुख तेरी जय जयकार .
नाम महोदर तृतीय विनायक मूषक इनका  वाहन  ;
मोहसुर का नाश ये  करते इनकी महिमा पावन ,
हे विकट तेरी जय जयकार !
हे कपिल तेरी जय जयकार !
चौथे रूप में प्रभु विनायक धरते नाम गजानन ;
लोभासुर संहारक हैं ये मूषक इनका वाहन ,
हे गजकर्णक तेरी जय जयकार !
हे धूम्रकेतु तेरी जय जयकार ! 
Ashtavina...
प्रभु   विनायक  पंचम रूप लम्बोदर  का धरते ;
करें सवारी मूषक की क्रोधासुर  दंभ हैं हरते ,
हे गणपति तेरी जय जयकार !
हे गजानन तेरी जय जयकार ! विकट नाम के षष्ट विनायक सौर ब्रह्म के धारक ;
है मयूर वाहन इनका ये कामासुर संहारक ,
हे गणाध्यक्ष तेरी जय जयकार !
हे अग्रपूज्य तेरी जय जयकार !
विघ्नराज अवतार प्रभु का सप्तम आप विनायक ;
वाहन शेषनाग है इनका ममतासुर  संहारक ,
हे विघ्नहर्ता तेरी जय जयकार !
हे विघ्ननाशक तेरी जय जयकार !
धूम्रवर्ण हैं अष्टविनायक शिव ब्रह्म  रूप  प्रभु का ;
अभिमानासुर संहारक मूषक वाहन है इनका ,
हे महोदर  तेरी जय जयकार !
हे लम्बोदर तेरी जय जयकार !
                                               

                                श्री गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें !
                                              शिखा कौशिक 

कोई कानूनी विषमता नहीं ३०२ व् ३०४[बी ]आई.पी.सी.में


कोई कानूनी विषमता नहीं ३०२ व् ३०४[बी ]आई.पी.सी.में 

Bride bur...

17 सितम्बर 2012 दैनिक जागरण में पृष्ठ २ पर माला दीक्षित ने एक दोषी की दलील दी है जिसमे दहेज़ हत्या के दोषी ने अपनी ओर से एक अहम् कानूनी मुद्दा उठाया है .दोषी की दलील है -
    ''आई.पी.सी.की धारा ३०४ बी [दहेज़ हत्या ]और धारा ३०२ [हत्या ]में एक साथ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता .दोनों धाराओं में बर्डन ऑफ़ प्रूफ को लेकर कानूनी विषमता है जो दूर होनी चाहिए .''
   धारा ३०२ ,जिसमे हत्या के लिए दंड का वर्णन है और धारा ३०४ बी आई.पी.सी.में दहेज़ मृत्यु का वर्णन है और जहाँ तक दोनों धाराओं में सबूत के भार की बात है तो दांडिक मामले जिसमे धारा ३०२ आती  है में सबूत का भार अभियोजन पर है क्योंकि दांडिक मामलों में न्यायालय यह उपधारना करता है कि अभियुक्त निर्दोष है अतः सबूत का भार अभियोजन पर है कि वह दोषी है .
   दूसरी ओर दहेज़ मृत्यु के मामले में धरा ३०४-बी जो कि सन १९८६ में १९.११.८६ अधिनियम ४३ से  जोड़ी गयी ,में न्यायालय यह उपधारना करेगा कि उस व्यक्ति ने दहेज़ मृत्यु कारित की है .
       दहेज़ मृत्यु के विषय में धारा ३०४-बी आई.पी.सी.कहती है कि जब विवाह के सात वर्ष के अन्दर किसी स्त्री की मृत्यु जल जाने से या शारीरिक क्षति से या सामान्य परिस्थितियों से भिन्न परिस्थितियों में हो जाये व् यह दर्शित किया जाता है   कि मृत्यु के ठीक पूर्व पति या पति के नातेदारों द्वारा दहेज़ के लिए मांग को लेकर परेशान  किया गया था अथवा उसके साथ निर्दयता पूर्वक व्यव्हार किया गया था तब इसे दहेज़ मृत्यु कहा जायेगा और मृत्यु का कारण पति व् पति के रिश्तेदारों को माना जायेगा .
      साथ ही साक्ष्य अधिनियम की धारा ४ में यह बताया गया है कि न्यायालय यह उपधारना करेगा अर्थात न्यायालय यह साबित मान सकेगा जब तक नासबित न किया जाये .इस प्रकार यदि अभियोजन धारा ३०२ के अंतर्गत आरोपी का अपराध साबित करने में सफल रहता है तब भी धारा ३०४-बी में दहेज़ मृत्यु कारित न करने का भार दोषी व्यक्ति पर यथावत रहता है और यदि  वह न्यायालय की इस उपधारना  को नासबित करने में असफल रहता है तो वह हत्या और दहेज़ मृत्यु दोनों का दोषी माना जायेगा किन्तु यदि वह न्यायालय की इस उपधारना को नासबित करने में सफल हो जाता है तब उसे केवल हत्या का दोषी माना जायेगा जो कि उसपर साबित हो चुका है .
                विवाह के सात वर्षों के भीतर विवाहिता की मृत्यु पर न्यायालय यह उपधारना कर लेता है कि यह दहेज़ मृत्यु है किन्तु बहुत से मामलों में न दहेज़ की मांग साबित हो पाती है न क्रूरता तब न्यायालय को अन्य धाराओं में अपराध का विश्लेषण कर दोषी को दण्डित करना होता है जैसे कि लखजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य १९९४ पूरक [१]s .c .c १७३[१७६] में अभियुक्तों के विरुद्ध मृतका को विष खिलने में प्रत्यक्ष हाथ साबित न होने के कारण उन्हें केवल ३०६ के अंतर्गत आत्महत्या के दुष्प्रेरण के लिए सिद्धदोष किया गया .
     और बहुत से ऐसे मामले जिसमे पीड़ित की मृत्यु हत्या की श्रेणी में नहीं आ पाती क्योंकि हत्या के लिए धारा ३०० कहती है कि शारीरिक क्षति इस आशय से जिससे मृत्यु कारित करना संभाव्य है या वह प्रकृति के मामूली अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त है या वह कार्य इतना आसन्न संकट है कि मृत्यु कारित कर ही देगा या ऐसी शारीरिक क्षति कारित कर देगा जिससे मृत्यु कारित होनी संभाव्य है ,ऐसे में आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय बनाम टी.बासवा पुन्नेया तथा अन्य १९८९ क्रि.ला.जन.2330 आंध्र में विवाहिता को मारने पीटने  के बाद आत्महत्या दिखाने के लिए एक बांस की सहायता से लुंगी बंधकर लटका दिया .मृत्यु दम घुटने से हुई .न्यायालय ने विवाह के तीन वर्षों के भीतर अप्राकृतिक स्थितयों में मृत्यु व् दहेज़ की मांग के तथ्य साबित होने के कारण मामले को ३०४-बी के अंतर्गत माना भले ही मृतका ने आत्महत्या की हो .
   फिर न्यायालय इस सम्बन्ध में स्वयं जागरूक है .लेखराम बनाम पंजाब राज्य १९९९ s .c .c [क्रि]१२२ में उच्चतम न्यायालय ने समुचित सबूत के आभाव में अभियोजन पक्ष द्वारा लगाये गए दहेज़ हत्या के आरोप की सत्यता पर विश्वास करते हुए निर्दोषिता की सिद्धि का भार अभियुक्त पर डालना न्यायोचित नहीं माना और अभियुक्त को ३०२ एवं ३०४-बी के आरोप से दोषमुक्त किया .
साथ ही शमन साहेब एम् .मुठानी बनाम कर्णाटक राज्य ए.आई.आर एस.सी.९२१ में अभियुक्त ३०२ के बजाय ३०४ -बी का दोषी माना किन्तु इस सम्बन्ध में अभियुक्त को पूर्व सूचना ,उसे बचाव के लिए अवसर प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक माना और विचारण न्यायालय को ३०४-बी के अपराध के विचारण के लिए निर्देश दिए. 
   ऐसे में भले ही दोनों धाराओं में सबूत का भार अलग अलग पर हो किन्तु ऐसे में अभियुक्त का बचाव का अधिकार कहीं प्रभावित नहीं होता है .यदि अभियुक्त ने हत्या की है और विवाह के सात वर्षों के अन्दर की है तो वो दोनों धाराओं में दोषी है और ऐसे में अभियोजन की सफलता है व् न्यायालय की उपधारना साबित है और यदि दहेज़ मृत्यु नहीं की है तो वह अपना बचाव करेगा और अभियोजन को विफल करेगा .ऐसा नहीं है कि हर हत्या को दहेज़ मृत्यु की श्रेणी दे दी गयी हो या हर दहेज़ मृत्यु को हत्या की.उपरोक्त निर्णयों द्वारा न्यायालयों ने अपनी न्यायप्रियता का परिचय दिया है और ऐसी किसी विषमता को कहीं कोई स्थान नहीं दिया गया है .
                                                 शालिनी कौशिक 
                                                       [कानूनी ज्ञान]


 


 

 

शनिवार, 15 सितंबर 2012

बीवी और शौहर



बीवी और शौहर 

रात भर जागी  बीवी दर्द से जो तडपा शौहर ; 
कभी बीवी के लिए क्यों नहीं जगता शौहर ?

 करे जो काम बीवी फ़र्ज़ हैं उसको कहते ; 
अपने हर एक काम को अहसान क्यों कहता शौहर ?

 रहो हद में ये हुक्म देता बीवी को ;
 मगर खुद पर कोई बंदिश नहीं रखता शौहर .

 नहीं है हक़ बीवी को उठा के देख ले आँखें ;
 जरा सी बात पर क्यों हाथ उठाता शौहर ?

 शौहर के लिए दुनिया छोड़ देती बीवी ; 
दुनिया के कहने पर उसी को छोड़ता शौहर .                                     

शिखा कौशिक                           

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

पापा, भैया लोग मुझे ऐसी अजीब सी नज़रों से क्यों घूर रहे थे? (संजीव शर्मा )


पापा, भैया लोग मुझे ऐसी अजीब सी नज़रों से क्यों घूर रहे थे?

आज मैं एक ऐसे ब्लॉग पर गई जहां इस शीर्षक को देखकर मैं अन्दर तक सिहर गई पढ़ा तो एक निष्कर्ष निकला की हमारे आज के ही समाज के परुष वर्ग भी इस ज्वलंत मुद्दे पर चिंतित है नारी सुरक्षा के लिए कुछ करना चाहते हैं काश सभी पुरुष वर्ग विशेषतया आज की युवा  पीढ़ी के नवयुवक के विचार     भी ऐसे ही बन  जाएँ   जहां हमारी बच्चियां आने वाली संताने  खुल  के जी सकें बहुत बहुत आभार संजीव शर्मा जी का इतना अच्छा आलेख लिखने के लिए बधाई के पात्र हैं 
ग्यारह बसंत पूरे कर चुकी मेरी बिटिया के एक सवाल ने मुझे न केवल चौंका दिया बल्कि उससे ज्यादा डरा दिया.उसने बताया कि आज ट्यूशन जाते समय कुछ भैया लोग उसे अजीब ढंग से घूर रहे थे.यह बताते हुए हुए उसने पूछा कि-"पापा भैया लोग ऐसे क्यों घूर रहे थे? भैया लोग से उसका मतलब उससे बड़ी उम्र के और उसके भाई जैसे लड़कों से था.खैर मैंने उसकी समझ के मुताबिक उसके सवाल का जवाब तो दे दिया लेकिन एक सवाल मेरे सामने भी आकर खड़ा हो गया कि क्या अब ग्यारह साल की बच्ची भी कथित भैयाओं की नजर में घूरने लायक होने लगी है? साथ ही उसका यह कहना भी चिंतन का विषय था कि वे अजीब निगाह से घूर रहे थे.इसका मतलब यह है कि बिटिया शायद महिलाओं को मिले प्रकृति प्रदत्त 'सेन्स' के कारण यह तो समझ गयी कि वे लड़के उसे सामान्य रूप से नहीं देख रहे थे लेकिन कम उम्र के कारण यह नहीं बता पा रही थी कि 'अजीब' से उसका मतलब क्या है.हाँ इस पहले अनुभव(दुर्घटना) ने उसे चौंका जरुर दिया था. दरअसल सामान्य मध्यमवर्गीय भारतीय परिवारों की तरह उसने भी अभी तक यही सीखा था कि हमउम्र लड़के-लड़कियां उसके दोस्त हैं तो बड़े लड़के-लड़कियां भैया और दीदी. इसके अलावा कोई और रिश्ता न तो उसे अब तक पता है और न ही उसने अभी तक जानने की कोशिश की, लेकिन इतना जरुर है कि इस अजीब सी निगाहों से घूरने की प्रक्रिया ने हमें समय से पहले उसे समाज के अन्य रिश्तों के बारे में समझाने के लिए मजबूर जरुर कर दिया.
     बिटिया के सवाल के जवाब की जद्दोजहद के बीच अखबार में छपी उस खबर ने और भी सहमा दिया जिसमें बताया गया था कि एक नामी स्कूल के बस चालक और कंडक्टर ने छः साल की नन्ही सी बच्ची का दो माह तक यौन शोषण किया और डरी सहमी बच्ची अपनी टीचर की पिटाई की धमकी के डर से यह सहती रही. क्या हो गया है हम पुरुषों को? क्या अब बच्चियों को घर में बंद रखना पड़ेगा ताकि वह उस उम्र में किसी पुरुष की कामुक निगाहों का शिकार न बन जाए जबकि उसके लिए पुरुष पापा,भाई,अंकल,ताऊ,दादा जैसे रिश्तों के अलावा और कुछ नहीं होते और जिनकी गोद में वह स्त्री-पुरुष का भेद किये बिना आराम से बैठ एवं खेल सकती है. यदि अभी से बच्चियों पर इस तरह की पाबन्दी थोपनी पड़ी तो फिर वह भविष्य में लार टपकाते पुरुषों का सामना कैसे करेगी?आखिर कहाँ जा रहा है हमारा समाज! हम बेटियों को कोख में ही मारने का षड्यंत्र रचते हैं,यदि वे किसी तरह बच गयी तो सड़क पर या कूड़ेदान में फेंक दी जाती हैं और यदि यहाँ भी उनमें जीवन की लालसा रह गयी तो फिर हम कामुक निगाहों से घूरते हुए उनके साथ अशालीन हरकतों पर उतर आते हैं.किसी तरह उनकी शादी हुई तो दहेज के नाम पर शोषण और फिर बेटी को जन्म देने के नाम पर तो घर से ही छुट्टी मानो बेटी पैदा करने में उसकी अकेले की भूमिका है? यह सिलसिला चलता आ रहा है और हम चुपचाप देख रहे हैं. क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? क्यों नहीं हम अपने बेटे को भैया और उसकी निगाहों को शालीन रहने के संस्कार देते?बड़े होने पर उसे लड़कियों का भक्षक बनने की बजाय रक्षक बनने की शिक्षा क्यों नहीं देते?बच्चियों को ताऊ,पिता और भैया की आयु के पुरुषों  और शिक्षक से भी यौन हिंसा का डर सताने लगे तो फिर इस सामाजिक ताने-बाने का क्या होगा? महिला में हमें उपभोग की वस्तु ही क्यों दिखती है? ऐसे कई ज्वलंत प्रश्न हैं जिन पर अभी विचार नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हमारा समाज महिला विहीन हो जायेगा और माँ-बहन-बेटी जैसे रिश्ते पौराणिक कथाओं के पात्र!.   

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

हिंदी दिवस विशेष



 हिंदी दिवस विशेष 
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            हिंदी भाषा के  सम्मान में प्रस्तुत है ये रचना -क्योंकि हिंदी किसी की दया से राष्ट्र भाषा के पद पर आसीन नहीं है .ये हिंदुस्तान का दिल है ...धड़कन है .स्वाधीनता संग्राम में पूरे देश को एक सूत्र में बांध देने की कोशिश गाँधी जी ने हिंदी में ही की थी और बंगाली बाबू नेता जी सुभाष चन्द्र बोस जी ने भी बंगाली भाषा प्रेमियों की आलोचना को सहकर  हिंदी को ही राष्ट्रभाषा माना था क्योकि केवल हिंदी में ही वो दम है जो पूरे भारत को जोड़ सकती है .जो इसका अपमान करे  उसे कठोर दंड मिलना चाहिए ....
 हिंदी तो दिल है हिंदुस्तान का   सित -तारा  भाषा आसमान  का  ये है प्रतीक स्वाभिमान का  क्या कहना हिंदी जबान का ! हिंदी में ही दस कबीर ने गाकर साखी जन को जगाया   तुलसी सूर ने पद रच रच कर अपने प्रभु का यश है गाया    हिंदी में ही सुमिरण करती मीरा  अपने श्याम  का   क्या कहना हिंदी जबान का ....... हिंदी सूत्र में बांध दिया था गाँधी जी ने भारत सारा   अंग्रेजों भारत को छोडो गूँज उठा था बस ये नारा  इसको तो हक़ है सम्मान का  क्या कहना हिंदी जबान का ...... इसकी लिपि है देवनागरी ;इसमें ओज है इसमें माधुरी  आठ हैं इसकी उपबोली ;ऊख की ज्यों मीठी पोरी  हिंदी तो अर्णव  है ज्ञान का  क्या कहना हिंदी जबान का .                                           ''जयहिंद '                                                           शिखा कौशिक                      

पैंतीस साल बाद


आज पैंतीस  साल बाद उसकी आवाज सुनी 
पर पहचान नहीं पाई 
फोन पर वार्ता लाप कुछ इस तरह हुआ 
स्नेहा ---हेल्लो राज  पहचान कौन बोल रही हूँ 
मेरा उत्तर ---सारी कौन बोल रही हो ??
स्नेहा --अच्छा अब पहचानती भी नहीं पैंतीस  साल पहले याद कर स्कूल में कालेज में एक साथ घूमते थे 
मेरा जबाब --माफ़ करना नहीं पहचान पा रही हूँ |
स्नेहा ---अरे स्नेहा को भूल गई 
मैं उछल पड़ी बोली ---अरे तू जिन्दा है आई  मीन तू इस दुनिया में है कहाँ है कैसी है आज अचानक पैंतीस साल बाद !!!मेरी आवाज रुद्ध गई|
स्नेहा ---हाँ इतने साल बाद अब तो मेरी तरह तू भी बुड्ढी हो गई होगी हाहाहा 
मेरा जबाब ---चुप मैं बुड्ढी नहीं हुई 
स्नेहा --हाँ हाँ बालों को डाई करती  होगी  हाहाहा ,अब तो नानी दादी भी बन गई होगी |

मेरा जबाब --हाँ बन गई अच्छा और बता तेरा बेटा कितना बड़ा हो गया 
स्नेहा --बीस साल का हो गया आज इसी की वजह से तो मिले हैं ,अच्छा जीजू से बात करा 
मेरा जबाब --ये तो अभी बाहर हैं पहले तू करा 
स्नेहा ---कुछ देर की ख़ामोशी के बाद सोलह साल पहले एक्सीडेंट में चला गया इस बेटे को अकेला पाल रही हूँ 
मेरा जबाब ---दुखी मन से अफ़सोस किया फिर बोला यार तू कैसी हो गई है देखने को दिल कर रहा है 
स्नेहा -अपना फेस बुक आई डी दे अभी एक दूसरे को देख लेते हैं
मैंने तुरंत फेसबुक पर उसे एड  करलिया  
और उसने मेरे और मैंने उसके फोटो देखे उसको देखकर मैं सचमुच पहचान नहीं पाई सफ़ेद बाल शरीर की चेहरे की हड्डियां उभरी हुई चश्मा लगाए लगा जिन्दगी की जंग लड़ते लड़ते उसका क्या हाल हो गया 
कुछ देर बाद उसका फोन अचानक कट गया 
मैंने दो तान बार मिलाया और पूछा फोन क्यूँ काट दिया 
कैसी लगी मेरी दुनिया 
स्नेहा ---तेरी दुनिया मेरी दुनिया से बहुत बड़ी है राजेश बहुत फांसला है 
मेरा जबाब --दुनिया बड़ी है या छोटी मैं अभी भी वही तेरी सहेली हूँ चुपचाप ट्रेन पकड़ और मिलने आजा तुझे मेरी कसम 
स्नेहा ---देखूंगी कभी छुट्टी लुंगी तब 
मेरा जबाब ---तू ऐसे नहीं मानेगी तुझे चौदवीं सीढ़ी और समोसे की कसम जल्दी आना 
स्नेहा---अब तो आना ही पड़ेगा चौदवीं सीढ़ी और समोसे की कसम जो देदी   आज ही रिजर्वेशन करा रही हूँ 
(जब हम स्कूल में थे तो जीने की  चौदवी  सीढ़ी पर बैठ कर समोसे खाते थे ,और उसकी कसम देकर हम एक दूसरे से कुछ भी करवा लेते थे )
 उससे मिलने का बेसब्री से इन्तजार कर रही हूँ |